स्पेशल और सामान्य में फर्क भूल गए अफसर, हाईकोर्ट ने रद्द किया शिक्षक नियुक्ति रोकने का आदेश
समझें क्या है पूरा मामला...
- मामला स्पेशल एजुकेशन टीचर की रुकी हुई नियुक्ति का है।
- अधिकारी स्पेशल और सामान्य शिक्षक के नियमों में फर्क नहीं समझ सके।
- RCI मान्यता होने के बाद भी NCTE का आधार बनाकर नियुक्ति रोक दी गई थी।
- हाईकोर्ट ने इसे मनमानी और संविधान के खिलाफ माना है।
- कोर्ट ने 60 दिन में नियुक्ति और वरिष्ठता देने के आदेश दिए हैं।
एक गलती, 13 साल का इंतजार
क्या स्पेशल शिक्षक और सामान्य शिक्षक एक जैसे होते हैं? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस सवाल का साफ जवाब दिया है। इंदौर पीठ ने कहा कि अधिकारियों ने दोनों के बीच का मूल अंतर ही नहीं समझा। इसी वजह से एक योग्य अभ्यर्थी की नियुक्ति 13 साल तक अटक गई। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने इस कार्रवाई को मनमानी बताते हुए नियुक्ति रोकने का आदेश रद्द कर दिया।
स्पेशल शिक्षक और सामान्य शिक्षक में क्या अंतर है
हाईकोर्ट ने कहा कि स्पेशल एजुकेशन टीचर के प्रशिक्षण और योग्यता की जिम्मेदारी केवल रीहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया यानी RCI की है। वहीं सामान्य शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी NCTE जिम्मेदार है। कोर्ट ने कहा कि दोनों संस्थाओं की भूमिका अलग है। इसलिए स्पेशल शिक्षक की डिग्री को NCTE की सूची से जांचना कानून के खिलाफ है।
2011 में परीक्षा पास, फिर भी नहीं मिली नौकरी
याचिकाकर्ता दालचंद अहीर ने वर्ष 2011 में भोपाल के दिग्दर्शिका इंस्टीट्यूट ऑफ रिहैबिलिटेशन एंड रिसर्च से डी.एड. इन मेंटल रिटार्डेशन किया था। संस्थान RCI से मान्यता प्राप्त था। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें RCI का प्रमाण पत्र भी मिला। उन्होंने संविदा शाला शिक्षक ग्रेड 3 पात्रता परीक्षा पास की। 150 में से 83.72 अंक हासिल किए। दस्तावेज सत्यापन के बाद उनकी पदस्थापना जनपद पंचायत कुक्षी, जिला धार में हुई।
एक गलत जांच ने रोक दी नियुक्ति
जब वह ज्वाइनिंग के लिए पहुंचे तो अधिकारियों ने नियुक्ति पत्र देने से इनकार कर दिया। वजह बताई गई कि उनके संस्थान का नाम NCTE की सूची में नहीं है। यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ। जबकि उनका कोर्स स्पेशल एजुकेशन का था और उसकी मान्यता RCI से थी।
हाईकोर्ट ने कहा, अफसरों ने बिना सोचे नियम लागू कर दिए
अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने सामान्य नियमों को बिना समझे स्पेशल एजुकेशन पर लागू कर दिया। यह फैसला पूरी तरह यांत्रिक था। कोर्ट ने साफ कहा कि सामान्य परिपत्र RCI के अधिकार को खत्म नहीं कर सकते। यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
सरकारी जवाब में भी मिली बड़ी चूक
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मध्यप्रदेश सरकार के जवाब में मणिपाल विश्वविद्यालय का जिक्र किया गया था, जबकि याचिकाकर्ता का उससे कोई संबंध नहीं था। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड साफ बताता है कि याचिकाकर्ता ने RCI मान्यता प्राप्त दिग्दर्शिका इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लिया था। इससे अधिकारियों की लापरवाही भी सामने आई।
दूसरे उम्मीदवार को नौकरी, फिर यहां अलग नियम क्यों
याचिकाकर्ता ने बताया कि समान योग्यता वाले अर्जुन अहीर को नियुक्ति मिल चुकी है। दोनों की योग्यता और स्थिति समान थी। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में अलग व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने दिया यह अहम आदेश
कोर्ट ने नियुक्ति रोकने का फैसला रद्द कर दिया। राज्य सरकार को 60 दिन के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ता को वरिष्ठता और सभी परिणामी लाभ मिलेंगे। हालांकि बीच की अवधि का वेतन नहीं दिया जाएगा। इस अवधि पर 'नो वर्क, नो पे' का सिद्धांत लागू रहेगा।
फैसले से कोर्ट ने यह दिया संदेश
यह फैसला साफ करता है कि हर भर्ती के अपने अलग नियम होते हैं। अधिकारियों को पहले संबंधित कानून और नियामक संस्था समझनी होगी। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्पेशल एजुकेशन के मामलों में RCI ही अंतिम मानक है। केवल NCTE का हवाला देकर किसी योग्य अभ्यर्थी की नियुक्ति नहीं रोकी जा सकती।
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