केंद्र ने कोर्ट में कहा- दवाइयों पर ट्रेड मार्जिन MRP का 30% तक सीमित, राजस्थान में अस्पताल मरीजों को लूट रहे
कैंसर की दवाओं के मार्जिन को लेकर देशभर में बवाल मचा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इन दवाओं के अनियंत्रित दामों को डकैती और नरसंहार जैसा बताया है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा है कि ट्रेड मार्जिन को अब एमआरपी (MRP – Maximum Retail Price) के 30 प्रतिशत तक सीमित किया जा रहा है। इससे महंगी दवाएं अब इतनी महंगी नहीं मिलेंगी।
लेकिन तब तक कैंसर मरीजों का बड़ा नुकसान हो चुका है। राजस्थान में की गई एक जांच में कैंसर की दवाओं पर 1100 प्रतिशत से 2583 प्रतिशत तक का मार्जिन वसूला जाने का खुलासा हुआ है। यानी सिर्फ 370 रुपए की दवा पर 11,570 रुपए की एमआरपी अंकित है। प्राइवेट हॉस्पिटल इसे 9,762 रुपए में बेच रहे हैं।
किन दवाओं पर कितना मार्जिन
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ दवाओं में कंपनी का रेट और मरीज को दिया जाने वाला रेट बहुत अलग है। पेक्लीटेक्सल 260 एमजी इंजेक्शन की कंपनी रेट 590 रुपए है। डिस्ट्रीब्यूटर इसे 788 रुपए में लेता है। इसकी एमआरपी 10,500 रुपए है। यह दवा एपेक्स हॉस्पिटल में 9,000 रुपए में मरीज को दी जा रही है। इसमें 1,142 प्रतिशत का मार्जिन है।इसी दवा को सूर्या मेडिकल, मानसरोवर 2,000 रुपए में दे रहा है। यहां मार्जिन 153 प्रतिशत है।
एबिराटेरोन एसीटेट 250 एमजी टेबलेट प्रोस्टेट कैंसर में काम आती है। इसकी कंपनी रेट 2,750 रुपए और एमआरपी 29,500 रुपए है। यह एपेक्स हॉस्पिटल में 26,550 रुपए में दी जा रही है। मार्जिन 624 प्रतिशत है।
डोसीटेक्सल इंजेक्शन ब्रेस्ट और लंग्स कैंसर की कीमो में काम आता है। इसकी कंपनी रेट 277.5 रुपए और एमआरपी 11,570 रुपए है। एपेक्स हॉस्पिटल में यह 9,762 रुपए में मिल रहा है। यहां मार्जिन 2,538 प्रतिशत है।
जेमसीटाबीन इंजेक्शन की कंपनी रेट 352.5 रुपए और एमआरपी 6,013 रुपए है। यह एपेक्स हॉस्पिटल में 5,412 रुपए में दिया जा रहा है। इसमें 1,051 प्रतिशत का मार्जिन है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि 2,700 रुपए की कैंसर दवा पर एमआरपी 27,000 रुपए है। कोर्ट ने सवाल किया कि सारी दवाओं पर एक जैसा 16 प्रतिशत का यूनिफॉर्म मार्जिन क्यों नहीं रखते।
केंद्र सरकार ने क्या किया
केंद्र सरकार ने कोर्ट को जवाब दिया है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA – National Pharmaceutical Pricing Authority) ने नॉन शेड्यूल कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 प्रतिशत कर दिया है। पहले 131 कैंसर दवाएं प्राइस कंट्रोल में थीं। अब 110 नई ब्रांडेड, जेनेरिक और इंपोर्टेड दवाएं भी इसमें आ गई हैं।
मरीजों को कैसे लूटा जाता है?
अस्पताल और कंपनियां मिलकर मरीजों से ज्यादा पैसे वसूलते हैं। इसके कुछ तरीके हैं। कंपनी अस्पताल संचालकों से मार्जिन तय कर देती है। फिर दवा अस्पताल की फार्मेसी को दे दी जाती है। अस्पताल के डॉक्टर वही दवाएं लिखते हैं। इससे अस्पतालों को फायदा होता है।
दूसरा तरीका यह है कि कंपनी डॉक्टर्स से मिलती है। कमीशन तय करती है। दवाएं अस्पताल की फार्मेसी पर आती हैं। डॉक्टर्स ये दवाएं लिखते हैं। तीसरा तरीका कॉरपोरेट अस्पतालों का है। ये सिर्फ एडमिट पेशेंट को दवा देते हैं। बाहर के पर्चे पर दवा देने से मना कर देते हैं।
क्या कहते हैं नियम?
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC – National Medical Commission) के नियमों के अनुसार मरीज कहीं से भी दवा ले सकता है। उसे किसी खास दुकान या अस्पताल से दवा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। लेकिन अस्पताल अक्सर अपने ही यहां से दवा लेने का दबाव बनाते हैं।
राजस्थान में क्या है स्थिति
राजस्थान के ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हेल्थ सेक्रेट्री ने एनपीपीए को पत्र लिखा है। अस्पतालों को मरीजों से खिलवाड़ नहीं करने के निर्देश हैं। लेकिन प्राइस कंट्रोलिंग सीधे उनके हाथ में नहीं है। ऐसे में मरीजों को सतर्क रहना चाहिए और जरूरत पड़ने पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए।