CJI की एक टिप्पणी और गिर गई मंत्री की कुर्सी...
Sameer Chougaonkar | Jul 27, 2026, 14:00 IST
वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर
जंतर मंतर पर 36 दिन चले छात्र आंदोलन के बाद सरकार झुकी है। कॉकरोच जनता पार्टी की तीनों मांगें मानी गईं और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। जानिए आंदोलन की पूरी कहानी और आगे की सियासत...
36 दिन के आंदोलन के बाद सरकार आखिर झुकी
कॉकरोच जनता पार्टी की तीन मांगें क्या थीं?
दूसरी, नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिवारों को एक करोड़ रुपए मुआवजा देने की थी।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया।
सरकार के वार्ताकार जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ तीन दौर की बातचीत के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के साथ सरकार ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सहमति की घोषणा की।
सड़क से लेकर संसद तक चल रहे संग्राम में सरकार को सड़क पर राहत मिली है, लेकिन संसद में बवाल अब भी जारी है।
आगे क्या करेगी कॉकरोच जनता पार्टी?
छात्रों से मिले समर्थन और सभी मांगें मनवाने में सफलता के बाद जाहिर है कि कॉकरोच जनता पार्टी इतने पर ही नहीं रुकने वाली है। पार्टी का अगला कदम क्या होगा यह अभी साफ नहीं, लेकिन अभिजीत दीपके और उनकी टीम लंबे समय तक चुप नहीं बैठेंगे, यह तय है।
कॉकरोच जनता पार्टी से बुरी तरह चोट खाई सरकार उनके हर कदम पर नजर रखेगी और पार्टी जब भी किसी मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरेगी, उसे रोकने की हर सम्भव कोशिश सरकार करेगी।
कैसे हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म?
सीजेआई (CJI) की टिप्पणी बनी शुरुआत
कॉकरोच पार्टी का जन्म मोदी या भारतीय जनता पार्टी के विरोध में नहीं हुआ था। दरअसल 15 मई को कानून की फर्जी डिग्रियों से जुड़ी अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने ऐसे समूह को "समाज के परजीवी" कहकर संबोधित किया और उनकी तुलना ऐसे कॉकरोचों से की, जो सब पर हमला करने लगते हैं।
72 घंटे में लाखों समर्थक जुड़े
अभिजीत दीपके की घोषणा के 72 घंटे के भीतर ही कॉकरोच जनता पार्टी के इंस्टाग्राम अकाउंट का आंकड़ा 30 लाख पार कर चुका था। एक सप्ताह में यह संख्या एक करोड़ पार कर गई, और 22 मई आते-आते दो करोड़ की संख्या ने सबको चकित कर दिया।
अमेरिका में बैठे अभिजीत को भारत में मिले इस व्यापक जनसमर्थन ने उन्हें भारत आने की जमीन दे दी। 6 जून को अमेरिका से दिल्ली पहुंचे दीपके ने जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन शुरू किया।
वांगचुक की भूख हड़ताल क्यों बनी निर्णायक मोड़?
शुरुआत में सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। सरकार ने संवाद की कोई कोशिश नहीं की। सरकार को यह मुगालता था कि यह आंदोलन अपने आप अपनी मौत मर जाएगा।
सरकार देखती रही, आंदोलन को ढील देती रही और आंदोलन धीरे-धीरे बढ़ता रहा। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग ने देशभर के युवाओं को जोड़ने की शुरुआत कर दी। छात्र जंतर-मंतर पहुंचने लगे और उनका भावनात्मक समर्थन इस आंदोलन की ताकत बना।
सरकार और छात्रों के बीच बातचीत कैसे आगे बढ़ी?
20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला था और छात्रों की भीड़ ने सरकार के कान खड़े कर दिए। सरकार ने पहली वार्ता के लिए स्वास्थ्य मंत्री नड्डा के घर छात्र नेताओं को बुलाया, लेकिन बात नहीं बनी।
21 जुलाई को सरकार वांगचुक का अनशन तुड़वाने में सफल रही। सरकार ने भरोसा दिया कि आत्महत्या करने वाले छात्रों को पर्याप्त मुआवजा देगी और जवाबदेही पर संसद में चर्चा करेगी। वांगचुक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना ही अनशन तोड़ने पर मान गए।
सरकार को लगा कि वांगचुक का अनशन खत्म होने से छात्रों का हौसला टूटेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पुलिस और आंदोलनकारी छात्रों की झड़पों की खबरें आने लगीं, मीडिया कवरेज बढ़ा, और सरकार को फिर बातचीत शुरू करनी पड़ी।
आखिरकार तीसरे दौर की बातचीत के बाद 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ।
प्रधान के इस्तीफे का सियासी मतलब क्या है?
क्या कॉकरोच पार्टी बीजेपी के लिए बड़ा खतरा बनेगी?
