MP में सरकारी अस्पतालों के निजीकरण पर भड़के जन-संगठन, आंदोलन की दी चेतावनी
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश सरकार 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है।
- यह केंद्र रीवा, देवास और गुना जिलों में स्थित हैं।
- डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और 10 जन संगठनों ने इस फैसले का कड़ा विरोध शुरू किया है।
- संगठनों ने स्वास्थ्य मंत्री और अतिरिक्त मुख्य सचिव को ज्ञापन सौंपा है।
- उनकी मांग है कि निजीकरण प्रस्ताव रद्द कर खाली पद भरे जाएं।
क्या है पूरा विवाद
मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों को निजी संस्थाओं को सौंपने की तैयारी चल रही है। इसी के विरोध में प्रदेशभर के डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी लामबंद हो गए हैं। सरकार ने रीवा, देवास और गुना जिले के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी हाथों में सौंपने का प्रस्ताव तैयार किया है।
इस प्रस्ताव के सामने आते ही स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों में नाराजगी फैल गई। उनका कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने के बजाय उसे बेचना गलत कदम है। रविवार, 05 जुलाई को राजधानी भोपाल में मीडिया से बातचीत में कई संगठनों ने अपनी नाराजगी खुलकर जताई।
यह बातचीत एक्शन अगेंस्ट प्राइवेटाइजेशन ऑफ हेल्थ सर्विसेज नाम के बैनर तले हुई। इसमें चिकित्सा शिक्षा महासंघ, जूडा, नर्सिंग एसोसिएशन और जन स्वास्थ्य अभियान जैसे संगठन शामिल थे। इन संगठनों ने साफ कहा कि वे इस फैसले को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगे।
संगठनों की प्रमुख मांगें
प्रदर्शन में शामिल संगठनों ने अपनी मांगों को साफ शब्दों में सामने रखा।
पहली मांग है कि रीवा, देवास और गुना के 18 सामुदायिक केंद्रों का निजीकरण प्रस्ताव तुरंत रद्द किया जाए।
दूसरी मांग है कि स्वास्थ्य विभाग और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों तथा नर्सिंग स्टाफ के खाली पदों पर नियमित भर्ती हो। संगठनों का कहना है कि सालों से यह पद खाली पड़े हैं। इससे मरीजों को इलाज मिलने में परेशानी होती है।
तीसरी मांग यह है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को तय मानकों के अनुसार मजबूत किया जाए। इसके लिए बजट भी बढ़ाया जाए। संगठनों ने कहा कि यह मांगें आम लोगों के हित में हैं। उनका मकसद सरकार से टकराव नहीं बल्कि स्वास्थ्य सेवा सुधारना है।
क्यों हो रहा विरोध
स्वास्थ्य संगठनों का सबसे बड़ा तर्क संविधान से जुड़ा है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवा कोई व्यापार नहीं है। यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपना गलत है।
संगठनों ने आंकड़े देकर भी अपनी बात रखी। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 35 है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से ज्यादा माना जाता है। इसके अलावा राज्य में 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। साथ ही 4134 उप स्वास्थ्य केंद्र भी कम हैं।
संगठनों का मानना है कि पहले इस कमी को दूर किया जाना चाहिए। निजीकरण से यह समस्या और गहरी हो सकती है। गांव और कस्बों के मरीजों को इलाज मिलना और मुश्किल हो जाएगा।
पहले भी बदले फैसले
मध्य प्रदेश में यह पहला मौका नहीं है जब निजीकरण का विरोध हुआ है। साल 2015 में अलीराजपुर में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया था। जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को निजी संस्था को सौंपा गया था। यह प्रयोग नाकाम रहा और सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा।
इसके बाद 2020-21 में नीति आयोग (National Institution for Transforming India) ने भी एक प्रस्ताव दिया था। इसमें देशभर के जिला अस्पतालों के निजीकरण की बात कही गई थी। भारी विरोध के बाद इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
साल 2024-25 में भी जिला अस्पतालों को निजी क्षेत्र को देने की कोशिश हुई थी। तब डॉक्टरों और नागरिक समाज ने एकजुट होकर इस कोशिश को नाकाम कर दिया। संगठनों का कहना है कि इतिहास खुद बताता है कि निजीकरण का फैसला अक्सर पीछे लेना पड़ता है।
आगे क्या होगा असर
अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है। संगठनों ने साफ कर दिया है कि अगर मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज होगा। स्वास्थ्य मंत्री और अतिरिक्त मुख्य सचिव को पहले ही ज्ञापन सौंपा जा चुका है। अब यह देखना होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है।
डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की एकजुटता इस मुद्दे को बड़ा बना सकती है। आम जनता के लिए भी यह मामला सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर ही गांव और कस्बों के लाखों लोग निर्भर हैं। ऐसे में इस विवाद का असर सीधे उन्हीं तक पहुंचेगा।
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