उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार का जुर्माना, जेब से भरनी होगी रकम
समझें क्या है पूरा मामला
- हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपए का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया।
- अदालत ने कहा- जुर्माना सरकारी फंड से नहीं, कलेक्टर अपनी जेब से भरेंगे।
- 2014 के राजस्व मंडल के आदेश का 12 साल बाद भी पालन नहीं किया गया।
- 2025 में हाईकोर्ट ने 45 दिन में फैसला करने का निर्देश दिया था।
- याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने पक्ष रखा।
12 साल तक आदेश दबाकर रखा
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि अदालत के आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों को अब केवल चेतावनी देकर नहीं छोड़ा जाएगा।
जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने उमरिया कलेक्टर द्वारा राजस्व मंडल के वर्ष 2014 के अंतिम आदेश और स्वयं हाईकोर्ट के साल 2025 के स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं करने पर कड़ी नाराजगी जताई।
अदालत ने न केवल कलेक्टर के आदेश को अवैध घोषित करते हुए निरस्त कर दिया बल्कि उन पर 25 हजार रुपये की व्यक्तिगत लागत भी लगा दी।
कोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि यह राशि सरकारी खजाने से वापस नहीं ली जाएगी और कलेक्टर को इसे अपनी जेब से जमा करना होगा।
2014 में आदेश मिला
पूरा विवाद एडवेंचर वाइल्डलाइफ रिसॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी के पक्ष में राजस्व मंडल ने 20 मई 2014 को आदेश पारित किया था, जिसके अनुसार राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन किए जाने थे।
हैरानी की बात यह रही कि इस आदेश पर किसी भी न्यायालय की ओर से कभी कोई स्थगन (स्टे) नहीं दिया गया, फिर भी संबंधित अधिकारियों ने एक दशक से अधिक समय तक इसका पालन नहीं किया।
इस दौरान तहसील स्तर पर भी कार्रवाई लंबित रही और याचिकाकर्ता को अपने अधिकारों का लाभ नहीं मिल सका। अंततः कंपनी को न्याय की तलाश में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
पहले भी हाईकोर्ट ने दिया था मौका
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि वर्ष 2025 में भी इसी मुद्दे को लेकर रिट याचिका दायर की गई थी।
7 जुलाई 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित राजस्व अधिकारी को निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर 45 दिनों के भीतर निर्णय लेकर परिणाम से अवगत कराया जाए।
अदालत ने तब मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की थी और अधिकारियों को कानून के अनुसार कार्रवाई करने का अवसर दिया था।
इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं हुआ और उल्टे फरवरी 2026 में एक नया आदेश जारी कर मामले को फिर अनिश्चितता में डाल दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता को दूसरी बार हाईकोर्ट आना पड़ा।
क्या बोला कोर्ट ?
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से भी यह स्वीकार किया गया कि 20 मई 2014 के राजस्व मंडल के आदेश पर किसी भी न्यायालय ने कभी अंतरिम रोक नहीं लगाई।
इसके बावजूद अधिकारियों ने वर्षों तक उसे लागू नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब आदेश पूरी तरह प्रभावी था और पहले ही अंतिम रूप ले चुका था, तब उसका पालन न करना पूरी तरह अनुचित और कानून के विपरीत है।
अदालत ने माना कि अधिकारियों की इस कार्यप्रणाली ने याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से वर्षों तक न्याय से वंचित रखा और दोबारा अदालत आने के लिए मजबूर किया।
नहीं माने तो अवमानना की कार्रवाई होगी
हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर जुर्माना लगाया और उनका आदेश निरस्त किया। सात दिनों में 2014 के राजस्व मंडल और 2026 के नायब तहसीलदार आदेश लागू करने को कहा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा में आदेश लागू नहीं किया गया तो याचिकाकर्ता अवमानना याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होगा।
इस फैसले को प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायालय के आदेशों के सम्मान के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के दिनों में भोपाल कलेक्टर और टीटी नगर तहसीलदार को तलब किए जाने के बाद यह दूसरा बड़ा मामला है। इसमें हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।
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