एमपी के मेडिकल कॉलेज में 20 करोड़ का घोटाला: पहली बारिश में ही धंसी नई इमारत
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश का 280 करोड़ रुपए का मेडिकल कॉलेज भवन विवादों में है।
- पहली ही बारिश में इमारत जमीन में धंसने लगी है।
- जांच में करीब 20 करोड़ रुपए का काम अधूरा मिला है।
- गड़बड़ी पकड़ने वाले डीन डॉ. अनिल अग्रवाल को पद से हटाया गया।
- बिना कमियां दूर किए नए डीन ने भवन का हैंडओवर ले लिया।
श्योपुर में बना नया मेडिकल कॉलेज भवन छात्रों की सुविधा से ज्यादा कमीशनखोरी की कहानी बयां कर रहा है। यह भवन 280 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ है। लेकिन पहली ही बारिश में इसकी गुणवत्ता की पोल खुल गई। इमारत जमीन में धंसने लगी, दीवारों में दरारें आ गईं और छतें टपकने लगीं। इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात डीन की छुट्टी को लेकर सामने आई है।
निर्माण एजेंसी ने कैसे की गड़बड़ी
भवन बनाने वाली एजेंसी का नाम ब्रिज एंड रूफ है। जांच में सामने आया कि एजेंसी ने कागजों में प्रोजेक्ट पूरा दिखा दिया। लेकिन असल में करीब 20 करोड़ रुपए का काम अधूरा छोड़ दिया गया। यह गड़बड़ी तब तक छिपी रही, जब तक बारिश ने भवन की कमजोरी उजागर नहीं कर दी।
डीन ने क्यों किया हैंडओवर से इनकार
तत्कालीन डीन डॉ. अनिल अग्रवाल ने भवन की जांच के लिए एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने भवन में 14 बड़ी खामियां पकड़ीं। इन खामियों के आधार पर डॉ. अग्रवाल ने हैंडओवर लेने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि पहले सारी कमियां दूर होनी चाहिए। लेकिन शासन ने सुधार कराने की बजाय उन्हीं को पद से हटा दिया। इसके तुरंत बाद नए डीन की नियुक्ति कर दी गई। नए डीन ने बिना कमियां दूर हुए भवन का हैंडओवर ले लिया।
दो हॉस्टल और आवास डीपीआर से गायब
जांच समिति की रिपोर्ट में सबसे बड़ा खुलासा हॉस्टल को लेकर हुआ। डीपीआर यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report) में तय दो पूरे हॉस्टल बने ही नहीं। सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के आवास भी सिर्फ प्लिंथ यानी नींव स्तर तक बनाकर छोड़ दिए गए। यानी ये आवास कागजों में तो पूरे दिखाए गए, पर हकीकत में अधूरे रहे।
बोरिंग, डीजी सेट और फेंसिंग में भी कटौती
जांच में बुनियादी सुविधाओं में भी बड़ी कमी मिली। डीपीआर में छह बोरिंग तय थीं, लेकिन मौके पर सिर्फ तीन बोरिंग मिलीं। इनमें से भी एक में मोटर तक नहीं डाली गई थी। तीन डीजी सेट की जगह सिर्फ दो डीजी सेट लगाए गए। गर्ल्स हॉस्टल की सुरक्षा के लिए जरूरी फेंसिंग भी नहीं की गई। एकेडमिक और प्रशासनिक ब्लॉक में भी तय संख्या से दो लिफ्ट कम लगाई गईं।
कैंपस की सुविधाएं भी अधूरी
छात्रों के बैठने के लिए प्रस्तावित 50 सीटेड बेंच अब तक नहीं लगाए गए हैं। कैंपस में स्पोर्ट्स कोर्ट और खेल सामग्री भी नदारद है। क्लासरूम में लगे माइक और एसी खराब पड़े मिले हैं। ग्रीनरी के नाम पर भी कटौती की गई है। कैंपस में 5500 पौधे लगाने का लक्ष्य था, लेकिन सिर्फ 3000 पौधे ही लगाए गए।
घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल
जांच रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण में घटिया क्वालिटी की सामग्री लगाई गई। फॉल्स सीलिंग और लकड़ी के दरवाजे बेहद कमजोर क्वालिटी के पाए गए। यही वजह है कि पहली बारिश में ही भवन से पानी टपकने लगा। कई जगह दीवारों में दरारें भी साफ दिखाई दीं। इससे साफ है कि निर्माण के दौरान गुणवत्ता से समझौता किया गया।
नए डीन ने क्या कहा
नए डीन डॉ. विपेंद्र भदकारिया ने इस पूरे मामले पर अपनी सफाई दी है। उनका कहना है कि पुराने डीन को क्यों हटाया गया, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। लेकिन कॉलेज में क्लास जल्द शुरू करानी थीं, इसलिए पीआईयू यानी परियोजना कार्यान्वयन इकाई (Project Implementation Unit) और बिजली विभाग की सिफारिश पर उन्होंने हैंडओवर ले लिया।
उन्होंने यह भी बताया कि पुरानी जांच कमेटी की सभी आपत्तियां लेकर उन्होंने डीएमई यानी चिकित्सा शिक्षा संचालनालय (Directorate of Medical Education) और मंत्रालय को पत्र भेजे हैं। एक आरोप पर सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि तत्कालीन कलेक्टर उनके रिश्ते में जीजा जरूर लगते हैं, लेकिन उनकी पोस्टिंग का आदेश सीधे मंत्रालय से हुआ था।
पूर्व डीन ने उठाए गंभीर सवाल
पूर्व डीन अनिल अग्रवाल ने भी इस मामले पर खुलकर बात की है। उनका कहना है कि कॉलेज भवन में दो हॉस्टल आज भी नहीं बने हैं। उन्होंने बताया कि इसकी जानकारी उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को पहले ही भेज दी थी। लेकिन ज्यादा जानकारी सामने आने से पहले ही उनका तबादला कर दिया गया। उनके मुताबिक करीब 20 करोड़ रुपए का काम पूरा ही नहीं हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्हें अब डीन का प्रभार सौंपा गया है, वे काफी जूनियर अधिकारी हैं।
अब आगे क्या होगा
इस पूरे मामले में अब डीएमई और मंत्रालय स्तर पर पत्राचार चल रहा है। निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है। छात्रों और स्टाफ को फिलहाल अधूरी सुविधाओं के बीच ही पढ़ाई करनी पड़ रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि गड़बड़ी पकड़ने वाले अधिकारी को ही क्यों हटाया गया। इस मामले में आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर सबकी नजर टिकी है।
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