फिलहाल इसकी संभावना न के बराबर नजर आती है। सड़कों पर भारी भीड़ अक्सर वोट में तब्दील नहीं होती, उसके लिए पार्टी के पास एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा होना जरूरी है।
भले ही कॉकरोच जनता पार्टी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने में सफल रही हो और सरकार बैकफुट पर नजर आ रही हो, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मतदाताओं के बीच मोदी की व्यक्तिगत अपील आज भी बरकरार है।
मोदी के पिछले कार्यकाल में सरकार को सीएए (CAA) (नागरिकता संशोधन अधिनियम) विरोधी और किसान आंदोलनों का सामना करना पड़ा था। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी ने छात्र आंदोलन को सरकार के लिए एक जटिल पहेली बना दिया, क्योंकि यह सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़ा था।
सरकार इस आंदोलन को किसी जाति या धर्म विशेष का बताकर खारिज नहीं कर सकी। सरकार के लिए चिंता की बात यह भी रही कि इस आंदोलन में उसका अपना सबसे भरोसेमंद वोटर भी शामिल था।
विपक्ष के लिए यह आंदोलन कैसे अवसर है?
इस छात्र आंदोलन में विपक्ष ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन को खुलकर समर्थन दिया। विपक्ष इन छात्रों को साधकर अपना राजनीतिक हित साधना चाहता है, लेकिन उसे कितनी सफलता मिलती है, यह आने वाला समय बताएगा।
मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस आंदोलन में शामिल ज्यादातर छात्रों ने सिर्फ मोदी सरकार को ही देखा है। इससे पहले की सरकारों का इन्हें कोई अनुभव नहीं है, इसलिए इनका सारा गुस्सा मोदी सरकार पर ही केंद्रित रहेगा। ऐसे में भाजपा पुरानी सरकारों की अव्यवस्था का हवाला देकर संस्थागत विफलता को आसानी से खारिज नहीं कर सकती।
मोदी सरकार की आगे की रणनीति क्या होगी?
इस टास्क फोर्स में नंदन नीलेकणि के अलावा इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ, आईबी के पूर्व निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास के निदेशक कामाकोटी, सीबीएसई की पूर्व अध्यक्ष अनीता करवाल और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमृत लाल मीणा को शामिल किया गया है।
सवाल यह भी है कि सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी से तो समझौता कर लिया, लेकिन क्या विपक्ष के साथ संसद में चल रहा गतिरोध खत्म होगा? आज सोमवार को केंद्र सरकार पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) संशोधन विधेयक संसद में पेश करेगी। फिलहाल संसद के माहौल और विपक्ष के तेवर को देखते हुए विपक्ष के सहयोग की संभावना कम ही नजर आती है।
आगे की राह में सरकार की सबसे बड़ी चुनौती
सरकार शिक्षा सुधार पर तेजी से कदम उठाने की राजनीतिक जरूरत को अच्छी तरह समझ रही है। वह यह भी जानती है कि जमीन पर बदलाव दिखने में समय लगेगा, लेकिन तब तक कॉकरोच जनता पार्टी को थामे रखना और छात्रों के गुस्से से बचे रहना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
3 अगस्त को तीन विधानसभा उपचुनाव के नतीजे भी सरकार को युवाओं का रुख बता देंगे। सरकार की कोशिश चुनाव से पहले छात्रों को शांत करने और कॉकरोच जनता पार्टी को दोबारा सड़क पर उतरने से रोकने की होगी। सरकार इसमें कितनी सफल होती है, यह आने वाला समय ही बताएगा।
नोट- प्रिंट मीडिया में दो दशक से सक्रिय समीर चौगांवकर राजनीतिक पत्रकारिता के एक विश्वसनीय और स्थापित नाम हैं। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और एशिया टाइम्स सहित देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर उनके लेख प्रकाशित होते हैं। भाजपा, पीएमओ, संसद और आरएसएस की गहरी कवरेज तथा प्रमुख न्यूज चैनलों पर तथ्यपरक राजनीतिक विश्लेषण उनकी पहचान है।इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।
FAQ
- कॉकरोच जनता पार्टी की तीन मांगें क्या थीं?
प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर रद्द करना, नीट पेपर लीक से जुड़ी आत्महत्याओं के परिवारों को एक करोड़ रुपए मुआवाजा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा - तीनों मांगें सरकार ने मान लीं। - कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म कैसे हुआ?
मई 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी से आहत होकर अमेरिका में रह रहे अभिजीत दीपके ने इस पार्टी के गठन की घोषणा की, जिसे 72 घंटे में लाखों समर्थक मिल गए। - धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा कब दिया?
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 36 दिन के छात्र आंदोलन के बाद 25 जुलाई 2026 को अपने पद से इस्तीफा दिया। - क्या कॉकरोच जनता पार्टी भाजपा के लिए राजनीतिक खतरा है?
अभी इसकी संभावना कम है, क्योंकि सड़क पर मिली भीड़ और समर्थन का वोट में बदलना पार्टी के मजबूत संगठनात्मक ढांचे पर निर्भर करता है, जो कॉकरोच पार्टी के पास फिलहाल नहीं है।
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