अरावली पर पर्यावरणविदों ने सीजेआई को लिखा पत्र, नई कमेटी पर उठाए सवाल
ऐसे समझें पूरा मामला
- देश के प्रमुख पर्यावरणविदों ने चीफ जस्टिस (CJI) को लिखा साझा पत्र लिखा।
- पत्र में नई अरावली संरक्षण समिति को सरकारी चंगुल से निकालने का किया आग्रह।
- यह समिति अरावली की परिभाषा से संबंधित विवादास्पद रिपोर्ट का करेगी जांच।
- सरकारी दबाव में काम करने वाली कमेटी नहीं कर सकती है अरावली से न्याय।
Jaipur: अरावली पर्वतमाला को बचाने की मुहिम नया रूप लेती जा रही है। देशभर के वैज्ञानिकों, वरिष्ठ पर्यावरणविदों और संरक्षण संगठनों ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) को साझा पत्र लिखा है।
पत्र में शीर्ष कोर्ट के आदेश पर गठित नई अरावली संरक्षण समिति की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नई कमेटी पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है। इससे अरावली के भविष्य के साथ न्याय होना असंभव है। अरावली के हित में इस समिति में बदलाव किया जाना चाहिए।
अरावली की परिभाषा से खिलवाड़
सुप्रीम कोर्ट के 25 मई 2026 को आए आदेश के तहत अरावली पर नई कमेटी बनाई गई है। इस कमेटी को अक्टूबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा सौंपी गई उस विवादास्पद रिपोर्ट की दोबारा जांच करनी है, जिसने अरावली की परिभाषा को ही बदल दिया था।
वनशक्ति के निदेशक स्टालिन दयानंद ने कहा कि कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी पूर्व निर्णय की समीक्षा करने वाली संस्था का दर्जा पहले वाले निकाय से बड़ा होना चाहिए। पिछली समिति की अध्यक्षता पर्यावरण सचिव ने की थी।
वहीं, इस नई कमेटी के अध्यक्ष (ICFRE के महानिदेशक) और सदस्य सचिव दोनों ही पर्यावरण मंत्रालय के अधीन आते हैं। ऐसे में मंत्रालय के दबाव में काम करने वाली यह कमेटी अरावली के साथ न्याय कैसे कर सकती है?
जांच हो हटाए जिलों के मामले की
यूनाइटेड कंजर्वेशन मूवमेंट के प्रबंध न्यासी जोसेफ हूवर ने बताया कि वन सर्वेक्षण संस्थान (FSI) ने सितंबर 2025 की अपनी रिपोर्ट में अरावली के दायरे में 63 जिलों को शामिल किया था। इसमें मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को बेहद अहम बताया था।
लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह दबा दिया और कोर्ट में झूठा हलफनामा देकर अरावली जिलों की संख्या घटाकर सिर्फ 37 कर दी। राजस्थान के चित्तौड़गढ़, सवाई माधोपुर और बूंदी जैसे प्रमुख अरावली जिलों को इस नक्शे से गायब कर दिया गया। पर्यावरणविदों ने अब इस हेरफेर की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
अधिकारी कभी सरकार के खिलाफ नहीं लिखते
इस मुहिम को देहरादून के पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के संस्थापक डॉ. रवि चोपड़ा का भी साथ मिला है। इन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कई कमेटियों की अध्यक्षता की है।
डॉ. चोपड़ा ने कहा कि मेरा यह अनुभव रहा है कि समितियों में शामिल सरकारी अधिकारी और सरकारी संस्थाओं के वैज्ञानिक मीटिंग में तो विपरीत विचार रखते हैं, लेकिन कभी भी सरकार के रुख के खिलाफ अपनी राय दर्ज नहीं कराते। इस नई समिति में भी लगभग सभी सदस्य सरकारी तंत्र से हैं। इसलिए इनकी निष्पक्षता पर गहरा संदेह है।
स्वतंत्र वैज्ञानिकों की है जरूरत
बेंगलुरु के भूविज्ञानी सीपी राजेंद्रन और यूएनईपी (UNEP) के पूर्व विशेषज्ञ सागर धारा ने मांग की है कि कमेटी का नेतृत्व नौकरशाहों के बजाय स्वतंत्र पारिस्थितिकीविदों, जलविज्ञानियों और वैज्ञानिकों के हाथों में होना चाहिए। उन्होंने अतीत में प्रो. एमजीके मेनन और डॉ. रवि चोपड़ा जैसी स्वतंत्र हस्तियों की अध्यक्षता में बनी कमेटियों का उदाहरण भी दिया।
वहीं, महाराष्ट्र के पुष्कर कुलकर्णी, ओड़िशा के प्रफुल्ल समंतरा और पंजाब की समिता कौर ने जोर देकर कहा कि खनन से स्थानीय आजीविका और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किए बिना कोई भी रिपोर्ट अधूरी होगी। इसके लिए क्षेत्र-विशेष के विशेषज्ञों को कमेटी का अभिन्न अंग बनाना अनिवार्य है।
रिपोर्ट को सीधे कोर्ट को सौंपने की मांग
पुणे की डॉ. सुमिता काले ने कहा कि नई कमेटी अपनी रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय को सौंपने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट को सौंपे, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
उन्होंने कहा कि कमेटी को कागजी कार्रवाई से बाहर निकलकर अरावली क्षेत्र के खनन प्रभावित समुदायों के बीच जाकर जमीनी हकीकत समझनी चाहिए। इन सभी व्यापक प्रक्रियाओं को देखते हुए रिपोर्ट सौंपने की मौजूदा अंतिम तिथि 31 अगस्त 2026 को आगे बढ़ाया जाना बेहद जरूरी है।
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