विदिशा में जान जोखिम में डाल स्कूल पहुंच रहे बच्चे, हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान
समझें क्या है पूरा मामला...
- विदिशा के कई गांवों के बच्चे रोज जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते हैं।
- बच्चे बेतवा नदी के स्टॉप डैम के पिलरों पर चलकर स्कूल जाते हैं।
- सुरक्षित सड़क से जाने पर 10 से 16 किलोमीटर का अतिरिक्त रास्ता पड़ता है।
- जबलपुर हाईकोर्ट ने पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लिया है।
- याचिका में राज्य सरकार और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया है।
हाईकोर्ट के स्वतः संज्ञान से चर्चा में आया विदिशा का मामला
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से सामने आई तस्वीरों ने सभी को झकझोर दिया है। छोटे बच्चे रोज अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंच रहे थे। मामला सामने आने के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है।
अदालत ने इसे बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़ा गंभीर जनहित का विषय माना है। इस स्वतः संज्ञान याचिका में मध्य प्रदेश शासन के मुख्य सचिव, लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव और विदिशा कलेक्टर को प्रतिवादी बनाया गया है।
आखिर बच्चों को ऐसा खतरा क्यों उठाना पड़ रहा था
यह मामला गुलाबगंज तहसील के पलोह, ककरूआ, इमलिया और बंधेरा गांवों से जुड़ा है। इन गांवों के बच्चों को पढ़ाई के लिए शासकीय हाईस्कूल पलोह जाना पड़ता है। गांवों के बीच सुरक्षित पुल नहीं है। इसी वजह से कई बच्चे रोज स्टॉप डैम का रास्ता चुनते हैं। यही रास्ता उनकी सबसे बड़ी मजबूरी बन गया।
स्टॉप डैम बना बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा
ककरूआ और आसपास के गांवों के बच्चे इस रास्ते से स्कूल जाते हैं। इनमें छात्राएं भी शामिल हैं। बेतवा नदी पर बने स्टॉप डैम में नौ बड़े पिलर बने हैं। इनके बीच करीब चार फीट का खाली हिस्सा है।
बच्चे इन्हीं पिलरों पर संतुलन बनाकर आगे बढ़ते हैं। बारिश के दिनों में यह रास्ता और ज्यादा खतरनाक हो जाता है। एक छोटी सी गलती बड़ा हादसा बन सकती है।
सुरक्षित रास्ता है, लेकिन बहुत लंबा
बच्चों के पास दूसरा रास्ता भी है, लेकिन वह काफी लंबा पड़ता है। सड़क से जाने पर उन्हें 10 से 16 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। छोटे बच्चों के लिए रोज इतनी दूरी तय करना आसान नहीं है। इसलिए कई बच्चे मजबूरी में जोखिम भरा रास्ता चुनते हैं।
जांच टीम मौके पर पहुंची तो सामने आई पूरी तस्वीर
मामले की गंभीरता देखते हुए न्यायिक अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंची। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के निर्देश पर निरीक्षण किया गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव भी टीम में शामिल रहे। जांच में साफ हुआ कि बच्चों के सामने सुरक्षित विकल्प बहुत कम हैं। स्थानीय स्तर पर हाईस्कूल की कमी भी इस समस्या की बड़ी वजह है।
प्रशासन ने तुरंत क्या कदम उठाए
मामला सामने आने के बाद प्रशासन हरकत में आया। स्टॉप डैम के दोनों सिरों पर बैरिकेडिंग कर दी गई। वहां चौकीदार भी तैनात किए गए हैं। इसका मकसद बच्चों को इस रास्ते से रोकना है। साथ ही शिक्षा विभाग ने किरमची बंधेरा के माध्यमिक विद्यालय को हाईस्कूल में अपग्रेड करने का प्रस्ताव लोक शिक्षण संचालनालय को भेजा है।
हाईकोर्ट अब पूरे मामले की करेगा सुनवाई
हाईकोर्ट ने इस मामले को अपने स्तर पर दर्ज किया है। अब अदालत पूरे घटनाक्रम की सुनवाई करेगी। बच्चों की सुरक्षा, स्कूल तक पहुंच और ग्रामीण इलाकों की शिक्षा व्यवस्था पर सभी पक्षों से जवाब लिया जाएगा। इस मामले की सुनवाई आगे भी हाईकोर्ट की निगरानी में जारी रहेगी।
पहले भी ऐसे मामलों पर सख्त रहा है हाईकोर्ट
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले धार जिले में भी बच्चे नदी पार कर स्कूल जाते मिले थे। उस समय भी हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया था। अब विदिशा का मामला फिर वही सवाल उठा रहा है कि क्या ग्रामीण बच्चों को सुरक्षित शिक्षा का अधिकार मिल पा रहा है। इस मुद्दे पर अब अदालत की नजर बनी रहेगी।
सरकार, पीडब्ल्यूडी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और विदिशा कलेक्टर को नोटिस
इस स्वतः संज्ञान याचिका की सुनवाई जबलपुर हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच में हुई। मामले में कोर्ट ने अधिवक्ता नमन नागरथ और अधिवक्ता हिमांशु मिश्रा को न्याय मित्र (amicus curiea) नियुक्त किया है।
मध्य प्रदेश सरकार सहित पीडब्ल्यूडी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और विदिशा कलेक्टर को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले की पूरी स्टेटस रिपोर्ट तलब की है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर 2026 को तय की गई है।
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