उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन पर कानूनी पेंच: HC ने सरकार से मांगा जवाब
समझें क्या है पूरा मामला...
- उज्जैन और इंदौर को मिलाकर मेट्रोपॉलिटन रीजन बनाया गया है।
- इस गठन के खिलाफ हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई।
- हाई कोर्ट ने शुक्रवार को राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
- सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है।
- याचिकाकर्ता का कहना है कि निकायों का अधिकार सीमित हो जाएगा।
हाई कोर्ट में क्या हुआ
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार, 17 जुलाई को सुनवाई हुई। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने सरकार से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह याचिका मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन की वैधता पर सवाल उठाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पूरी प्रक्रिया कानून के मुताबिक नहीं हुई।
सुनवाई जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने हुई। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता अखत पहाड़िया ने पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अथॉरिटी का गठन तय नियमों के विपरीत हुआ है। उनकी दलील को कोर्ट ने गंभीरता से सुना।
मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी क्यों बनती है
आमतौर पर राज्य सरकारें बड़े शहरों के लिए मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी बनाती हैं। इसका मकसद पास के शहरों को मिलाकर योजनाबद्ध विकास करना होता है। सड़क, पानी सप्लाई और ट्रांसपोर्ट जैसे काम इसमें शामिल होते हैं। ऐसी अथॉरिटी बड़े इलाके के लिए एक साथ फैसले लेती है। इंदौर और उज्जैन को जोड़कर भी ऐसी ही अथॉरिटी बनाई गई है। वहीं, इसके गठन का तरीका अब कोर्ट में सवालों के घेरे में है।
याचिका में क्या दावा
याचिका में कहा गया है कि अथॉरिटी बनाने से पहले क्षेत्र को मेट्रोपॉलिटन रीजन घोषित करना जरूरी था। कानून यही प्रक्रिया बताता है। लेकिन सरकार ने पहले ही अथॉरिटी का गठन कर दिया। यह अथॉरिटी 28 जनवरी 2026 से पहले बना दी गई थी। क्षेत्र को अधिसूचित करने वाली अधिसूचना बाद में यानी 12 जून को जारी हुई। याचिकाकर्ता के मुताबिक यह क्रम गलत है। पहले रीजन घोषित होना चाहिए था, फिर अथॉरिटी बननी चाहिए थी।
याचिका में यह भी लिखा है कि इंदौर, उज्जैन, धार और देवास के स्थानीय निकायों से कोई सलाह नहीं ली गई। इन शहरों की राय के बिना ही पूरा फैसला ले लिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह तरीका संविधान के 74वें संशोधन के खिलाफ है। साथ ही यह अनुच्छेद-14 का भी उल्लंघन करता है। अनुच्छेद-14 समानता का अधिकार देता है।
कोर्ट ने क्या पूछा
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अहम सवाल पूछा है। कोर्ट ने जानना चाहा कि क्या इस गठन से नगर निगमों पर असर पड़ेगा। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय निकायों का अधिकार क्षेत्र सीमित हो जाएगा। यानी नगर निगम और नगर पालिका जैसी संस्थाओं की ताकत कम होगी। कई फैसले अब मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के हाथ में चले जाएंगे। इससे स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी घट जाएगी।
अधिवक्ता ने कोर्ट में यह भी कहा कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की अहमियत कम हो जाएगी। इसकी जगह अफसरों का दबदबा बढ़ेगा। उनका कहना है कि यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए ठीक नहीं है।
इंदौर-उज्जैन का फर्क
याचिका में इंदौर और उज्जैन के बीच के फर्क को भी बड़ी वजह बताया गया है। इंदौर को मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कहा जाता है। वहीं उज्जैन को धार्मिक नगरी के तौर पर जाना जाता है। दोनों शहरों की जरूरतें और प्राथमिकताएं अलग अलग हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दोनों को एक ही महानगरीय क्षेत्र में रखना सही नहीं है। इंदौर में व्यापार और उद्योग से जुड़े मुद्दे अहम हैं। उज्जैन में मंदिर, श्रद्धालु और धार्मिक आयोजन ज्यादा मायने रखते हैं। ऐसे में दोनों शहरों को एक साथ जोड़कर एक अथॉरिटी बनाना ठीक नहीं होगा।
याचिका में यह बात भी उठाई गई कि प्रस्तावित अथॉरिटी की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करेंगे। इसमें ज्यादातर अफसर ही शामिल रहेंगे। जनता द्वारा चुने गए नेताओं की भूमिका बहुत कम रह जाएगी। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था आम लोगों की आवाज को कमजोर करेगी।
स्थानीय निकायों पर असर
यदि अथॉरिटी का गठन बरकरार रहता है तो असर सीधे स्थानीय निकायों पर पड़ेगा। नगर निगम के कई अधिकार अथॉरिटी के पास चले जाएंगे। पार्षद और महापौर जैसे चुने हुए प्रतिनिधि कमजोर हो सकते हैं। फैसले लेने की ताकत अफसरों के पास ज्यादा रहेगी। याचिकाकर्ता का मानना है कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। आम जनता की भागीदारी भी कम हो सकती है।
आगे क्या होगा
हाई कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने का समय दिया है। अब अगली सुनवाई में सरकार का पक्ष सामने आएगा। सरकार को बताना होगा कि अथॉरिटी का गठन किस आधार पर हुआ। साथ ही यह भी बताना होगा कि निकायों से राय क्यों नहीं ली गई। तब तक मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी को लेकर असमंजस बना रहेगा। इंदौर और उज्जैन के लोग भी इस फैसले पर नजर बनाए हुए हैं। इस मामले पर आम लोगों की भी नजर टिकी है। कई लोग चाहते हैं कि उनकी राय भी सुनी जाए। अगली सुनवाई में तस्वीर और साफ हो सकती है।
ये खबरें भी पढ़िए...
भोपाल-इंदौर मेट्रोपॉलिटन मॉडल: विकास की नई व्यवस्था या शक्तियों का केंद्रीकरण?
इंदौर पीछे, अब उज्जैन आगे... नाम पर अटका मेट्रोपॉलिटन रीजन, आगे क्या होगा?
भोपाल मेट्रोपॉलिटन विस्तार के साथ आएंगे, नए रोजगार और वन्य पर्यटन को भी मिलेगा नया मोड़
मुंबई से दोगुना होगा भोपाल मेट्रोपॉलिटन एरिया का विस्तार, दो हजार से ज्यादा गांव शामिल