सतीश सनपाल को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, भारत आकर जांच में देना होगा बयान, FIR रद्द करने की मांग खारिज
समझें क्या है पूरा मामला
- सतीश सनपाल दुबई में रहकर जांच में वीडियो कॉल से शामिल होना चाहता था।
- लॉर्डगंज पुलिस ने सनपाल जांच के लिए भारत बुलाया था।
- सनपाल ने व्यक्तिगत मौजूदगी की जगह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मांगी थी।
- FIR रद्द करने की मांग भी हाई कोर्ट में रखी थी।
- जस्टिस हिमांशु जोशी ने उनकी सभी मुख्य मांगें खारिज कर दीं।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (जबलपुर) ने कारोबारी सतीश सनपाल को कोई राहत नहीं दी है। कोर्ट ने उन्हें भारत आकर जांच में शामिल होने से छूट देने से इनकार कर दिया।
सनपाल ने दुबई से वीडियो कॉल के जरिए बयान दर्ज कराने की अनुमति मांगी थी। साथ ही उन्होंने लॉर्डगंज थाने में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग भी की थी।
इस मामले में जस्टिस हिमांशु जोशी ने 11 अगस्त को फैसला सुनाते हुए दोनों मांगों को खारिज कर दिया। अब जांच एजेंसी अपने तरीके से आगे की कार्रवाई जारी रख सकेगी।
सनपाल ने कहा, दुबई में हैं और भारत नहीं आए
सतीश सनपाल ने इस मामले में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने रिट याचिका दायर की थी।
सनपाल का कहना था कि वह पिछले करीब 8 साल से UAE में रह रहे हैं और दुबई में कारोबार करते हैं। उन्होंने बताया कि वह साल 2020 के बाद से भारत नहीं आए हैं।
2022 की FIR बनी विवाद की वजह
यह मामला जबलपुर के लॉर्डगंज थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है। यह FIR अपराध क्रमांक 441/2022 के तहत दर्ज की गई थी। इसमें जुआ अधिनियम की धारा 4-A के साथ-साथ IPC की धारा 109 और 34 भी लगाई गई थीं। सतीश सनपाल का कहना था कि इस FIR में उनका नाम शामिल नहीं है।
पुलिस ने 2026 में दो नोटिस भेजे
पुलिस ने सतीश सनपाल को 25 जून 2026 को पहला नोटिस भेजा था। इसके बाद 6 जुलाई 2026 को दूसरा नोटिस जारी किया गया।
दोनों नोटिस जांच में शामिल होने और उनकी मौजूदगी को लेकर थे। सनपाल ने इन नोटिस का जवाब अपने वकील के जरिए दिया। उन्होंने कहा कि वे जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बयान देने का प्रस्ताव रखा
सनपाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बयान लेने की मांग की।उसकी ओर से अधिवक्ता ने BNSS की धारा 180(3) का सहारा लिया। BNSS की धारा 530 का भी हवाला दिया। सनपाल कहना था कि तकनीक से जांच आगे बढ़ सकती है। व्यक्तिगत मौजूदगी की जरूरत पर सवाल उठाया।
हाई कोर्ट ने कहा, जांच का तरीका पुलिस तय करेगी
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष और सही तरीके से जांच करना पुलिस की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी माना कि BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) में ऑडियो-वीडियो माध्यम से बयान दर्ज करने का प्रावधान है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में वीडियो के जरिए ही बयान लेना जरूरी होगा।
जांच कैसे करनी है और किस तरीके से आगे बढ़ना है, यह तय करना जांच एजेंसी का अधिकार है।
सनपाल को वीडियो बयान का पक्का अधिकार नहीं मिला
कोर्ट ने साफ कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बयान देना हर व्यक्ति का अधिकार नहीं है। कोई भी आरोपी अपनी सुविधा के हिसाब से जांच का तरीका तय नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी को यह अधिकार है कि वह मामले की जरूरत के अनुसार बयान लेने का तरीका तय करे। इस फैसले में कोर्ट ने इसी बात को अहम माना है।
हालांकि, जांच के दौरान सभी कानूनी प्रक्रियाओं और नियमों का पालन करना जरूरी होगा।
FIR रद्द करने की मांग भी कोर्ट ने ठुकराई
