केंद्र और राज्य के बीच मतदाता सूची को लेकर विवाद: एक ने काटा नाम, दूसरा देगा वोट का अधिकार
लोकतंत्र में मतदाता को सबसे बड़ा अधिकार हासिल है, लेकिन तब क्या हो जब देश की दो सबसे बड़ी चुनावी संस्थाएं एक ही मतदाता सूची को लेकर आमने-सामने आ जाएं? मौजूदा वक्त में कुछ ऐसा ही सियासी और प्रशासनिक टकराव केंद्र और राज्य के बीच देखने को मिल रहा है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत जिन मतदाताओं के नाम मुख्य वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं, वे अगले साल होने वाले नगर निगम और पंचायत चुनावों में फिर भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे।
इस दिलचस्प और हैरान करने वाली स्थिति की मुख्य वजह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और मध्यप्रदेश के राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के बीच पैदा हुआ गहरा मतभेद है। समन्वय की इसी कमी के चलते अब ऐसी स्थिति बन गई है कि एक आयोग द्वारा अयोग्य ठहराया गया मतदाता दूसरे आयोग की सूची में शामिल होकर वोट डालने के योग्य बन सकता है।
आखिर क्यों छिड़ा दोनों आयोगों में चिट्ठी युद्ध?
इस पूरे विवाद की जड़ में मतदाता सूची साझा करने की प्रक्रिया है। दरअसल, राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने अगले साल होने वाले पंचायत व नगरीय चुनाव और 15 जिलों के निकाय उपचुनावों को सुचारू रूप से कराने के लिए केंद्रीय आयोग (ECI) से एसआईआर के बाद तैयार की गई नई और अपडेटेड वोटर लिस्ट मांगी थी।
नियमों का हवाला देकर राज्य आयोग ने एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे पांच बार पत्र और रिमाइंडर भेजे, लेकिन केंद्रीय आयोग ने यह सूची उपलब्ध कराने से साफ इनकार कर दिया। केंद्रीय चुनाव आयोग से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने के बाद, राज्य निर्वाचन आयोग ने अपने स्तर पर एक स्वतंत्र और अलग वोटर लिस्ट तैयार करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।
SEC का पूरा चुनावी शेड्यूल और समय-सीमा
केंद्रीय आयोग से सहयोग न मिलने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने कमर कस ली है। अपनी अलग मतदाता सूची तैयार करने का पूरा कार्यक्रम घोषित कर दिया है। इस पूरी प्रक्रिया में समय और तारीखों का निर्धारण इस प्रकार किया गया है:
- पुनरीक्षण का आधार (Base of Revision): यह पूरा पुनरीक्षण 01 जनवरी 2026 की मतदाता सूची की स्थिति के आधार पर किया जा रहा है।
- 15 मई 2026: इस तारीख को फोटोयुक्त मतदाता सूची का सार्वजनिक प्रकाशन किया जाएगा।
- 25 मई 2026: प्रस्तावित मतदाता सूची को लेकर आम जनता से दावे और आपत्तियां ली जाएंगी।
- 30 मई 2026: प्राप्त हुए सभी दावों और आपत्तियों का अंतिम रूप से निराकरण किया जाएगा।
- 8 जून 2026: इस तारीख को राज्य निर्वाचन आयोग अपनी अंतिम व फाइनल मतदाता सूची जारी कर देगा।
34 लाख नामों के कटने का बड़ा असर
इस प्रशासनिक खींचतान के पीछे के आंकड़ों को देखें तो वह बेहद चौंकाने वाले हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) ने 21 फरवरी 2026 को अपनी अंतिम वोटर लिस्ट जारी की थी।
01 जनवरी 2026 की स्थिति का आकलन करते हुए दावों और आपत्तियों के निपटारे के बाद, इस सूची से रिकॉर्ड 34 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर पांच करोड़ 39 लाख रह गई है। अब यही 34 लाख हटे हुए नाम दोनों आयोगों के बीच विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गए हैं।
पांच पत्रों के बाद भी नहीं पिघला केंद्रीय आयोग
चुनावी नियमों के अनुसार, केंद्रीय आयोग को मांग किए जाने के 60 दिनों के भीतर विधानसभावार (Assembly-wise) मतदाता सूची राज्य आयोग को उपलब्ध करानी होती है। राज्य निर्वाचन आयोग ने नियमों का पालन करते हुए 28 जनवरी 2026 से लेकर 22 अप्रैल 2026 तक पांच बार आधिकारिक पत्र और स्मरण पत्र भेजे। जब तय समय के भीतर सूची नहीं मिली, तो आखिरकार 23 अप्रैल 2026 को राज्य आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए जिला स्तर पर अपनी खुद की अलग मतदाता सूची तैयार करने के निर्देश जारी कर दिए थे।
अधिकारियों के विरोधाभासी बयान
