सांदीपनि स्कूल बस सुविधा का वादा अधूरा: 19 जिलों के करीब 1.5 लाख बच्चे पैदल या जोखिम भरे साधनों से स्कूल जाने को मजबूर हैं
समझें क्या है पूरा मामला
मध्य प्रदेश में करीब 2,500 छोटे स्कूलों को बंद कर सांदीपनि स्कूल में मर्ज किया था। इस प्रक्रिया के बाद प्रदेश में 270 सांदीपनि स्कूल तैयार किए गए। इन स्कूलों में करीब 3.65 लाख बच्चे हैं। इनमें से 19 जिलों में करीब 1.5 लाख बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें अब तक सांदीपनि स्कूल बस सुविधा नहीं मिल पाई है।
स्कूलों के मर्जर का मकसद कम नामांकन वाले स्कूलों को एक जगह लाकर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना था। इसके साथ बच्चों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं और सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन मुहैया कराने की बात कही गई थी। हालांकि, बस सुविधा का वादा कई जगह अब तक जमीन पर पूरा नहीं हुआ है।
स्कूलों का मर्जर कैसे हुआ
मध्य प्रदेश स्कूल मर्जर के तहत कम नामांकन वाले स्कूलों को करीब पांच किलोमीटर के दायरे में मिलाया गया था। इस प्रक्रिया को शिक्षा का अधिकार यानी RTE के दूरी संबंधी नियमों के दायरे में रखने की बात कही गई थी।
शिक्षा का अधिकार (RTE) के मुताबिक, कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों के लिए स्कूल उनके घर से एक किलोमीटर के भीतर होना चाहिए। वहीं, कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों के लिए स्कूल की दूरी तीन किलोमीटर के अंदर के दायरे में होना चाहिए।
इन्हीं नियमों को ध्यान में रखते हुए करीब 2,500 छोटे स्कूलों को बंद कर उन्हें सांदीपनि स्कूलों में जोड़ा गया था। साथ ही, जिन बच्चों का नया स्कूल तय दूरी से दूर हो गया, उन्हें बस सुविधा देने का वादा किया गया था।
बस सुविधा देने का वादा क्या था
योजना के तहत तय दूरी से बाहर रहने वाले बच्चों के लिए परिवहन की व्यवस्था करने की बात कही गई थी। छटवीं क्लास के बच्चों के लिए एक किलोमीटर और बड़ी क्लास के लिए दो किलोमीटर की दूरी के बाद बस सुविधा देने का पैमाना बताया गया था। यानी बच्चों के घर से स्कूल दूर होने पर उनके आने-जाने की व्यवस्था सरकार को करनी थी। लेकिन कई जगह यह सुविधा अब तक शुरू भी नहीं हो पाई है।
ग्वालियर संभाग में क्या हाल है
ग्वालियर संभाग में बस सुविधा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। जुलाई और सितंबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक, कई महीने से स्कूल संचालित होने के बावजूद बस सेवा शुरू नहीं हुई है। इससे सैकड़ों रूट प्रभावित हुए हैं और छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
एक याचिका के मुताबिक, एक सांदीपनि स्कूल गांव से चार किलोमीटर से ज्यादा दूर था। यह दूरी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक, दोनों स्तरों के RTE नियमों से अधिक बताई गई है। इसके बावजूद वहां बच्चों के लिए परिवहन की व्यवस्था नहीं थी।
गुना में 110 बसों की जरूरत, एक भी नहीं मिली
बसों की कमी केवल ग्वालियर तक सीमित नहीं है। पास के गुना जिले में भी ऐसी स्थिति सामने आई है। अधिकारियों के मुताबिक, करीब छह हजार पांच सौ (6,500) बच्चों के लिए 110 बसों की जरूरत थी। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से एक भी बस उपलब्ध नहीं कराई गई है।
इसकी वजह से बच्चों को पैदल और प्राइवेट वाहनों से स्कूल जाना पड़ रहा है। इससे उन परिवारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं, जो अपने बच्चों के लिए अलग से प्राइवेट वाहनों का खर्च नहीं उठा सकते हैं।