सनपाल ने हाई कोर्ट से FIR रद्द करने की मांग भी की थी। लेकिन कोर्ट ने उनकी यह मांग भी खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि FIR में संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के मामले सामने आ रहे हैं और अभी जांच जारी है। ऐसे में इस स्तर पर FIR को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
भजन लाल केस का भी कोर्ट ने किया जिक्र
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के भजन लाल मामले का भी जिक्र किया। इस फैसले में बताया गया है कि किन परिस्थितियों में FIR को रद्द किया जा सकता है और उसकी सीमाएं क्या हैं।
कोर्ट ने कहा कि सनपाल यह साबित नहीं कर पाए कि उनका मामला उन तय परिस्थितियों में आता है। अदालत को पहली नजर में आरोप बेबुनियाद नहीं लगे।
इसी वजह से हाई कोर्ट ने FIR खत्म करने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
जांच के दौरान गिरफ्तारी पर रोक भी नहीं लगी
सनपाल ने जांच के दौरान आगे की कार्रवाई रोकने की मांग भी की थी। लेकिन हाई कोर्ट ने इस मांग को भी मंजूर नहीं किया।
अदालत ने जांच में दखल देने से इनकार करते हुए कहा कि मामले की जांच अभी कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रही है। ऐसे में जांच एजेंसी की कार्रवाई रोकना सही नहीं होगा।
जांच में देरी का तर्क भी नहीं चला
सनपाल ने जांच में हो रही देरी का मुद्दा भी कोर्ट के सामने रखा था। उनका कहना था कि यह मामला काफी समय से लंबित है।
हालांकि, कोर्ट को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि जांच जानबूझकर देर से की जा रही है। अदालत ने जांच एजेंसी की मंशा पर भी सवाल नहीं उठाए।
इसी वजह से इस आधार पर भी सनपाल को कोई राहत नहीं दी गई।
सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले बताए
सनपाल के वकील ने कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के सुनीता देवी बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला दिया। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के सतीश सनपाल बनाम आव्रजन ब्यूरो मामले का भी जिक्र किया।
हालांकि, इन दलीलों के बावजूद हाई कोर्ट ने मौजूदा मामले में सनपाल को राहत देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा- जांच अधिकारी के सामने सामग्री रखें
एमपी हाई कोर्ट ने सतीश सनपाल के लिए एक विकल्प खुला रखा है। वह जांच अधिकारी के सामने अपनी सभी दलीलें और बातें रख सकते हैं। साथ ही, कानून के तहत मिलने वाली राहत के लिए भी आवेदन कर सकते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि पुलिस को यह निर्देश नहीं दिया जा सकता कि वह बयान लेने के लिए वीडियो माध्यम का ही इस्तेमाल करे।
इन्हीं कारणों के आधार पर हाई कोर्ट ने सनपाल की याचिका खारिज कर दी।
29 जुलाई को सुनवाई पूरी हुई
इस मामले में हाई कोर्ट ने 29 जुलाई 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद जस्टिस हिमांशु जोशी ने 11 अगस्त को अपना फैसला सुनाया।
सुनवाई के दौरान सतीश सनपाल की ओर से अधिवक्ता विपिन यादव ने पक्ष रखा। वहीं, राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता बीडी सिंह पेश हुए।
हाई कोर्ट ने सभी दलीलों पर विचार करने के बाद याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
अब जांच एजेंसी आगे अपने तरीके से बढ़ सकेगी
फैसले के बाद अब जांच एजेंसी के लिए आगे की कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। पुलिस अपनी तय प्रक्रिया के अनुसार जांच जारी रख सकती है।
वहीं, सनपाल जांच में सहयोग करने के लिए कानून के तहत उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने उन्हें वीडियो कॉल के जरिए बयान देने की अनिवार्यता वाली राहत नहीं दी है।
इसके साथ ही लॉर्डगंज थाने में दर्ज FIR फिलहाल बरकरार रहेगी।
क्या है इस फैसले का सबसे बड़ा असर
इस फैसले का असर अब जांच की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विदेश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति हर मामले में वीडियो कॉल के जरिए बयान दर्ज कराने की मांग नहीं कर सकता।
