PWD में प्रभार का खेल बेनकाब: दागी अफसर को चीफ इंजीनियर बनाने पर HC भड़का
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 का आदेश रद्द किया।
- आरोपी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने पर आपत्ति जताई।
- कोर्ट ने इसे न्याय सिद्धांतों के खिलाफ बताया।
- प्रमुख सचिव पीडब्ल्यूडी को कड़ी चेतावनी दी गई।
- भविष्य में दागी अधिकारियों को प्रभार न देने के निर्देश दिए।
PWD में पोस्टिंग-पॉलिटिक्स पर हाईकोर्ट का बड़ा प्रहार
जबलपुर हाईकोर्ट ने PWD में लंबे समय से चल रहे ट्रांसफर, पोस्टिंग और अतिरिक्त प्रभार के खेल पर तीखी टिप्पणी की है। साथ ही इस मामले को लेकर कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने आदेश निरस्त किया। भोपाल ब्रिज जोन के मुख्य अभियंता पद से पीसी वर्मा हटाए गए थे। संजय कुमार मस्के को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। कोर्ट ने इस सरकारी आदेश को अवैध ठहराया है। प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग नियमों के अनुसार होना चाहिए। किसी विशेष अधिकारी को लाभ देने के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए।
फिर प्रभार छीनने पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया। 29 अप्रैल 2026 को शाम 5:05 बजे पीसी वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। टेंडर मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं का आरोप था। तीन घंटे बाद अतिरिक्त प्रभार वापस ले लिया गया। प्रभार संजय कुमार मस्के को सौंप दिया गया। कोर्ट ने इस घटनाक्रम को असामान्य बताया है। निर्णय पहले से तय होने के संकेत मिले हैं। नोटिस केवल औपचारिकता बनकर रह गया। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि संजय कुमार मस्के के खिलाफ पहले से गंभीर आरोप और जांचें लंबित हैं। सिवनी जिले में वैनगंगा नदी पर बने सबमर्सिबल पुल के ढहने के मामले में उन पर लापरवाही के आरोप हैं। इससे लगभग 4.94 करोड़ रुपए की क्षति हुई थी।
इसके अलावा ग्वालियर में 1000 बिस्तरों वाले अस्पताल निर्माण परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं की जांच में उनकी भूमिका पर सवाल उठे। शुरुआती शिकायतें न मिलने से लगभग 2.41 करोड़ रुपए के नुकसान की आशंका जताई गई। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताया है। जिस अधिकारी पर कार्रवाई का मसौदा तैयार हो रहा था। उसी को पूरे कार्यालय का सर्वोच्च प्रभार देना अनुचित है। कोर्ट ने कहा यह अपने ही मामले में खुद जज बनने जैसा है।
सर्कुलर की अनदेखी पर कोर्ट नाराज
अदालत ने 2004 के सरकारी सर्कुलर का उल्लेख किया है। लंबित विभागीय जांच वाले अधिकारियों पर उच्च पद प्रभार पर रोक है। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू मामलों पर भी यही निर्देश लागू है। ऐसे अधिकारियों को अस्थायी या चालू प्रभार नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा सरकार ने अपने ही नियमों की अनदेखी की है। पीडब्ल्यूडी में कई प्रभार देने पर गंभीर चिंता जताई गई है। वरिष्ठता और नियमों को दरकिनार किया गया है। कोर्ट ने इसे बैकडोर एंट्री की व्यवस्था बताया है। इससे योग्य अधिकारियों का मनोबल टूटता है। भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
प्रमुख सचिव को लगी कड़ी फटकार
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव, लोक निर्माण विभाग से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा था ताकि विभाग की नीति स्पष्ट हो सके। लेकिन अदालत के अनुसार प्रमुख सचिव ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। जवाब सामान्य और टालमटोल वाला पाया गया। दागी अधिकारी का बचाव करने का प्रयास किया गया। जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कड़ी नाराजगी जताई है। आदर्श नियोक्ता से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारी को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा आदेशों को हल्के में नहीं लिया जाएगा।
कोर्ट ने जारी किए पांच बड़े निर्देश
मामले का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 का विवादित आदेश रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि संजय कुमार मस्के के खिलाफ लंबित सभी विभागीय जांचें स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से पूरी की जाएं तथा जांच पूरी होने तक उन्हें भोपाल जोन में मुख्य अभियंता के रूप में पदस्थ न किया जाए।
पीसी वर्मा को भी जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए भोपाल ब्रिज जोन से बाहर किसी अन्य स्थान पर प्रभारी मुख्य अभियंता के रूप में पदस्थ करने के निर्देश दिए गए हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि भोपाल ब्रिज जोन का प्रभार केवल ऐसे अधिकारी को दिया जाए जिसका सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह निष्कलंक हो और जो नियमों के तहत पदोन्नति के दायरे में आता हो।
PWD में प्रभार संस्कृति पर दूरगामी असर वाला फैसला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव, लोक निर्माण विभाग को भेजते हुए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल एक अधिकारी की पोस्टिंग तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ा संदेश है। नियमों को दरकिनार कर दागी अधिकारियों को संरक्षण देने पर सवाल उठे हैं। ऐसी प्रवृत्ति अब न्यायिक जांच के दायरे में आ चुकी है।
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