इंडियन एक्सप्रेस की संपादक रितिका चोपड़ा ने बताए सबसे बड़े इन्वेस्टीगेशन के सीक्रेट
मैं रितिका चोपड़ा हूं। इंडियन एक्सप्रेस में 11 साल से काम कर रही हूं। लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि यह इन्वेस्टिगेशन मैंने कैसे की। चलिए, मैं शुरू से बताती हूं...
मैं उस न्यूज रूम में काम करती हूं, जहां इन्वेस्टिगेशन को सेलिब्रेट किया जाता है। हमें जो खबर मिली, वह लोगों को सच में समझ आई। बहुत-सी थ्योरीज आ रही हैं कि किसी ने कागज पकड़ा दिए। हमें यह लगभग एक साल पहले पता लगा था, लेकिन हम लोगों से बात करते रहे। जब हम सबूत इकट्ठे करने निकले, तो मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और गोवा गए। पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार इन दोनों इलेक्शन कमिश्नर्स ने आपत्तियां जताईं। इससे पता लगता है कि इलेक्शन कमीशन में लोग आईटी डिवीजन के कामकाज के तरीके से काफी नाराज थे।
आप इसी साल के इंडियन एक्सप्रेस के अखबार खोलकर देख लीजिए। हमारा यह साल काफी अच्छा रहा, इस साल हमने बहुत अच्छी इन्वेस्टिगेशंस कीं। इसलिए मैं इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं कि यह इस साल की या पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी इन्वेस्टिगेशन है। मुख्यमंत्री मोहन यादव जी के बारे में जो इन्वेस्टिगेशन थी, एचडीएफसी को लेकर हमारे कलीग संदीप सिंह जी ने जो इन्वेस्टिगेशन की थी, और अभी केपीएससी को लेकर एक बहुत बड़ी इन्वेस्टिगेशन आई थी।
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आप पूछेंगे, मुझे इससे क्या लेना-देना? पर सोचिए, वोटर लिस्ट में आपका नाम है या नहीं, यह सीधे आपके वोट देने के हक से जुड़ा है। मैं खुद दिल्ली की वोटर हूं। मुझे भी हाल ही में SIR की चिट्ठी मिली और मेरा नाम लगभग रिजेक्ट होते-होते बचा। तो यह मुद्दा किसी और का नहीं, हम सबका है।
10 साल की मेहनत का नतीजा है ये रिपोर्ट
मैं चुनाव आयोग को 10 साल से कवर कर रही हूं। एसआईआर कोई नई प्रक्रिया नहीं है, यह पहले भी हुई है, आखिरी बार 2002-03 में। इस बार फर्क यह रहा कि नए-नए तरीके अपनाए गए। फॉर्म 6 में बदलाव हुए और नाम जोड़ने-हटाने का सॉफ्टवेयर भी नया आया, जिसे ECINet कहते हैं। यहीं से कमीशन के अंदर खींचतान शुरू हुई।
EC में भरोसेमंद संबंध बनाने का नतीजा
रिपोर्ट आने के बाद लोग सोशल मीडिया पर बहुत फिल्मी थ्योरी बना रहे हैं, जैसे किसी ने मुझे कागज पकड़ा दिए हों। ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैं अपने सोर्स का नाम नहीं बता सकती, यह मेरा उसूल है। पर इतना जरूर कहूंगी कि यह इन्वेस्टिगेशन रातों-रात नहीं बनी। यह 10 साल की बीट रिपोर्टिंग का नतीजा है। किसी नए जर्नलिस्ट को यदि ऐसी खबर चाहिए, तो कोई शॉर्टकट नहीं है। बड़ी ब्रेकिंग चाहिए, तो पूरे धैर्य से लगातार लगे रहना पड़ेगा… हर कागज जुटाइए और उस कागज का काउंटर कागज भी… इतने संवेदनशील मामलों में आप जो भी एक लाइन रिपोर्ट करेंगे, उसका प्रूफ आपके पास होना ही चाहिए।
अब मैं चार बड़ी बातें विस्तार से बताती हूं…
पहली, फॉर्म 6 पर आपत्ति थी। जब कोई पहली बार वोटर बनता है, तो वह यही फॉर्म भरता है। दोनों कमिश्नरों, यानी सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को दिक्कत बदलाव से नहीं, प्रक्रिया से थी। उनका कहना था कि बदलना है, तो कानूनी रास्ता अपनाओ, नया प्रस्ताव भेजो।
हड़बड़ी में वह प्रक्रिया छोड़ दी गई। फॉर्म ऑनलाइन बदल दिया गया और कमिश्नरों को इसका पता मीडिया से चला, फाइल से नहीं। तभी विवेक जोशी जी ने फाइल पर लिखा कि हमसे तो किसी और प्रस्ताव पर बात हुई थी, यह कब बदल गया?