हर जांच का तरीका अदालत तय नहीं करेगी। मामले की जरूरत और परिस्थितियों के हिसाब से जांच एजेंसी प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
हालांकि, पुलिस को जांच करते समय कानून में तय नियमों और सीमाओं का पालन करना होगा।
फैसले का सार एक नजर में
हाई कोर्ट ने सतीश सनपाल की रिट याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बयान दर्ज कराने की अनुमति नहीं दी।
साथ ही, भारत आकर जांच में शामिल होने से भी उन्हें कोई छूट नहीं मिली। लॉर्डगंज थाने में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग भी अदालत ने खारिज कर दी।
अब जांच एजेंसी अपने तय तरीके से मामले की जांच आगे बढ़ा सकेगी।
सतीश सनपाल की यह 6 याचिका हुई खारिज
सनपाल ने अलग-अलग मामलों में कुल 6 याचिकाएं दायर की थी। जस्टिस हिमांशु जोशी ने सभी याचिकाएं खारिज कर दी है। देखिए याचिकाओं में क्या मांग की गई थी और किस कारण से उन्हें खारिज किया गया।
- क्राइम नंबर 170/2022, थाना मदन महल: सतीश सनपाल ने एफआईआर, RCT 5603/2024 और पूरी कार्रवाई रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने चार्जशीट में प्रथम दृष्टया अपराध के पर्याप्त आधार पाए और ट्रायल में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
- क्राइम नंबर 270/2022, थाना ओमती: एफआईआर और RCT 3373/2023 रद्द करने की मांग की गई थी। चार्जशीट और प्रथम दृष्टया साक्ष्य मौजूद होने के कारण हाईकोर्ट ने कार्रवाई रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
- क्राइम नंबर 271/2022, थाना ओमती: एफआईआर और RCT 3482/2023 रद्द करने की मांग थी। कोर्ट ने जांच सामग्री के आधार पर मामला ट्रायल योग्य माना और इस स्तर पर मिनी-ट्रायल से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
- क्राइम नंबर 53/2024, थाना सिविल लाइन्स: एफआईआर और RCT 424/2025 रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने बचाव और तथ्य साक्ष्य से जुड़े होने पर इन्हें ट्रायल कोर्ट में उठाने की बात कहते हुए याचिका खारिज कर दी।
- क्राइम नंबर 258/2022, थाना ओमती: एफआईआर और RCT 6002/2023 रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मिलने पर inherent jurisdiction से कार्रवाई रद्द करने से इनकार कर दिया।
- क्राइम नंबर 441/2022, थाना लॉर्डगंज: वीडियो माध्यम से बयान, व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट, दंडात्मक कार्रवाई पर रोक और एफआईआर रद्द करने की मांग थी। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को विशेष तरीके से जांच का निर्देश देने से इनकार करते हुए रिट याचिका खारिज कर दी।
विवेक पांडे को भी नहीं मिली राहत
सतीश सनपाल के सहयोगी और कई मामलों में सह आरोपी विवेक पांडे को भी हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है।
अवैध सट्टेबाजी और फर्जी शेल कंपनियों से जुड़े मामले में विवेक पांडे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मदन महल, जबलपुर थाने में दर्ज FIR और आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से पहली नजर में विवेक पांडे की भूमिका सामने आती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों की सही या गलत होने की जांच करना ट्रायल कोर्ट का काम है। वहीं, सह आरोपी के आधार पर समान राहत यानी पैरिटी (Parity) का लाभ भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि हर आरोपी की भूमिका अलग-अलग हो सकती है।
कौन हैं सतीश सनपाल?
सतीश सनपाल दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के कारोबारी और उद्यमी हैं। वे ANAX Holding के संस्थापक और चेयरमैन हैं।
वे अपनी पत्नी के साथ नेटफ्लिक्स के रियलिटी शो Desi Bling में भी नजर आ चुके हैं। इस शो के बाद उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल और बिजनेस जगत में पहचान काफी चर्चा में आई। जबलपुर हाईकोर्ट | जबलपुर हाईकोर्ट का आदेश
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