पानी बचाने के नियम ‘बेअसर’: प्रदेश भर में सिस्टम फेल, रसूखदारों को खुली छूट
News In Short
- बड़े भवनों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनदेखी।
- प्रमुख प्रोजेक्ट्स ने जल संरक्षण नियमों का उल्लंघन किया।
- भोपाल और इंदौर में पार्किंग का गलत उपयोग।
- जल संकट और ट्रैफिक जाम बढ़ने से जनता परेशान।
- नगर निगम ने बिना निरीक्षण NOC दी, जिम्मेदारी गायब।
News In Detail
मध्यप्रदेश में हर साल गर्मी आते ही पानी के लिए हाहाकार मच जाता है। टैंकरों की लाइन और सूखे नल आम नजारे बन जाते हैं। अब सामने आया है कि ये संकट अचानक नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है। बड़े-बड़े भवनों में अनिवार्य रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के नियमों को नजरअंदाज किया गया और जिम्मेदार विभाग चुपचाप मंजूरी देते रहे।
नियम क्या कहते हैं, और क्या हो रहा है?
- 140 वर्गमीटर से बड़े भवनों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग जरूरी।
- नियम के बावजूद कई इमारतों में कोई सिस्टम ही नहीं।
- प्रभावशाली बिल्डर, होटल, स्कूल और अस्पताल सबसे आगे नियम तोड़ने में।
- शहर: भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन- हर जगह एक जैसी कहानी।
जमीनी जांच में खुली हकीकत
अंदरूनी जांच (रिपोर्ट) में सामने आया कि 185 मामलों की पड़ताल में 41 जगह सीधे नियमों का उल्लंघन मिला। कई बड़े परिसरों में पानी सहेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
बड़े प्रोजेक्ट्स में खुली अनदेखी
जांच में सामने आया कि प्रदेश के कई बड़े और हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट्स ने भी रेन वॉटर हार्वेस्टिंग जैसे अनिवार्य नियमों को गंभीरता से नहीं लिया। इनमें शामिल हैं-
- भोपाल: बीएसएसएस कॉलेज (2.295 हेक्टेयर)
- ग्वालियर: इंपीरियल गोल्फ रिजॉर्ट (6.656 हेक्टेयर)
- भोपाल: सौम्या होम्स प्रा. लि. (3.418 हेक्टेयर)
- भोपाल: पारुल डेवलपर (3.550 हेक्टेयर)
- उज्जैन: तिरुपति रियल्टीज (2.740 हेक्टेयर)
इतने बड़े भू-क्षेत्र में फैले इन प्रोजेक्ट्स में अगर जल संरक्षण के नियमों की अनदेखी होती है, तो यह साफ संकेत है कि निगरानी तंत्र या तो कमजोर है या फिर जानबूझकर ढील दी जा रही है।
बड़े नाम, लेकिन जिम्मेदारी शून्य कई प्रमुख संस्थानों/प्रोजेक्ट्स में अनियमितताएं सामने आईं है। यानी जहां संसाधन सबसे ज्यादा हैं, वहीं नियमों की सबसे ज्यादा अनदेखी।
नगर निगम की भूमिका पर गंभीर सवाल
सबसे बड़ा खुलासा ये है कि कई भवनों को बिना साइट निरीक्षण के ही NOC दे दी गई। दस्तावेजों में सब ‘ठीक’, जमीन पर कुछ भी नहीं अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय आंखें मूंद लीं यही वजह है कि नियम सिर्फ फाइलों में सीमित रह गए।
पार्किंग भी बनी ‘कमाई का जरिया’
- 142 मामलों की जांच में 24 जगह पार्किंग का गलत उपयोग।
- पार्किंग को किचन, स्टोर और कमरों में बदला गया।
- भोपाल-ग्वालियर में 99 केस, इंदौर में 7 मामले।
नतीजा- सड़कों पर गाड़ियां, रोज जाम
यानी नियम तोड़ने का असर सीधे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था पर पड़ रहा है। आम जनता पर दोहरी मार एक तरफ पानी की कमी, दूसरी तरफ जाम की समस्या। सरकार जल संरक्षण के दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर न नियम लागू हो रहे हैं, न निगरानी हो रही है।
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