बिना कैंपस और स्टाफ के सिर्फ कागजों में चल रही बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी
News In Short
- तीन साल में भी बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी नहीं हो पाई शुरू।
- 197 कॉलेजों को संबद्धता देनी थी, लेकिन एक भी नहीं जुड़ा।
- कर्मचारियों के वेतन, गाड़ियों और एसी-फर्नीचर पर 3.27 करोड़ खर्च।
- जामडोली में 10 एकड़ जमीन के बावजूद कैंपस तक नहीं बना।
- VC ने तीन साल में सरकार को 50 पत्र लिखे, पर कोई फायदा नहीं।
News In Detail
विशेष योग्यजनों (दिव्यांगों) को उच्च शिक्षा, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और कौशल विकास के जरिए आत्मनिर्भर बनाने के दावों के साथ स्थापित की गई बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी राजस्थान के सरकारी सिस्टम की घोर लापरवाही का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। तीन साल पहले वजूद में आई इस यूनिवर्सिटी में प्रथम कुलगुरु (VC) का कार्यकाल अगले महीने समाप्त होने जा रहा है, लेकिन यूनिवर्सिटी आज भी अपनी शुरुआत के पहले कदम पर ही खड़ी है।
वेतन और सुख-सुविधाओं पर खर्च हुए 3.27 करोड़
हैरान करने वाली बात यह है कि यूनिवर्सिटी में आज तक एक भी छात्र ने पैर नहीं रखा है और न ही किसी विषय की पढ़ाई शुरू हुई है। इसके बावजूद, प्रतिवर्ष सरकारी खजाने से लगभग 1 करोड़ रुपए खर्च हो रहा है।
किराए के भवन के 8 कमरों में चल रहे इस दफ्तर में कुलगुरु, रजिस्ट्रार, वित्त नियंत्रक, एएओ और दो सूचना सहायकों की नियुक्ति की गई थी। इनमें से वीसी को छोड़कर बाकी सभी कर्मचारी डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) पर हैं। इन अधिकारियों की भारी-भरकम सैलरी, गाड़ियों के भत्तों, दफ्तर के एसी और फर्नीचर पर अब तक 3.27 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, जिसमें से अकेले 2.50 करोड़ रुपए केवल वेतन मद में गए हैं।
बीजेपी विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने इस फिजूलखर्ची और विफलता के मुद्दे को राजस्थान विधानसभा में भी पुरजोर तरीके से उठाया था।
यूजीसी की मान्यता मिली
यूनिवर्सिटी को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने अपने नियम 2(एफ) के तहत आधिकारिक मान्यता भी दे दी थी, जो किसी भी नई यूनिवर्सिटी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है। इसके बाद विश्वविद्यालय को राजस्थान के उन 197 कॉलेजों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर संबद्धता (एफिलिएशन) देनी थी जो दिव्यांग बच्चों के लिए स्पेशल बीएड और एमएड कोर्स कराते हैं।
लेकिन यूनिवर्सिटी के स्तर पर प्रशासनिक विंग और नियमों का ढांचा तैयार न होने के कारण एक भी कॉलेज को नहीं जोड़ा जा सका। यहां तक कि यूनिवर्सिटी के सुचारू संचालन के लिए बनने वाली आधिकारिक कमेटियों में राज्य सरकार ने आज तक अपने किसी प्रतिनिधि (नॉमिनी) को नियुक्त ही नहीं किया।
50 पत्र लिखे, पर सरकार मौन
यूनिवर्सिटी के इस हश्र और विफलता पर संस्थान के प्रथम कुलगुरु डॉ. देव स्वरूप ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा कि मुझे स्किल यूनिवर्सिटी का अतिरिक्त प्रभार (चार्ज) मिला हुआ था, जिससे एक तरफ मेरी कुछ उपयोगिता तो सिद्ध हो सकी। लेकिन बाबा आमटे दिव्यांग यूनिवर्सिटी मेरे अथक प्रयासों के बावजूद एक मॉडल यूनिवर्सिटी बनने से महरूम रह गई। मैंने पिछले 3 साल के कार्यकाल में राज्य सरकार को समय-समय पर 50 से अधिक आधिकारिक पत्र लिखे, लेकिन सरकार की तरफ से न तो कोई जरूरी बजट (फंड) मिला, न शैक्षणिक स्टाफ की भर्ती हुई और न ही बुनियादी संसाधन दिए गए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
बाबा आमटे दिव्यांग विश्वविद्यालय की स्थापना किस उद्देश्य से की गई थी?
इस यूनिवर्सिटी की स्थापना राजस्थान के दिव्यांग छात्रों को स्पेशल हायर एजुकेशन, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और रोजगारोन्मुखी कौशल विकास (स्किल्स ट्रेनिंग) प्रदान कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए की गई थी।
तीन साल बीतने के बाद भी यूनिवर्सिटी ग्राउंड लेवल पर शुरू क्यों नहीं हो सकी?
इसकी मुख्य वजह सरकार द्वारा यूनिवर्सिटी को स्वीकृत न किया गया स्टाफ है। विभाग ने 91 टीचिंग और 156 नॉन-टीचिंग स्टाफ की फाइल भेजी थी, जिसे वित्तीय स्वीकृति नहीं मिली, साथ ही आवंटित 10 एकड़ जमीन पर भी निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया गया।
यूनिवर्सिटी को लेकर विधानसभा में किस विधायक ने सवाल उठाए थे?
बीजेपी के वरिष्ठ विधायक प्रताप सिंह सिंघवी ने विधानसभा सत्र के दौरान इस यूनिवर्सिटी में बिना किसी काम और छात्र के हो रहे करोड़ों रुपए के खर्च और प्रशासनिक विफलता का मामला उठाया था।
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