दूसरी, ECINet सॉफ्टवेयर को लेकर थी। कानून कहता है कि जिला स्तर का अफसर, यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), वोटर लिस्ट का असली कस्टोडियन है। वही नाम जोड़ेगा, हटाएगा और बहाल करेगा। यह एक तरह से डिसेंट्रलाइज्ड सिस्टम है। पर दिल्ली से आईटी डिवीजन जिस सॉफ्टवेयर को कंट्रोल करता है, वह उनके काम में बार-बार रुकावट डाल रहा था। सुखबीर सिंह संधू जी ने कड़ा नोट लिखा कि जब कानून कहता है कि यह हमारे हाथ में है, तो हम इसे अपने हाथ में लेने की कोशिश क्यों कर रहे हैं।
इस मामले में भी मैंने कई ERO से पर्सनली बात की और उस बदलाव को समझा, जो अचानक कर दिया गया। एक तरह से ERO को पावरलेस कर दिया गया। गोवा से एक के बाद एक 8 चिट्ठियां इस मामले को लेकर ERO को लिखी गईं, मगर कोई रिस्पॉन्स ही नहीं मिला।
तीसरी, पश्चिम बंगाल से जुड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में कमीशन से पूछा कि बंगाल में करीब 38 लाख अपीलें दाखिल हुई हैं, इनका ब्योरा दीजिए। मुझे सबसे दिलचस्प यह लगा कि उसी समय कमीशन के अंदर विवेक जोशी जी भी बिल्कुल वही सवाल पूछ रहे थे कि हमें बताया जाए, ये अपीलें किसने दाखिल कीं। बाहर जितना पता था, अंदर भी उतना ही पता था, यानी कुछ नहीं।
चौथी और सबसे बड़ी बात गोवा की है। कुछ वोटरों के नाम पर लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का फ्लैग लगा था, यानी शायद वे एलिजिबल नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उनकी सार्वजनिक सुनवाई हुई। करीब 650 से 700 लोग सामने आए और स्थानीय अफसरों ने तय किया कि इनमें से 97 के नाम वापस जुड़ने चाहिए। पर जब कोशिश हुई, तो सॉफ्टवेयर ने इजाजत ही नहीं दी। 11 से 17 फरवरी के बीच आठ बार लिखित अनुरोध गया, कभी-कभी एक दिन में दो-तीन बार। आखिर में एक डिप्टी कमिश्नर ने भी साथी अफसर को लिखा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, इसे रोका नहीं जा सकता। फिर भी 21 फरवरी को जब फाइनल रोल छपा, तो वे 97 नाम उसमें नहीं थे। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सीधी अवहेलना जैसा मामला बनता है।
इसी दौरान एक और घटना हुई, जुलाई के आखिर में। कमीशन के एडमिनिस्ट्रेशन डिवीजन का चार्ज संभालने वाले एक सीनियर अफसर छुट्टी पर गए। एक दिन के भीतर उनका चार्ज मनीष गर्ग जी को दे दिया गया और कुछ ही घंटों में एक ऐसा ऑर्डर निकला, जिसने आईटी डिवीजन पर सुपरविजन रखने वाले सीनियर अफसर को हटा दिया। नतीजा यह हुआ कि आईटी डिवीजन को लेकर पहले से जो नाराजगी थी, वह और गहरी हो गई। बात इतनी बढ़ी कि कमीशन ने कैबिनेट सचिव को चिट्ठी तक लिख दी, जो अपने आप में बेमिसाल कदम था। आखिरकार दोनों कमिश्नरों ने साथ आकर पुराना वर्क एलोकेशन बहाल करने के आदेश पर साइन किए।
कमीशन सही सवालों के जवाब ही नहीं दे रहा…
विपक्ष का नजरिया और मेरी सीमा
मेरी रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने इसे वोट चोरी के अपने नैरेटिव से जोड़ना शुरू किया। कांग्रेस हो, आम आदमी पार्टी हो या टीएमसी, सबने इसका जिक्र किया। पर एक रिपोर्टर के तौर पर मैं सिर्फ उतना ही कहूंगी, जितना मैंने वेरिफाई किया है। आरोप और तथ्य में फर्क होता है। मैंने जो पाया, वह यह है कि कमीशन के अंदर दो अहम सदस्य कई मुद्दों पर खुश नहीं थे। इससे आगे की राजनीतिक कड़ियां जुड़ती हैं या नहीं, इस पर मैं टिप्पणी नहीं करना चाहती।
