रेलवे विजिलेंस अफसरों पर FIR हाईकोर्ट ने की रद्द, रीवा IG की कार्यप्रणाली पर सवाल

Neel Tiwari | Apr 01, 2026, 19:46 IST
railway vigilance
Jabalpur: जबलपुर हाईकोर्ट ने रेलवे विजिलेंस अधिकारियों को बड़ी राहत दी है। विजिलेंस टीम के द्वारा चेकिंग के समय एक TTE को पकड़ा गया था। लेकिन TTE ने IG से अपने संबंधों का फायदा उठाया और विजिलेंस अधिकारियों पर ही उल्टी FIR करवा दी।

News in Short

  • रेलवे विजिलेंस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR और पुलिस नोटिस रद्द।
  • कोर्ट ने कहा - बिना मंजूरी (Sanction) के सरकारी कर्मचारी पर केस नहीं।
  • विजिलेंस टीम ने ट्रेन में TTE की जांच के दौरान पकड़ा था मामला।
  • TTE ने रीवा IG से संपर्क कर SC/ST एक्ट में FIR दर्ज करवाई।
  • गाजीराम मीणा थे तत्कालीन रीवा आईजी।

News in detail

जबलपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रेलवे विजिलेंस अधिकारियों को बड़ी कानूनी राहत दी है। जस्टिस बीपी शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि सरकारी अधिकारी यदि अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हों, तो उनके खिलाफ बिना सक्षम अनुमति के आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने Crime No. 44/2012 से जुड़ी FIR और पुलिस द्वारा जारी नोटिस को पूरी तरह रद्द कर दिया।





नई आबकारी नीति पर सरकार को राहत, हाईकोर्ट ने स्टे से किया इनकार



ट्रेन में शुरू हुआ था विवाद

यह पूरा विवाद 29 दिसंबर 2011 का है, जब रीवा-जबलपुर इंटरसिटी ट्रेन में रेलवे विजिलेंस टीम औचक निरीक्षण कर रही थी। इसी दौरान टीम ने TTE प्यार सिंह मीणा के कामकाज की जांच की। जांच के दौरान कुछ अनियमितताओं को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया। बताया गया कि विजिलेंस टीम ने TTE को जांच के दायरे में लिया। जिससे नाराज होकर उसने पूरे घटनाक्रम को अलग मोड़ दे दिया।



भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, मुस्लिम पक्ष को झटका, हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को सुनवाई



TTE ने SC/ST एक्ट में दर्ज करवा दी FIR

जांच के बाद TTE प्यार सिंह मीणा ने आरोप लगाया कि विजिलेंस अधिकारियों ने उसके साथ गाली-गलौज, मारपीट और जातिसूचक टिप्पणियां कीं। इतना ही नहीं, आरोप यह भी लगाए गए कि उसे जबरन RPF पोस्ट ले जाकर प्रताड़ित किया गया। इन आरोपों के आधार पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज करवाया गया, जिसने पूरे प्रकरण को गंभीर कानूनी मोड़ दे दिया।



गांव-गांव दौड़ेगा ‘न्याय सारथी’, अब कोर्ट के चक्कर नहीं, न्याय खुद पहुंचेगा आपके दरवाजे



तत्कालीन IG की भूमिका पर उठे सवाल

इस केस का सबसे अहम पहलू रीवा के तत्कालीन IG गाजीराम मीणा की भूमिका रही। कोर्ट में यह सामने आया कि घटना स्थल जबलपुर/कटनी क्षेत्र में था, जो रीवा IG के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसके बावजूद, शिकायतकर्ता के संपर्क में आकर रीवा IG के निर्देश पर जीआरपी कटनी में FIR दर्ज कर दी गई।



कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इतनी त्वरित कार्रवाई करना संदेह पैदा करता है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता और IG एक ही वर्ग से थे, जिससे पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की गई। कोर्ट ने इस पहलू को नजरअंदाज नहीं किया।



जबलपुर GRP दे चुकी थी क्लीन चिट

घटना के बाद जीआरपी जबलपुर ने 11 जनवरी 2012 को रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में अधिकारियों के खिलाफ कोई अपराध नहीं पाया गया। हाईकोर्ट के निर्देश पर एसपी रेल ने जांच की। इस जांच में एक अन्य अधिकारी दोषी पाया गया। याचिकाकर्ता को अधिकारियों के खिलाफ ठोस सबूत नहीं मिले।



इंदौर में अपर सत्र न्यायाधीश एडीजे गलत जमानत देने से विजिलेंस जांच में आए, हाईकोर्ट ने किया सस्पेंड



धारा 197 CrPC बनी फैसले का आधार

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सरकार की अनुमति जरूरी है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बिना अनुमति के FIR दर्ज करना कानून का दुरुपयोग है और अधिकारियों को प्रताड़ित करने का प्रयास है।



FIR और GRP का नोटिस दोनों हुए रद्द

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने जीआरपी कटनी द्वारा जारी नोटिस और पूरी आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारियों को उनके कर्तव्य निभाने के दौरान बेवजह कानूनी कार्रवाई में नहीं फंसाया जा सकता। यदि ऐसा होता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।



Tags:
  • मध्यप्रदेश
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
  • जबलपुर हाईकोर्ट
  • जबलपुर
  • रेलवे
  • विजिलेंस जांच