अरावली का 500 मीटर लूपहोल, 11000 पहाड़ियों के बचाव में आई सुप्रीम कोर्ट

Mukesh Sharma | Jun 04, 2026, 16:51 IST
Photograph: (the sootr)
अरावली की नई संकीर्ण परिभाषा से 11,000 से अधिक पहाड़ियों पर अवैध खनन का संकट मंडरा गया था। जन-आक्रोश के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर इस फैसले पर रोक लगाई । अब एक्सपर्ट कमेटी अगस्त 2026 तक इसका अंतिम भविष्य तय करेगी।

News In Short

  • मापदंडों का खेल,कैसे महज़ कुछ मीटर की कानूनी परिभाषा अरावली के 90% हिस्से को मैदान बना रही थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर अपने ही पुराने फैसले पर लगाई रोक, माफियाओं के मंसूबों पर फिरा पानी।
  • 500 मीटर का लूपहोल,दो पहाड़ियों के बीच की दूरी का फायदा उठाकर 11,000 से अधिक पहाड़ियों पर मंडराया संकट।
  • एक्सपर्ट के हाथ कमान,नौकरशाहों के बजाय अब वैज्ञानिकों की कमेटी तय करेगी अरावली का असली भविष्य।

News In Short

क्या महज़ कुछ मीटर की परिभाषा बदलकर किसी सदियों पुराने पहाड़ को कानूनी तौर पर मैदान घोषित किया जा सकता है? पहली नज़र में यह मज़ाक लग सकता है, लेकिन भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली इस समय इसी कागज़ी खेल के जाल में फंसी है।



अरावली को बचाने और उसकी सीमाओं को फिर से परिभाषित करने के लिए अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने खुद कमान संभाल ली है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अगुवाई वाली खंडपीठ ने पांच सदस्यों की उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट रुप से पर्यावरण के साथ हो रहे प्रशासनिक खिलवाड़ की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने उच्च स्तरीय समिति गठित करके यह भी साफ कर दिया है कि अब पर्यावरण की बर्बादी भी बर्दाश्त नहीं होगी।



परिभाषा का वो खेल, जो अरावली को कर देगा गायब ?

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार की उस परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली का हिस्सा माना गया था। लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध हुआ और यह पाया गया कि इससे अरावली का 90% हिस्सा सुरक्षा दायरे से बाहर हो सकता है। विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए अपने पुराने फैसले पर रोक लगा दी और मामले को फिर से शुरू कर दिया।


इसके अतिरिक्त रेंज (पर्वतमाला) की शर्त के अनुसार अरावली पर्वतमाला तब मानी जाएगी जब ऐसी दो पहाड़ियां एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों।



अस्तित्व ही संकट में आ गया

इससे दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात जैसे 4 राज्यों में फैली 2 अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला का अस्तित्व ही संकट में आ गया। भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के एक आकलन के मुताबिक राजस्थान के 15 जिलों में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियाँ यानी मात्र 8.7% ही इस 100 मीटर की ऊंचाई के मानदंड को पूरा करती हैं।


इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि राजस्थान में जिसे पहले व्यापक रूप से अरावली माना जाता था उसका करीब 90% हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा और उसे माईनिंग के लिए खोल दिया जाएगा। क्यों कि 100 मीटर की परिभाषा में पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण कम ऊंचाई वाली झाड़ियों वाली पहाड़ियाँ,घास के मैदान और संकरा व ऊंचा भाग(ridges) शामिल है।



आशंका और खतरा

यदि यह परिभाषा लागू रहती है तो बाकी बची 11,033 पहाड़ियों का क्या होगा? क्या वे रातों-रात गैर-अरावली घोषित होकर माइनिंग माफिया और बिल्डर्स के हवाले कर दी जाएंगी ? दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से ज़्यादा का फासला होते ही बीच की ज़मीन को असुरक्षित घोषित कर वहां खनन शुरू किया जा सकता है।



चार राज्य, चार परिभाषाएं और अवैध खनन का शॉर्टकट

अरावली का संकट सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है। यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक जाती है। अब तक का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा है कि इन चारों राज्यों में अरावली की परिभाषा अलग-अलग थी।



इसी कानूनी धुंधलके और नियामक कमियों (Regulatory Loopholes) का फायदा उठाकर माइनिंग लीज़ होल्डर्स और अवैध खनन करने वालों ने अरावली के सीने को छलनी किया। मरुस्थलीकरण (Registan का बढ़ना) को रोकने और दिल्ली-NCR के ग्राउंड वाटर (भूजल स्तर) को बचाए रखने वाली इस ढाल को कानूनी कागज़ों में कमज़ोर किया जा रहा था। इसके खिलाफ दिसंबर 2025 में जनता सड़कों पर उतरी और कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया था।



नौकरशाहों के फैसले पर भारी पड़े विशेषज्ञ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दूरगामी पर्यावरणीय परिणामों वाले फैसले बिना विशेषज्ञों के नहीं लिए जा सकते। कोर्ट ने पूर्व में दी गई रिपोर्ट को सीधे स्वीकार न करते हुए उसकी स्वतंत्र समीक्षा का ज़िम्मा वैज्ञानिकों और एक्सपर्ट को सौंपा है।



यह है कमेटी

इस कमेटी की कमान ICFRE (भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद) के महानिदेशक को सौंपी गई है। इसमें भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), दिल्ली यूनिवर्सिटी के बॉटनी विभाग और पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व दिग्गज शामिल हैं। इनके साथ प्रो. जगदीश कृष्णस्वामी और प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे पर्यावरण विशेषज्ञों को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया है।



31 अगस्त की समय सीमा

कोर्ट ने इस लड़ाई को केवल बंद कमरों तक सीमित रखने के स्थान पर कमेटी को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वह एक पब्लिक नोटिस जारी करे। इसमें दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान की सरकारों के साथ-साथ पर्यावरण समूहों,खदान मज़दूरों,किसानों और स्थानीय समुदायों से सुझाव लिए जाएंगे। कमेटी को 31 अगस्त, 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपनी है। इसके बाद 7 सितंबर, 2026 को होने वाली सुनवाई अरावली का भविष्य तय कर सकती है।



इनका कहना है

राजस्थान हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट गिरधारी सिंह बापना ने बताया कि हम कमेटी को मामले से जुड़े सभी फैक्टस और रिपोर्ट देंगे और कोशिश करेंगे। हमारे देश में अभी पहाडियों को बचाने या संरक्षित करने के लिए कोई कानून नहीं है। हमने देशभर की पहाड़ियों केा बचाने के लिए एक कानून प्रस्तावित किया है और इसका प्रारंभिक ड्राफ्ट भी तैयार किया है। हम कमेटी को पहाडों के संरक्षण के लिए कानून बनाने का सुझाव भी देंगे।



ये भी पढे़:-

वेटिंग लिस्ट अभ्यर्थियों के लिए खुशखबरी, राजस्थान में बदले भर्ती नियम



आसाराम को राजस्थान हाई कोर्ट से मिली राहत, जेल में उचित चिकित्सा सुविधा के आदेश



पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल के खिलाफ JJM घोटाले में 17,500 पन्नों की चार्जशीट पेश



RPSC इन भर्तियों की बढ़ाई सीट, अब कितने पदों पर होगी वैकेंसी