टोल कंपनियों की बढ़ सकती है मुश्किल, सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट द्वारा खारिज की गई PIL को फिर से सुनने का आदेश दिया।
- हाईकोर्ट को तीन महीने के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दिया गया।
- टोल वसूलने वाली कंपनी (कंसेशनेयर) को पक्षकार बनाने की अनुमति दी गई।
- याचिका में आरोप है कि कुछ टोल सड़कों पर लागत से 4 से 6 गुना तक वसूली हो चुकी है।
- कोर्ट ने नोएडा टोल ब्रिज मामले के फैसले को इस केस में प्रासंगिक माना।
News in detail
टोल वसूली को लेकर चल रहे एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट द्वारा जनहित याचिका खारिज करने के फैसले को रद्द करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया है। अब इस केस की सुनवाई इंदौर हाई कोर्ट में होगी जिसमें लागत से अधिक टोल वसूली के आरोप लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सभी जरूरी पक्षों को सुनकर ही इस मामले में फैसला होना चाहिए। साथ ही हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह इस याचिका पर तीन महीने के भीतर निर्णय करे।
यह याचिका पूर्व विधायक पारस सकलेचा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मध्य प्रदेश की कुछ टोल सड़कों पर लागत से कई गुना अधिक टोल वसूला जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा टोल वसूली का विवाद
मध्यप्रदेश मेंटोल वसूली (toll collection) से जुड़ा यह मामला पूर्व विधायक पारस सकलेचा द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका से शुरू हुआ। याचिका में आरोप लगाया गया था कि मध्य प्रदेश की कुछ टोल सड़कों पर निर्माण लागत से कई गुना ज्यादा राशि टोल के रूप में वसूली जा चुकी है।
हालांकि, इंदौर हाईकोर्ट ने इस याचिका को सुनने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि जिस निजी कंपनी को सरकार ने टोल वसूलने का अधिकार दिया है, उसे इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या की डिविजनल बेंच ने 9 मार्च 2026 को इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने इंदौर हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा कि मामले की दोबारा सुनवाई जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना टोल वसूलने वाली कंपनी को सुने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया जा सकता। इसलिए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वे संबंधित कंपनी और अन्य प्रभावित पक्षों को केस में शामिल करें।
लागत से कई गुना ज्यादा टोल वसूली का आरोप
याचिका में दावा किया गया है कि कुछ टोल सड़कों पर परियोजना की लागत से कई गुना अधिक राशि वसूली जा चुकी है। उदाहरण के तौर पर जावरा-नयागांव रोड पर 426 करोड़ की लागत के मुकाबले लगभग 2635 करोड़ रुपये तक टोल वसूला जा चुका है।
इसी तरह लेबड-जावरा रोड पर 589 करोड़ की लागत के मुकाबले लगभग 2376 करोड़ रुपये और देवास-भोपाल रोड पर 345 करोड़ की लागत के मुकाबले करीब 2056 करोड़ रुपये तक टोल वसूली होने का दावा किया गया है। याचिका में यह भी कहा गया कि टोल वसूली का यह सिलसिला कई सालों तक जारी रहने वाला है।
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दुर्घटनाओं के आंकड़े भी कोर्ट में रखे गए
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े भी पेश किए गए। दस्तावेजों के अनुसार जनवरी 2026 तक इन तीनों सड़कों पर कुल 10,691 दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।
इन हादसों में 8,314 लोग घायल हुए हैं, जबकि 3,821 लोगों की मौत हो चुकी है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कंपनियों द्वारा रखरखाव और ब्याज से जुड़े खर्च को वास्तविक आंकड़ों से कहीं ज्यादा दिखाया जा रहा है।
टोल कंपनियों को पक्षकार बनाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में टोल वसूलने वाली कंपनियों को भी पक्षकार बनाना जरूरी है, क्योंकि फैसले का सीधा असर उनके अधिकारों और आय पर पड़ेगा।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अनुमति दी कि वे 15 दिनों के भीतर इंदौर हाईकोर्ट में नया आवेदन दाखिल करें और सभी जरूरी पक्षों को केस में शामिल करें। इसके बाद हाईकोर्ट इस मामले की दोबारा सुनवाई करेगा।
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नोएडा टोल ब्रिज केस का भी हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा टोल ब्रिज से जुड़े एक पुराने मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टोल वसूली को निरस्त कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 20 दिसंबर 2024 को बरकरार रखा था।
कोर्ट ने कहा कि उस फैसले में टोल वसूली की वैधता और उसकी समय सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए गए थे। इसलिए उस केस के सिद्धांत इस मामले में भी लागू हो सकते हैं।
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अब इंदौर हाईकोर्ट में होगी दोबारा सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब यह मामला फिर से इंदौर हाईकोर्ट में सुना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस याचिका पर तेजी से सुनवाई की जाए और कोशिश हो कि तीन महीने के भीतर अंतिम फैसला दिया जाए।
सरल शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बंद नहीं किया है, बल्कि सभी पक्षों को सुनकर निष्पक्ष फैसला लेने के लिए इसे वापस इंदौर हाईकोर्ट भेज दिया है।