रीवा में ACS ने जिस डॉक्टर को हटाने के दिए थे आदेश, तीन साल बाद हो सका निलंबन, उठे सवाल
रीवा में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के बाद अस्पताल व्यवस्था सवालों में है, लेकिन सामने आए पुराने सरकारी पत्र ने मामला और गंभीर कर दिया है। मार्च 2023 में अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य मोहम्मद सुलेमान ने डॉ. सोनल अग्रवाल को सेवा से पृथक करने और डॉ. बीनू सिंह की तीन वेतनवृद्धियां रोकने के निर्देश दिए थे।
अब तीन साल बाद सोनल अग्रवाल के निलंबन ने सवाल खड़ा कर दिया है कि ACS के उस आदेश का पालन आखिर हुआ कहां?
तीन साल पुराना आदेश, फिर वही डॉक्टर
मार्च 2023 के सरकारी पत्र में तत्कालीन एसीएस मोहम्मद सुलेमान ने जांच समिति के निष्कर्षों के आधार पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
पत्र में डॉ. बीनू सिंह की तीन वेतनवृद्धियां असंचयी प्रभाव से रोकने और डॉ. सोनल अग्रवाल को सेवा से पृथक करने का निर्णय दर्ज था।
इतना ही नहीं, पत्र की प्रति तत्कालीन रीवा संभागायुक्त अनिल सुचारी को भी भेजी गई थी। कार्रवाई सुनिश्चित कर पालन प्रतिवेदन शासन को उपलब्ध कराने को कहा गया था।
अब सवाल सीधा है-अगर सोनल अग्रवाल को सेवा से पृथक करने का निर्णय हो चुका था, तो वह तीन साल बाद रीवा के उसी चिकित्सा तंत्र में कैसे कार्यरत थीं?
2026 में फिर कार्रवाई ने बढ़ाए सवाल
कल्पना मिश्रा की मौत के बाद ड्यूटी डॉक्टर डॉ. सोनल अग्रवाल और निश्चेतना विभाग की डॉ. निधि पांडे को निलंबित किया गया। निलंबन आदेश में प्रथमदृष्टया घोर लापरवाही और गंभीर अनुशासनहीनता का उल्लेख किया गया है।
यहीं 2023 और 2026 के दोनों सरकारी दस्तावेज आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। तीन साल पहले सेवा से पृथक करने का निर्णय और अब निलंबन-बीच के तीन साल की कहानी कौन बताएगा?
असली सवाल आदेश नहीं, उसका पालन है
मामला अब केवल यह जानने का नहीं है कि 2023 में क्या आदेश हुआ था। सवाल यह है कि उस आदेश के बाद क्या कार्रवाई हुई? सोनल अग्रवाल को सेवा से पृथक क्यों नहीं किया गया??
यदि नहीं, तो आदेश किस स्तर पर रुका? क्या तत्कालीन संभागायुक्त कार्यालय से पालन प्रतिवेदन भेजा गया? यदि भेजा गया तो उसमें क्या लिखा गया?
इन सवालों का जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सीधे सरकारी आदेशों की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।
बीनू सिंह की कार्रवाई पर भी सवाल
2023 के पत्र में डॉ. बीनू सिंह की तीन वेतनवृद्धियां रोकने का स्पष्ट निर्णय दर्ज है। अब यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि वेतनवृद्धियां वास्तव में रोकी गईं या नहीं।
अगर रोकी गईं तो कितने समय के लिए रोकी गईं? बाद में विभागीय कार्रवाई किस निष्कर्ष पर पहुंची? और यदि इसके बाद उन्हें पदोन्नति मिली, तो उसकी प्रक्रिया और नियम क्या थे?
