समग्र पोर्टल पर सेंधमारी का मामला विधानसभा पहुंचा, अब तीसरी वेबसाइट का खुलासा

Neel Tiwari | Aug 06, 2026, 17:54 IST
Photograph: (THESOOTR)
द सूत्र की पड़ताल के बाद समग्र आईडी से जुड़े अनधिकृत बदलावों का मामला मध्य प्रदेश विधानसभा तक पहुंच गया। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में दिए जवाब में वेबसाइट बंद मिलने और साइबर पुलिस को सूचना देने की बात कही।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • द सूत्र ने समग्र आईडी से जुड़े अनधिकृत बदलावों का मामला उठाया।
  • मामला मध्य प्रदेश विधानसभा तक पहुंचा और इस पर प्रश्न पूछा गया।
  • मुख्यमंत्री ने जवाब में वेबसाइट बंद मिलने और साइबर पुलिस को सूचना देने की जानकारी दी।
  • द सूत्र कर रहा समग्र पोर्टल में सेंधमारी करने वाली तीसरी वेबसाइट का खुलासा
  • अब सबसे बड़ा सवाल जांच, जवाबदेही और सिस्टम की सुरक्षा को लेकर है।

द सूत्र की पड़ताल के बाद समग्र पोर्टल में घुसपैठ का मामला अब विधानसभा तक पहुंच चुका है। जबलपुर के भाजपा विधायक सुशील इंदु तिवारी ने इस विषय पर सरकार से सीधा सवाल पूछा।



सवाल था कि क्या एक निजी वेबसाइट के जरिए समग्र रिकॉर्ड में बदलाव किए जा रहे थे। साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या बिना ओटीपी और दस्तावेजों के बदलाव हो रहे थे और इस पर क्या कार्रवाई हुई।



मुख्यमंत्री के जवाब में क्या कहा गया?

विधानसभा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ओर से विधानसभा में उत्तर दिया गया। जवाब में कहा गया कि उत्तर की तारीख पर संबंधित वेबसाइट अकार्यशील मिली। इसलिए शिकायत की पुष्टि नहीं की जा सकी। साथ ही यह भी बताया गया कि MPSEDC ने साइबर क्राइम पुलिस को सूचना दे दी है। यहीं से इस पूरे मामले में नए सवाल खड़े होने लगे।



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पहले से जानकारी थी, फिर जांच कितनी आगे बढ़ी?

द सूत्र ने 17 जुलाई 2026 को पहली खबर प्रकाशित होने के बाद MPSEDC के अधिकारियों से संपर्क किया गया था। बातचीत के बाद इन वेबसाइट की जानकारी साझा की गई।



बाद में MPSEDC के अधिकारियों ने भी साइबर पुलिस को सूचना देने की पुष्टि की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि विभाग को पहले से जानकारी थी, तो तकनीकी जांच किस स्तर तक पहुंची और अब तक उसका परिणाम क्या है।



क्या सिर्फ वेबसाइट बंद होना ही कार्रवाई है?

विधानसभा के जवाब में वेबसाइट बंद मिलने का उल्लेख किया गया। लेकिन यह स्पष्ट नहीं हुआ कि कथित अनधिकृत एक्सेस की तकनीकी जांच कितनी आगे बढ़ी। क्या सर्वर लॉग की जांच हुई?



क्या संदिग्ध लॉगिन की पहचान की गई? क्या प्रभावित समग्र रिकॉर्ड का ऑडिट किया गया? इन सवालों पर अब भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।



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दूसरी वेबसाइट भी हुई बंद

पहली वेबसाइट के बाद द सूत्र ने "आशु ऑनलाइन" नाम से एक अन्य प्लेटफॉर्म का खुलासा किया । इस प्लेटफॉर्म पर भी बिना ओटीपी के समग्र में बदलाव जैसी सेवाएं दी रही थी। द सूत्र की खबर प्रकाशित होने के 2 दिन बाद यह वेबसाइट भी बंद हो गई।



अब तीसरी वेबसाइट का खुलासा

द सूत्र की नई पड़ताल में अब "mydegi.in" नाम से एक और वेबसाइट सामने आया है। पड़ताल के अनुसार इस प्लेटफॉर्म पर भी अलग-अलग शुल्क लेकर आईडी क्रिएट हो रही है और उसके बाद बिना ओटीपी ऑथेंटिकेशन या दस्तावेजों के बड़े बदलाव किए जा रहे हैं।



मास्टर डिस्ट्रीब्यूटर ID 1499 रूपये, डिस्ट्रीब्यूटर ID 799 रूपये और रिटेलर आईडी 299 रूपये में ठीक उसी तरह बन रही है जिस तरह mpvala.com में बनती थी। साथ ही इसमें पहले जैसी कई समग्र सेवाएं उपलब्ध हैं।



व्हाट्सएप चैनल ने बढ़ाई चिंता

पड़ताल के दौरान एक व्हाट्सएप चैनल भी सामने आया । इसमें समग्र से जुड़ी अवैध सेवाओं का खुलेआम प्रचार किया जा रहा है। इसे देख कर तो यही लगता है कि यह केवल एक वेबसाइट का नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क का काम है।



MPSEDC से बातचीत में क्या सामने आया?

द सूत्र ने MPSEDC के अधिकारियों से दोबारा बातचीत की। बातचीत में विभागीय जांच और सर्वर लॉग की जांच को लेकर सवाल पूछे गए। MPSEDC के इंद्र बिसेन से बातचीत में यह भी सामने आया कि MPSEDC के अधिकारियों के पास सर्वर लॉग का प्रत्यक्ष एक्सेस नहीं है।



यदि ऐसा है, तो यह सवाल उठता है कि समग्र पोर्टल (Samagra Portal) जैसे महत्वपूर्ण सिस्टम में संदिग्ध गतिविधियों की तकनीकी जांच किस एजेंसी द्वारा की जाती है। और मध्य प्रदेश शासन की सभी वेबसाइट की सुरक्षा का जिम्मा आखिर किसका है।



अब सबसे बड़ा सवाल...

इस पूरे मामले में तीन तथ्य सामने हैं।

  • पहला, मामला विधानसभा तक पहुंच चुका है।
  • दूसरा, साइबर पुलिस को सूचना दिए जाने की पुष्टि आधिकारिक जवाब में भी है।
  • तीसरा, पहली वेबसाइट बंद होने के बाद दूसरी और अब तीसरी वेबसाइट सामने आ गई है।

अब जरूरत इस बात की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र साइबर फॉरेंसिक जांच हो। यदि किसी तरह का अनधिकृत एक्सेस हुआ है, तो उसकी तकनीकी जांच, सर्वर लॉग का ऑडिट और प्रभावित रिकॉर्ड की पहचान की जाए। इससे न केवल सच्चाई सामने आएगी, बल्कि करोड़ों नागरिकों की डिजिटल पहचान पर भरोसा भी मजबूत होगा।



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