बिना बस के रोज क्या झेल रहे हैं बच्चे
बस सुविधा नहीं होने का असर बच्चों की रोजमर्रा की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में कई बच्चों को तेज गर्मी और बारिश के दौरान लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। ऐसे में छोटे बच्चे स्कूल पहुंचने से पहले ही थक जाते हैं।
कुछ परिवार बच्चों को ट्रैक्टर-ट्रॉली और भीड़भाड़ वाले निजी वाहनों से स्कूल भेजने को मजबूर हैं। इससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है।
लंबी दूरी और परिवहन की कमी का असर स्कूल में बच्चों की उपस्थिति पर भी पड़ रहा है। इरेगुलर अटेंडेंस और थकान की वजह से पढ़ाई प्रभावित होने की बात सामने आई है। बसों की कमी के कारण कुछ स्कूलों को ऑड-ईवन या रोटेशन वाले शेड्यूल अपनाने पड़े हैं।
लंबी दूरी तय करने और सुरक्षित परिवहन नहीं मिलने से ड्रॉपआउट का खतरा भी बढ़ सकता है। खासकर छोटी बच्चियों को लेकर परिवारों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ रही है। ऐसे में परिवहन की कमी उनकी नियमित पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है।
कहां अटका है बसों का मामला
बसों की व्यवस्था में सबसे बड़ी अड़चन खरीद प्रक्रिया यानी प्रोक्योरमेंट को बताया गया है। विभाग ने बसों के लिए संभाग स्तर पर टेंडर की प्रक्रिया शुरू की थी। सात संभागों में टेंडर प्रक्रिया पूरी हो गई। लेकिन जबलपुर, ग्वालियर और सागर में यह प्रक्रिया अटक गई है।
बाद में पूरे प्रदेश के लिए एक ही ऑपरेटर से बसें चलाने की व्यवस्था पर विचार किया गया है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था के कारण मंजूरियों में और देरी हुई है। फिलहाल मामला कागजी कार्रवाई में अटका होने की बात कही गई है।
अधिकारी ने क्या कहा
इस मामले में सांदीपनि स्कूलों के अतिरिक्त संचालक आरके सिंह ने कहा कि निदेशक से बात करें। मैं इस पर टिप्पणी नहीं कर सकता हूं। मैं केवल अतिरिक्त संचालक हूं। ऐसे में बसों की अटकी हुई प्रक्रिया और बच्चों को सुविधा मिलने की समयसीमा पर विभाग की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
खबर जरूरी क्यों है
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्कूल दूर होने पर बच्चों की सुरक्षित आवाजाही सीधे उनकी पढ़ाई से जुड़ जाती है। खासकर ऐसे परिवारों के लिए, जो निजी वाहन या महंगा परिवहन नहीं ले सकते हैं। बस सुविधा में देरी का असर बच्चों की नियमित उपस्थिति और पढ़ाई पर पड़ सकता है।
FAQs
- मध्य प्रदेश में स्कूल मर्जर का मुख्य उद्देश्य क्या था?
मध्य प्रदेश में छोटे स्कूलों का मर्जर कम नामांकन वाले स्कूलों को एकत्रित कर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और बच्चों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं एवं सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन प्रदान करना था। - बच्चों के लिए बस सुविधा का क्या वादा किया गया था और वर्तमान स्थिति क्या है?
स्कूलों के मर्जर के बाद, बच्चों के लिए परिवहन की व्यवस्था करने का वादा किया गया था, लेकिन कई स्थानों पर यह सुविधा अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। कई बच्चों को स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ रही है। - बसों की कमी के पीछे क्या कारण हैं और इससे क्या प्रभाव पड़ रहा है?
बसों की कमी का मुख्य कारण खरीद प्रक्रिया में अड़चन बताई गई है। इससे बच्चों को नियमित स्कूल जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें समय पर उपस्थिति और पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव शामिल है।