इन सवालों के जवाब किसी व्यक्ति पर आरोप तय करने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी निर्णयों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए जरूरी हैं।
कल्पना की मौत ने पुराने सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात की मौत के बाद अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई हुई है। अस्पताल अधीक्षक को भी पद से हटाया गया।
लेकिन परिवार सिर्फ निलंबन से संतुष्ट नहीं है। पिता रामशिरोमणि मिश्रा एफआईआर और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या कार्रवाई सिर्फ मौजूदा घटना तक सीमित रहेगी या 2023 से लेकर 2026 तक की पूरी प्रशासनिक कड़ी भी जांच के दायरे में आएगी?
मंत्री के गृह जिले में सिस्टम पर सवाल
रीवा उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य विभाग के मंत्री राजेंद्र शुक्ल का गृह क्षेत्र है। ऐसे में मामला राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। सवाल सरकार से है कि जब विभाग के मंत्री के गृह जिले में ही पुराने ACS आदेश के पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो दूरदराज के ग्रामीण अस्पतालों में सरकारी निर्देशों की निगरानी कितनी प्रभावी है?
भोपाल में समीक्षा बैठकें होती हैं। आदेश जारी होते हैं। जांच समितियां बनती हैं और पालन प्रतिवेदन मांगे जाते हैं। लेकिन जमीन पर अगर आदेश की स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो फिर फाइल और हकीकत के बीच की दूरी कौन तय करेगा?
अब सरकार को देना होगा जवाब
रीवा का मामला सिर्फ कल्पना मिश्रा की मौत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सरकारी सिस्टम में आदेश, पालन और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था की परीक्षा है।
2023 का आदेश मौजूद है। 2026 का निलंबन आदेश भी सामने है। अब इन दोनों के बीच के तीन साल का हिसाब जरूरी है।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पुराने आदेश पर क्या कार्रवाई हुई, किसने पालन कराया और यदि पालन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी थी।
क्योंकि सवाल सिर्फ कल्पना मिश्रा के परिवार के न्याय का नहीं है। सवाल यह भी है कि सरकारी आदेश आखिर आदेश है या सिर्फ फाइल का एक कागज?
इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं रीवा संभाग के कमिश्नर से उनका पक्ष जानने के लिए मोबाइल फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन किसी से भी बात नहीं हो सकी। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. विनोद शर्मा ने कहा कि वर्ष 2023 में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य मोहम्मद सुलेमान ने डॉ. सोनल अग्रवाल को सेवा से पृथक करने के निर्देश दिए थे, लेकिन तीन साल बाद वही डॉक्टर रीवा में सेवा देती मिलीं और अब कल्पना मिश्रा की मौत के मामले में निलंबित हुई हैं।
सवाल सीधा है-ACS का आदेश फाइलों में दबाया सिस्टम ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं?
आदेश की प्रति तत्कालीन संभागायुक्त को भी भेजी गई थी, फिर इसका पालन क्यों नहीं हुआ और जिम्मेदारी किसकी तय हुई? यही स्थिति डॉ. बीनू सिंह की वेतनवृद्धियों को लेकर भी सवाल खड़े करती है। जब भोपाल से आदेश जारी होता है और रीवा में उसका असर दिखाई नहीं देता, तो फिर समीक्षा बैठकों और सरकारी निर्देशों का मतलब क्या रह जाता है?
डॉ. शर्मा ने कहा कि यह मामला इसलिए और गंभीर है क्योंकि रीवा उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का गृह क्षेत्र है। मंत्री के अपने क्षेत्र में ही शासन के वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की ऐसी अनदेखी सवालों के घेरे में है।
सिर्फ डॉक्टरों को निलंबित कर देने से जवाबदेही पूरी नहीं होगी;
यह भी सामने आना चाहिए कि 2023 के आदेश पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और तीन साल तक फाइल किसके संरक्षण में चलती रही? सरकार को डॉक्टरों के साथ उन अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए, जिनके स्तर पर आदेश के पालन में चूक हुई।चाहें तो इसे और ज्यादा तीखा राजनीतिक पंच देते हुए 4–5 छोटी लाइनों में भी बनाया जा सकता है।
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