एमपी में रस्मअदायगी बन गई जनसुनवाई, जान देने की कोशिश भी नहीं दिला पा रही राहत

Sanjay Sharma | Jun 04, 2026, 22:50 IST
Photograph: (THESOOTR)
श्योपुर में न्याय के लिए 87 दिन से परेशान व्यापारी देवेन्द्र गोयल की मौत ने जनसुनवाई को कटघरे में ला दिया है। हर सप्ताह होने वाली जनसुनवाई में आने वाली शिकायतों पर अफसरों की टालमटोल से भी इस घटना ने पर्दा उठा दिया है।

ऐसे समझें पूरा मामला...

  • श्योपुर में फरियादी के जहर खाने की घटना से नाराज सीएस।
  • अफसरों की बेरुखी ने जनसुनवाई को बना दिया रस्मअदायगी।
  • शिकायत के समाधान में टालमटोल से निराशा में घिरे फरियादी।
  • मुख्य सचिव ने श्योपुर की घटना के बाद उठाए अफसरों पर सवाल।
  • बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी सालों से भटकने मजबूर लोग।

जनसुनवाई मध्य प्रदेश सरकार का अहम कार्यक्रम है। यह व्यवस्था आमजन की शिकायतों के त्वरित निराकरण के लिए की गई है। यानी ऐसी समस्याएं जिनका अधिकारियों के स्तर पर समाधान किया जा सकता है, उन्हें जिला स्तर पर ही सुना जाता है।



शुरूआत में प्रभावी बनी यह व्यवस्था अब अधिकारियों की उदासीनता का शिकार हो गई है। जनसुनवाई की स्थिति यह है कि कई जिलों में प्रमुख अधिकारी ही मौजूद नहीं रहते।



वहीं जो अधिकारी रहते हैं वे भी शिकायतों की सुनवाई रस्मअदायगी के रूप में कर रहे हैं। इसी वजह से पीढ़ितों को महीनों चक्कर काटने के बाद भी न्याय नहीं मिल रहा। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें लोग अपनी शिकायतों को दर्जनों बार करने के बाद भी समाधान की आस लगाए हैं।



जनसुनवाई या सिर्फ दिखावा

मध्य प्रदेश में जनसुनवाई अब खेल बन गई है। अधिकारियों का रवैया भी सरकार के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लेकर संजीदा नहीं है। नतीजा यह है कि कोई फरियादी 10 बार चक्कर काट चुका है तो कोई 20 बार आवेदन दे चुका है।



ऐसे फरियादियों को जनसुनवाई से कोई समाधान नहीं मिल रहा। ज्यादातर ग्रामीण फरियादी जनसुनवाई तक पहुंचने के लिए किराया खर्च कर करके परेशान हो चुके हैं। छोटी और सामान्य शिकायतों को भी अधिकारियों की उदासीनता खींचकर महीनों तक अटका रही है।



सुनी होती गुहार तो नहीं जाती जान

जनसुनवाई में अफसरों की बेरुखी का ताजा उदाहरण श्योपुर जिले का है। श्योपुर के सामान्य व्यापारी देवेन्द्र गोयल दुकान चलाते थे। 50 वर्षीय देवेन्द्र की दुकान पर उनके परिवार के ही कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया था। इसकी शिकायत देवेन्द्र ने कई बार पुलिस और प्रशासन से की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।



पुलिस जांच का भरोसा दिलाकर बार- बार बयान दर्ज करती रही। वहीं अधिकारी भी कार्रवाई का आश्वासन देते रहे। 87 दिनों तक देवेन्द्र कलेक्टर से लेकर एसपी ऑफिस की दहलीज पर एड़ी रगड़ते रहे।



जनसुनवाई में भी शिकायत का समाधान नहीं निकला। इसी से परेशान होकर उन्होंने जनसुनवाई में जहर खाकर जान दे दी। घटना ने जनसुनवाई और अफसरों की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है।



जहां के रहने वाले 50 वर्षीय देवेंद्र गोयल पिछले कई दिनों से मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित चल रहे थे. प्राप्त जानकारी के अनुसार, देवेंद्र की अपनी एक दुकान थी, जिस पर बीते 28 फरवरी को उनके छोटे भाई के बेटे प्रिंस और उसकी मां ने जबरन ताला तोड़कर अपना कब्जा जमा लिया था।



देवेंद्र ने इसके खिलाफ आवाज उठाई और कानूनी तरीके से अपनी दुकान वापस पाने की जंग शुरू की। उन्होंने 2 मार्च से लेकर 26 मई तक प्रशासन के हर छोटे-बड़े अधिकारी को लिखित शिकायतें सौंपी। वह कोतवाली पुलिस के पास गए, लेकिन पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.