इस गंभीर विषय पर दोनों पक्षों के बयानों में भारी विरोधाभास देखने को मिल रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने एक हालिया घटनाक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ दिन पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने राज्यों के निर्वाचन आयुक्तों की एक उच्च स्तरीय बैठक ली थी। इसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि चुनाव आयोग राज्य के निर्वाचन आयोग को हरसंभव मदद करेगा।
हालांकि, जमीनी हकीकत इसके उलट रही। संयुक्त मुख्य राज्य निर्वाचन पदाधिकारी आरपी सिंह जादौन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि राज्य निर्वाचन आयोग ने नियमतः मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए डेटा मांगा था। वहीं, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का आधिकारिक जवाब था कि वह रिवीजन प्रक्रिया के लिए वोटर लिस्ट उपलब्ध नहीं कराता। जादौन ने दो टूक शब्दों में कहा कि सूची न देने का यह फैसला पूरी तरह से केंद्रीय आयोग का ही है।
जनता के सामने खड़ी होंगी दो विकट समस्याएं
आमतौर पर राज्य निर्वाचन आयोग, केंद्रीय आयोग की विधानसभा मतदाता सूची को ही आधार मानकर अपनी वार्डवार (Ward-wise) सूची तैयार करता है। वहीं, इस बार दोनों संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी के कारण व्यावहारिक स्तर पर दो बड़ी समस्याएं खड़ी होने की आशंका है:
- पहली स्थिति (First Scenario): स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में केंद्रीय सूची से हटाए गए 34 लाख मतदाता राज्य निर्वाचन आयोग की नई प्रक्रिया में दोबारा अपने दस्तावेज जमा कर स्थानीय निकाय चुनावों की सूची में शामिल हो सकते हैं। यानी वे विधानसभा के लिए अयोग्य होंगे पर निकाय चुनाव में वोट डाल सकेंगे।
- दूसरी स्थिति (Second Scenario): वे नए मतदाता प्रभावित हो सकते हैं जिन्होंने हाल ही में SIR के दौरान केंद्रीय सूची में अपना नाम जुड़वाया था। स्थानीय चुनावों की मतदाता सूची में शामिल होने के लिए उन्हें अब राज्य आयोग के सामने फिर से नए सिरे से दस्तावेज जमा करने की मशक्कत करनी पड़ सकती है।
इन 15 जिलों और पंचायतों में होने हैं उपचुनाव
यह पूरी कवायद बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में बड़े पैमाने पर उपचुनाव (By-elections) होने जा रहे हैं। इसके तहत 15 पार्षदों और 74 सरपंचों के पदों के लिए चुनाव होने हैं, जिनकी सूची इस प्रकार है:
- स्थानीय निकाय (Local Bodies): नगर परिषद फूप (भिंड), नगर निगम ग्वालियर, नगर पालिका दतिया, नगर निगम सागर, नगर पालिका दमोह, नगर परिषद कोटर (सतना), नगर परिषद नागौद (सतना), नगर परिषद चाकघाट (रीवा), नगर पालिका कोतमा (अनूपपुर), नगर निगम कटनी, नगर पालिका मुलताई (बैतूल), नगर पालिका इटारसी (नर्मदापुरम), नगर परिषद सिलवानी (रायसेन), नगर परिषद लोहारदा (देवास) और नगर निगम इंदौर शामिल हैं।
- पंचायत तालिका (Panchayat Data): इसके अंतर्गत जिला पंचायत सदस्य के तीन पद, जनपद पंचायत सदस्य के 13 पद, सरपंच के 74 पद और पंच के 3753 पदों पर उपचुनाव होने हैं।
इंटीग्रेटेड इलेक्शन सिस्टम ही एकमात्र समाधान
इस पूरे असमंजस और प्रशासनिक विवाद पर देश के वरिष्ठ चुनावी विशेषज्ञों ने अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है। रिटायर्ड चुनाव अधिकारी आरआर बंसल का मानना है कि परंपरागत रूप से राज्य निर्वाचन आयोग हमेशा केंद्रीय चुनाव आयोग से ही मतदाता सूची लेकर उसे अपडेट करता रहा है।
उनके मुताबिक, शायद SIR के बाद आई तकनीकी विसंगतियों (Anomalies) की आशंका के कारण केंद्रीय आयोग ने सूची साझा नहीं की होगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्थानीय निकाय और विधानसभा चुनावों में कई बार मतदाता अलग-अलग पते दर्ज करा देते हैं, जिससे यह समस्या बढ़ती है। बंसल ने जोर देकर कहा कि जब तक स्थानीय निकाय और विधानसभा चुनाव एक ही एजेंसी नहीं कराएगी, तब तक अलग-अलग मतदाता सूचियों की वजह से यह भ्रम बना रहेगा।
वहीं, देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस तकनीकी अंतर को समझाते हुए बताया कि केंद्रीय चुनाव आयोग साल में चार बार मतदाता सूची को अपडेट (Update) करता है, जबकि राज्य निर्वाचन आयोग साल में केवल एक बार ही सूची को संशोधित (Amend) करता है।
उन्होंने एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहलू की ओर इशारा करते हुए कहा किSIR के बाद सूची साझा न करने के पीछे केंद्रीय आयोग के मन में भविष्य की कानूनी चुनौतियों की आशंका भी एक बड़ी वजह हो सकती है।
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