रायसेन खेल स्टेडियम विवाद: करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी ताले में बंद ग्राउंड?

Ramanand Tiwari | Aug 13, 2026, 23:49 IST
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रायसेन की चार विधानसभाओं में बने खेल स्टेडियम वर्षों बाद भी खिलाड़ियों के लिए नहीं खुले। हैंडओवर, निर्माण गुणवत्ता और निगरानी को लेकर सवाल हैं। अब जांच के आश्वासन के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई का इंतजार है।

ऐसे समझें पूरा मामला..

  • चारों स्टेडियम वर्षों से बंद पड़े हैं
  • पंचायतों ने परिसरों को हैंडओवर नहीं लिया
  • निर्माण गुणवत्ता पर उठ रहे गंभीर सवाल
  • खिलाड़ियों के लिए अब तक शुरू नहीं हुए
  • कलेक्टर ने जांच का भरोसा दिया।

रायसेन में खिलाड़ियों के लिए बनाए गए चार खेल परिसर अब व्यवस्था की अनदेखी की कहानी बनते दिख रहे हैं। निर्माण पूरा होने के वर्षों बाद भी इन मैदानों में खेल गतिविधियां शुरू नहीं हो सकीं। कहीं हैंडओवर अटका है, कहीं निर्माण की गुणवत्ता सवालों में है। ऐसे में बड़ा सवाल है-खिलाड़ियों के लिए बनाई गई सुविधा आखिर खिलाड़ियों से ही दूर क्यों है?



चार विधानसभा, चार स्टेडियम और ताले

उदयपुरा के देवरी, सिलवानी के जुनिया, सांची के आमखेड़ा और भोजपुर के देवटिया में खेल स्टेडियम बनाए गए हैं।



योजना का मकसद ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को स्थानीय स्तर पर अभ्यास और प्रतियोगिताओं की सुविधा देना था। लेकिन निर्माण के बाद भी ये परिसर नियमित खेल गतिविधियों के लिए शुरू नहीं हो पाए।



कई जगह पंचायतों ने इन्हें औपचारिक रूप से हैंडओवर तक नहीं लिया है।



कागज पर काम पूरा, मैदान खाली

सांची के आमखेड़ा का मामला खास तौर पर सवाल खड़े करता है। परिसर के बोर्ड और विभागीय रिकॉर्ड में निर्माण की तारीखों को लेकर अंतर दिखाई देता है।



जब सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण पूरा बताया जा रहा है, तो फिर परिसर खिलाड़ियों के लिए बंद क्यों है?



यही सवाल निर्माण, निरीक्षण, भुगतान और हैंडओवर की पूरी प्रक्रिया को जांच के घेरे में लाता है।



सुविधा के बजाय बदहाली

जिन परिसरों में बच्चों को खेलना और अभ्यास करना था, वहां लंबे समय से उपयोग नहीं होने के कारण बदहाली नजर आ रही है।



स्थानीय स्तर पर इन परिसरों में असामाजिक गतिविधियों की शिकायतें भी सामने आई हैं। यदि खेल परिसर सुरक्षित और सक्रिय नहीं रहेंगे तो उनका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।



सिर्फ भवन से खिलाड़ी तैयार नहीं होते

खेल मैदान बनाना पहला कदम है। उसके बाद प्रशिक्षक, खेल शिक्षक, उपकरण, नियमित प्रतियोगिताएं और बेहतर रखरखाव जरूरी हैं।



मैदान तैयार होने के बावजूद अगर बच्चे वहां अभ्यास नहीं कर पा रहे हैं, तो पूरी योजना की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।



यहीं खेल एवं युवा कल्याण विभाग की जिम्मेदारी भी सामने आती है।



शिकायतें आती रहीं, सिस्टम जागा क्यों नहीं?

खेल सुविधाओं से जुड़ी शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। कहीं प्रशिक्षण व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो कहीं खिलाड़ियों को पुरस्कार और प्रोत्साहन राशि मिलने में देरी की शिकायतें सामने आती हैं।



ऐसे मामलों में सिर्फ जिम्मेदारी आगे बढ़ाने के बजाय विभाग को यह देखना होगा कि समस्या बार-बार क्यों पैदा हो रही है।



निर्माण एजेंसी और निगरानी पर सवाल

निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल हैं तो जांच केवल ठेकेदार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।



काम की गुणवत्ता किसने जांची? निर्माण पूरा होने की रिपोर्ट किस अधिकारी ने स्वीकार की? भुगतान किस आधार पर हुआ? हैंडओवर क्यों अटका?



इन सवालों के जवाब से ही पता चलेगा कि गलती कहां हुई और जवाबदेही किसकी बनती है।



यदि तकनीकी खामियां मिलती हैं तो निर्माण एजेंसी के साथ निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांचना जरूरी होगा।



अब कलेक्टर की जांच पर नजर

कलेक्टर ने मामले में जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब देखना होगा कि जांच कितनी जल्दी शुरू होती है और जिम्मेदारी किस पर तय होती है।



खेल प्रतिभाओं को सुविधाओं के लिए वर्षों इंतजार नहीं कराया जा सकता। प्रदेश सरकार बच्चों से प्रदेश और देश का नाम रोशन करने की उम्मीद करती है, लेकिन उसके लिए मैदान और व्यवस्था भी देनी होगी।



अब सवाल सिर्फ ताले खोलने का नहीं है। सवाल यह है कि खिलाड़ियों के लिए बनी सुविधा वर्षों तक बंद क्यों रही और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?



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निर्माण एजेंसी की मनमानी



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