किस काम की ऐसी जनसुनवाई...

1. विदिशा

  • फरियादी: रामस्वरूप लोधी, किसान, उम्र 52 वर्ष, ग्राम बासौदा
  • समस्या: पैतृक कृषि भूमि खसरा नं. 45/2 पर गांव के दबंगों का अवैध कब्जा।
  • स्थिति: जनवरी 2023 से जून 2026 तक 11 बार कलेक्टर जनसुनवाई में आवेदन। हर बार तहसीलदार जांच करेंगे का आश्वासन देकर लौटा दिया गया। इसके बाद भी पटवारी मौके पर नहीं पहुंचा। परेशान होकर सितंबर 2025 में कलेक्ट्रेट परिसर में जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया। अस्पताल से लौटने के बाद भी कब्जा नहीं हटा। 3.5 एकड़ जमीन पर आज भी दूसरा पक्ष खेती कर रहा।

2. जबलपुर

  • फरियादी: शांति बाई कोरी, विधवा, उम्र 67 वर्ष, रांझी क्षेत्र
  • समस्या: पति की मृत्यु के बाद राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल रहा।
  • स्थिति: अप्रैल 2022 से अब तक 23 बार जनसुनवाई में उपस्थिति। हर बार नया दस्तावेज मांगा गया। कभी आधार लिंक नहीं, कभी समग्र आईडी त्रुटि, कभी सर्वर डाउन बताया गया। बैंक खाता और सभी दस्तावेज पूर्ण होने के बावजूद 28 माह से पेंशन लंबित। आने-जाने में 3000 रु से अधिक खर्च हो चुके।

3. इंदौर

  • फरियादी: रमेश चौहान, दिव्यांग, उम्र 41 वर्ष, बाणगंगा क्षेत्र
  • समस्या: सामाजिक न्याय विभाग की योजना अंतर्गत मोटराइज्ड ट्रायसिकल के लिए पात्र, पर आवंटन नहीं।
  • स्थिति: फरवरी 2023 में पहला आवेदन दिया। कलेक्टर की जनसुनवाई में 8 बार उपस्थित हुए। हर बार अगली सूची में नाम शामिल होने का कहकर टाल दिया। अगस्त 2024 में जनसुनवाई के दौरान व्हीलचेयर से गिरकर चोटिल भी हुए। विभाग का कहना है भोपाल से आवंटन नहीं आया। 3 साल से आवेदक घिसटने का कष्ट उठा रहा है।

4. रीवा

  • फरियादी: सुनीता साकेत, गृहिणी, उम्र 36 वर्ष, मनगवां तहसील
  • समस्या: गलत बिजली बिल 1.2 लाख रु जारी होना, जबकि वास्तविक खपत 800 यूनिट प्रतिमाह है।
  • स्थिति: मार्च 2024 से जनसुनवाई में 9 बार शिकायत। बिजली कंपनी ने मीटर जांच के नाम पर 5 बार टीम भेजी। हर बार रिपोर्ट मीटर सही बताई गई। गुहार लगाने के बाद भी बिल संशोधित नहीं किया। अक्टूबर 2025 में कनेक्शन काट दिया गया। फरियादी के 2 बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे। जून 2026 में फिर आवेदन किया लेकिन इस बार भी जांच जारी होने का भरोसा देकर पल्ला झाड़ लिया।

5. सागर जिला

  • फरियादी: कमलेश अहिरवार, छात्र, उम्र 19 वर्ष, केसली ब्लॉक
  • समस्या: अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र न बनना, जिससे कॉलेज में प्रवेश और स्कॉलरशिप रुकी।
  • स्थिति: जुलाई 2022 से 14 बार जनसुनवाई में आवेदन। तहसील कार्यालय ने पिता का जाति प्रमाण पत्र न होने का कहकर लौटा दिया। जबकि कमलेश के आवेदन के साथ पिता द्वारा 1998 का बनवाया गया प्रमाण पत्र लगा है। वहीं एसडीएम कार्यालय की लंबित बताई गई। जबकि रिपोर्ट तलब कर प्रमाण पत्र के आधार पर शिकायत का समाधान किया जा सकता था। आर्थिक संकट में घिरा कमलेश अब पढ़ाई छोड़ने मजबूर है।

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