शाजापुर में युवक ने ट्रेन हादसे में गंवाए हाथ, फिर भी मंगेतर ने नहीं छोड़ा साथ
समझें क्या है पूरा मामला
शाजापुर जिले के जामनेर गांव के जीवन और वर्षा की सगाई 8 मई 2026 को हुई थी। इसके 15 दिन बाद ही जीवन ट्रेन हादसे का शिकार हो गए। हादसे में उनके दोनों हाथ कट गए। इसके बावजूद वर्षा ने रिश्ता नहीं तोड़ा। 8 जून 2026 को दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली।
वेडिंग शूट के दौरान हुआ हादसा
23 मई 2026 की शाम जीवन शुजालपुर रेल पुल पर फोटो सेशन करा रहे थे। इफेक्ट फोटो लेने के लिए वह रेलवे लाइन पर खड़े हुए। इसी दौरान वे एक मालगाड़ी की चपेट में आ गई। हादसे में उनका एक हाथ कंधे के पास से कट गया। दूसरा हाथ कलाई के पास से कट गया।
आईसीयू में देखते ही लिया फैसला
वर्षा बताती हैं कि 23 मई की रात उन्हें हादसे की खबर मिली। अगली सुबह वह अस्पताल पहुंचीं। आईसीयू में गंभीर हालत में जीवन को देखकर उन्होंने उसी क्षण फैसला कर लिया। उन्होंने तय किया कि हालात जैसे भी हों, वह साथ नहीं छोड़ेंगी।
17 दिन तक चला इलाज
जीवन 8 जून तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस दौरान वर्षा के माता-पिता ने रिश्ता तोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया। लेकिन माता-पिता होने के नाते वे बार-बार पूछते रहे कि आगे जीवन कैसे चलेगा। वर्षा ने साफ कह दिया कि वह इसी से शादी करेंगी।
सादगी से हुई कोर्ट मैरिज
वर्षा ने 8 जून को कोर्ट मैरिज के दस्तावेज तैयार कराए। वह दस्तावेज लेकर अस्पताल पहुंचीं। उसी दिन जीवन को छुट्टी मिली और दोनों घर लौट आए। परिवार पर अतिरिक्त खर्च का बोझ न पड़े, इसलिए शादी बिना बाजे-रिसेप्शन के हुई।
वर्षा कहती हैं कि शादी के बाद भी ऐसा हादसा हो सकता था। उनका मानना है कि सगाई भी शादी जैसा ही रिश्ता होता है। इससे दो परिवार जुड़ जाते हैं। इसलिए उन्होंने रिश्ता निभाने का फैसला किया।
अब पत्नी ही बनी सहारा
इलाज के बाद जीवन की जान बच गई, लेकिन दोनों हाथ हमेशा के लिए चले गए। कंधे के पास कटे हाथ के घाव की हर तीन दिन में ड्रेसिंग होती है। इलाज पर हर महीने पांच हजार रुपए से ज्यादा खर्च हो रहा है। जामनेर के प्रधानमंत्री आवास योजना के घर में अब पत्नी वर्षा और मां मिलकर जीवन का खाना खिलाती हैं। वे पानी पिलाने और घर के काम में भी सहारा बन रही हैं।
पहले परिवार का सहारा था जीवन
जीवन ने 12वीं तक पढ़ाई की थी। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ मजदूरी शुरू कर दी थी। हादसे वाले दिन वह शुजालपुर की एक सोसायटी में बोरी सिलाई का काम कर रहे थे। हादसे से पहले पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। अब वह खुद दूसरों पर निर्भर हो गए हैं।
रोजगार की मांग की
जीवन कहते हैं कि मां का साथ तो हमेशा रहता है। लेकिन हादसे के बाद जिसने उन्हें अपनाया, उस पर उन्हें गर्व है। उनका कहना है कि वह किसी पर बोझ बनकर नहीं जीना चाहते। उन्होंने भीख नहीं, बल्कि रोजगार की मांग की है।
उन्होंने सरकार से दिव्यांगजनों के लिए उपयुक्त रोजगार उपलब्ध कराने की अपील की है। उन्होंने अपनी पीड़ा वीडियो संदेश के जरिए उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार तक पहुंचाई। मंत्री ने युवक से संपर्क होने की पुष्टि की और हर संभव मदद का भरोसा दिया है।
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