75 साल की विधानसभा: राजनीतिक टकराव बढ़ा, लेकिन घटते चले गए कामकाज के दिन
ऐसे समझें पूरा मामला
- राजस्थान विधानसभा अपने 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है।
- सदन में राजनीतिक टकराव बढ़ा, लेकिन काम के दिन घट गए।
- बैठकों में लगभग 52% और कामकाजी घंटों में 40% की गिरावट आई।
- वर्ष 1993 के बाद से विधानसभा का मिजाज पूरी तरह बदल गया।
- बैठकें अब सिर्फ 119 से 147 दिनों के बीच सिमट कर रह गईं।
Jaipur: राजस्थान विधानसभा अपने 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह वही सदन है, जिसने प्रदेश की तकदीर बदलने वाले कई ऐतिहासिक फैसलों को जन्म दिया।
इस अमृतकाल में एक कड़वा सच भी सामने आया है। जैसे-जैसे राज्य की आबादी और चुनौतियां बढ़ीं, सदन के काम करने के दिन आधे रह गए।
गंभीर सवाल यह है कि क्या जनता की सर्वोच्च आवाज बनने वाला यह सदन अपने मूल दायित्वों से दूर होता जा रहा है?
राजनीति बढ़ी, पर काम घट गया
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा में अब जनहित की बातें कम, राजनीतिक टकराव और शोर-शराबा ज्यादा दिखता है।
जनता की समस्याओं को लेकर विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब समय पर नहीं मिलते। अफसरशाही में भी अब विधानसभा के प्रति अपेक्षित गंभीरता नजर नहीं आती।
बैठकों में 52 प्रतिशत गिरावट
दूसरी विधानसभा (1957-62) प्रदेश के इतिहास में कामकाज को लेकर सबसे सार्थक रही। इसके 11 सत्रों के दौरान 305 बैठकें हुईं। 1,665 से अधिक घंटों का विधायी कामकाज हुआ।
इसके विपरीत, 15वीं विधानसभा (2018-23) में आठ सत्रों में केवल 147 बैठकें हुईं। इसमें 995 घंटे से कुछ ही अधिक का कामकाज पूरा हो सका।
इस तरह सात दशकों में बैठकों में लगभग 52% और कामकाजी घंटों में 40% की गिरावट आई है।
हालांकि, यह गिरावट यह गिरावट अचानक नहीं हुई है। चौथी विधानसभा में 242 और पांचवीं में 200 बैठकें हुई थीं।
आठवीं विधानसभा (1985-90) एक अपवाद के रूप में रही। इसमें 180 बैठकें दर्ज की गईं और 1,531 घंटे से अधिक का कामकाज हुआ।
1993 के बाद बदला मिजाज
वर्ष 1993 के बाद से विधानसभा का मिजाज बदल गया। पूरे पांच साल के कार्यकाल में 10 या 11 से अधिक सत्र नहीं हुए हैं।
बैठकें सिर्फ 119 से 147 दिनों के बीच सिमट कर रह गई हैं। वर्तमान में चल रही 16वीं विधानसभा सत्र में अब तक पांच सत्र, 84 बैठकें और 573 घंटे से अधिक का विधायी कामकाज पूरा किया है।
टाइमिंग वही, पर दिन कम!
दिलचस्प फैक्ट यह है कि विधायकों के बैठने का डेली एवरेज आज भी 6 से 7 घंटे ही है। यानी जब भी सदन बैठता है, काम पूरा करता है। कमी कार्यवाही की अवधि में नहीं, बल्कि सदन बुलाने के दिनों की संख्या में आई है।
शुरुआती दशकों में साल में औसतन 60 दिन विधानसभा चलती थी। हाल के वर्षों में यह घटकर 30 दिन से भी कम रह गई है।
सत्ता और विपक्ष दोनों को सोचना होगा
पूर्व विधायक बनवारीलाल सिंघल का कहना है कि इस बदलते और सिमटते ट्रेंड पर केवल चिंता जताने से काम नहीं चलेगा।
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को एक साथ बैठकर लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने और सदन की गरिमा को वापस उसी मुकाम पर ले जाने के लिए आगे आना होगा।
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