SIR की आलोचना क्यों बढ़ी
मुझे यह भी लगता है कि लोगों की तकलीफ सिर्फ प्रक्रिया की जटिलता से नहीं, बल्कि कमीशन के बदलते रवैये से भी है। दशकों से कमीशन का नारा रहा है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोटर बनाया जाए, कोई पीछे न छूटे। अब एलिजिबिलिटी साबित करने की जिम्मेदारी वोटर पर डाल दी गई है और उसके लिए दस नए दस्तावेज जोड़ दिए गए हैं। गोवा में जिन 97 लोगों ने पूरी मेहनत से अपने कागज दिए, उनमें कई गरीब मजदूर भी थे, जिनकी एक दिन की मजदूरी दांव पर लगी। यही वजह है कि यह प्रक्रिया अब समावेशन (Inclusion) की जगह बहिष्करण (Exclusion) की प्रक्रिया लगने लगी है।
अब मुझे नहीं पता कि गोवा के उन 97 नामों पर कमीशन आगे क्या करेगा। सुप्रीम कोर्ट इस देरी को कैसे देखेगा, यह भी देखना बाकी है। बाकी राज्यों में चल रही SIR प्रक्रिया पर अब सबकी नजर रहेगी।
कौन हैं रितिका चोपड़ा
रितिका चोपड़ा इंडियन एक्सप्रेस की मुंबई एडिटर हैं। कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से पढ़ाई करने वाली रितिका पिछले 17 साल से पत्रकारिता में हैं। वे 11 साल से इंडियन एक्सप्रेस के साथ हैं और एक दशक से चुनाव आयोग की रिपोर्टिंग करती आई हैं।
उनका काम सिर्फ इस एक रिपोर्ट तक सीमित नहीं है। साल 2024 में उन्हें महिला पत्रकारों को दिए जाने वाले प्रतिष्ठित चमेली देवी जैन अवॉर्ड से नवाजा गया, सरकारी नीतियों की खामियां उजागर करने वाली उनकी रिपोर्टिंग के लिए। इससे पहले 2021 में चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर उनकी सीरीज को रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला। साल 2020 में, 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की रिपोर्टिंग के लिए उन्हें IPI-India अवॉर्ड मिला था।
पॉडकास्ट में वे खुद बताती हैं कि किसी संस्था को समझने में सालों लगते हैं। उसकी हिस्ट्री जाननी होती है, लोगों से भरोसे का रिश्ता बनाना होता है। उनकी प्राथमिकता क्या है? फेयरनेस और एक्यूरेसी। नमक-मिर्च लगाकर खबर नहीं, सिर्फ फैक्ट्स।
FAQ
- SIR क्या है?
SIR यानी Special Intensive Revision, वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक गहन प्रक्रिया है। इसमें घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी दोबारा जांची जाती है। पिछली बड़ी SIR 2002-03 में हुई थी। - रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट में मुख्य दावा क्या है?
रिपोर्ट का दावा है कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार आपत्ति दर्ज की। मुख्य विवाद फॉर्म 6 में बदलाव और ECINet सॉफ्टवेयर के कंट्रोल को लेकर है। चुनाव आयोग ने इसे सामान्य मतभेद बताया है। - क्या मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी SIR हुआ है?
हां, तीनों राज्यों में SIR प्रक्रिया दूसरे चरण में अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच पूरी हुई। इसी दौरान वही फॉर्म 6 और ECINet सिस्टम इस्तेमाल हुआ, जिस पर विवाद खड़ा हुआ है।
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