गलियों में गूंजे ठहाके, 150 साल पुरानी सेठ-सेठानी परंपरा ने जीवंत की होली की रंगत

Ashish Bhardwaj | Mar 02, 2026, 13:12 IST
Photograph: (the sootr)
जब आधुनिकता के शोर में पुरानी परंपराएं दम तोड़ने लगती हैं, तब राजस्थान का अलवर शहर अपनी विरासत को सहेज रहा है। यहां हर होली पर सेठ-सेठानी का नागोरी स्वांग देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं।

News In Short

  • राजस्थान के अलवर में होली पर होता है सेठ-सेठानी का नागोरी स्वांग।
  • 150 साल पुरानी यह पंरपरा लोगों को जोड़ती है जड़ां से।
  • होली पर नागोरी स्वांग को देखने के लिए उमड़ता पूरा शहर।
  • राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा ने की नागोरी स्वांग की जमकर तारीफ।
  • इस स्वांग को सहेजने का काम रही अलवर की एक संस्था।

News In Detail

सुनील जैन. ​अलवर।



होली के रंगों के बीच राजस्थान के अलवर शहर में एक ऐसी परंपरा जीवित है, जो न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से भी जोड़ती है। यह परंपरा है सेठ-सेठानी का नागोरी स्वांग। पिछले 150 साल से चली आ रही इस पंरपरा ने एक बार फिर शहर के बाजारों में हंसी के फव्वारे छोड़ दिए। सड़क पर निकलते इस जीवंत नाटक को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।



​काशीराम चौराहे से कंपनी बाग तक उत्सव का सैलाब

होली से ठीक एक दिन पहले पहल सेवा संस्था के तत्वावधान में इस भव्य स्वांग का आयोजन किया गया। दोपहर ढलते ही शहर का काशीराम चौराहा उल्लास के रंगों में सराबोर हो गया। यहां से शुरू हुआ सेठ-सेठानी का यह कारवां शहर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ कंपनी बाग तक पहुंचा।



​स्वांग में शामिल कलाकार जब पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे सेठ और सेठानी बनकर निकले तो उनकी चाल-ढाल और चुटीले संवादों ने हर किसी को लोटपोट कर दिया। रास्ते भर लोग छतों पर खड़े होकर इस नज़ारे का आनंद लेते रहे।



व्यंग्य और संवादों की जुगलबंदी

इतिहासकार हरिशंकर गोयल बताते हैं कि अलवर में इस परंपरा को 'नागोरी स्वांग' के नाम से जाना जाता है। इसमें कलाकार केवल कपड़े ही नहीं बदलते, बल्कि उस पात्र को जीते हैं। सेठ-सेठानी के बीच चलने वाली नोक-झोंक, समाज की कुरीतियों पर कटाक्ष और हास्य से भरे संवाद इस आयोजन की जान होते हैं।



​गोयल कहते हैं कि यह सिर्फ एक नाटक नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है। समय के साथ इसमें नए बदलाव भी किए गए हैं। यही कारण है कि आज भी लोगों में इस स्वांग के प्रति क्रेज कम नहीं हुआ है।





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​मुख्य अतिथि वन मंत्री ने की सराहना

​इस भव्य आयोजन के मुख्य अतिथि राजस्थान सरकार के वन मंत्री संजय शर्मा रहे। उन्होंने कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन ही हमारी वास्तविक थाती हैं। उन्होंने पहल सेवा संस्था के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि आज के दौर में सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना एक बड़ी चुनौती है, जिसे अलवर की जनता बखूबी निभा रही है। यह स्वांग समाज को आपसी भाईचारे और खुशी का संदेश देता है।



​लुप्त होती कला को नया जीवन

​संस्था के प्रतिनिधि शंकर लाल सैनी ने बताया कि संस्था पिछले कई साल से इस लुप्त होती कला को बचाने का काम कर रही है। आयोजन के दौरान न केवल झांकियां निकाली गईं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी संगम देखने को मिला। पूरे मार्ग पर अनुशासन के साथ-साथ युवाओं और महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा ने इसे एक बड़े महोत्सव का रूप दे दिया।





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​क्यों खास है अलवर की यह होली

अलवर का यह स्वांग अपनी हास्य शैली के लिए जाना जाता है। यह स्वांग यह संदेश देता है कि त्योहार केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि साथ मिलकर हंसने और खुशियां बांटने का अवसर है। लोक कलाओं का जादू आज भी बरकरार है। स्वांग देखने आए स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्हें साल भर इस दिन का इंतजार रहता है, क्योंकि यह उन्हें उनके बचपन की याद दिलाता है।



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