कैसे आतंकी जाल में फंसती चली गई, जानिए बबीता धाकड़ की सीक्रेट ऑनलाइन लाइफ
Jaipur: जयपुर की 38 साल की बबीता धाकड़ को उसकी कॉलोनी के लोग शांत और सीधी-सादी महिला के रूप में जानते थे। पड़ोसियों ने उसे जब भी देखा, बेहद कम बात करते हुए पाया। वह टोंक रोड की एक कॉलोनी में माता-पिता के साथ रहती थी।
साल 2017 में उसकी शादी हुई थी। शादी एक महीने भी नहीं टिक सकी। बीए (BA) पास करने के बाद बबीता घर पर ही थी। उसका दहेज उत्पीड़न तथा तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा था।
बबीता ने अपना खाली समय काटने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया। यहीं से शुरू हुआ उसकी उस दोहरी ज़िंदगी का सफर, जिससे उसके अपने परिवार वाले भी पूरी तरह अनजान थे।
जिज्ञासा से शुरुआत
एक साल पहले बबीता ने जिज्ञासा के रूप में सोशल मीडिया पर कुछ कट्टरपंथी और जिहादी पेजों, प्रोफाइलों और हैंडलों को देखना शुरू किया।
जांच अधिकारियों के मुताबिक वह इंटरनेट पर ऐसे वीडियो देखती थी। वह उन्हें बहादुर व करिश्माई मानती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह जिज्ञासा एक गहरे खिंचाव में बदल गई।
वह जैश-ए-मोहम्मद, आईएसआई और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े करीब 300 से अधिक सोशल मीडिया ग्रुप्स में शामिल हो गई। उसे विशेष रूप से वो प्रोफाइल तस्वीरें पसंद थीं, जिनमें बंदूकें लगी होती थीं। इसके बाद उसने व्हाट्सएप और फेसबुक मैसेंजर के जरिए इन ग्रुप्स के पीछे बैठे लोगों से सीधे चैट करना शुरू कर दिया।
ऑनलाइन प्यार और धर्म परिवर्तन
इसी दौरान बबीता सोशल मीडिया पर अबू उबैदाह नाम के एक शख्स के संपर्क में आई। उसने खुद को जैश-ए-मोहम्मद का करीबी सदस्य और उसके मुखिया मसूद अजहर का वफादार बताया था।
उबैदाह बातचीत के दौरान वीडियो कॉल पर कभी अपना चेहरा नहीं दिखाता था। सुरक्षा कारणों का हवाला देकर चेहरा छिपाए रखता था। उसने बबीता की खूबसूरती, उसकी आंखों की तारीफों के पुल बांधकर उसे अपने जाल में फंसा लिया।
समाज से निराश बबीता को उबैदाह की बातों में अपनापन और सहारा दिखने लगा। वह उससे भावनात्मक रूप से जुड़ती गई। उसने उबैदाह से शादी करने की इच्छा जता दी।
बाद में ऑनलाइन ही एक रस्म आयोजित की गई, जहां एक मुस्लिम मौलवी की मौजूदगी में बबीता को कलमा पढ़ाया गया। उसका धर्म परिवर्तन कराया गया। उसे एक नया इस्लामिक नाम दिया गया- खादीजा। उबैदाह अब उसे नमाज़ और इस्लामी तौर-तरीकों की शिक्षा देने लगा था।
वह एक और शख्स के संपर्क में थी, जो खुद को यूसुफ अजहर (मसूद अजहर का साला) बताता था। हालांकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार असली यूसुफ पिछले साल 7 मई को पहलगाम में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हवाई हमले में मारा जा चुका था। यानी बबीता के साथ कोई दूसरा आतंकी उसकी पहचान का इस्तेमाल कर धोखा दे रहा था।
अल्ट्रा-रेडिकलाइज्ड और बड़ा खतरा
जांचकर्ताओं ने बबीता को अल्ट्रा-रेडिकलाइज्ड (अत्यधिक कट्टरपंथी) और भारत के लिए एक बड़ा संभावित खतरा बताया है।
उसके माता-पिता को इस बात की भनक तक नहीं थी कि उनकी बेटी देर रात तक फोन पर किन लोगों से वीडियो कॉल और चैटिंग करती है।
एटीएस (ATS) के मुताबिक सोशल मीडिया पर बबीता की संदिग्ध गतिविधियों ने सबसे पहले पुलिस का ध्यान खींचा। जब गहराई से जांच की गई तो पता चला कि वह ऑनलाइन देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त थी।
जांच में सामने आया कि बबीता जिन फोन नंबरों के संपर्क में थी, वे साल 2016 में जम्मू-कश्मीर में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से जुड़े हुए थे। बबीता ने कुछ सिम कार्ड्स भी खरीदे थे, जिनका इस्तेमाल दूसरे लोग व्हाट्सएप चलाने के लिए कर रहे थे।
अवैध यात्रा की साजिश और गिरफ्तारी
पाकिस्तानी हैंडलर्स बबीता के जरिए भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचाना और यहां आतंकवाद फैलाना चाहते थे।
वे बबीता के जरिए देश की खुफिया जानकारियां जुटाने की फिराक में थे। वे बबीता को पाकिस्तान बुलाना चाहते थे, ताकि वह उनके साथ मिलकर काम कर सके।
बबीता के पास न तो कोई पासपोर्ट था और न ही वीज़ा। इसलिए उसे नेपाल और सऊदी अरब के रास्ते अवैध रूप से पाकिस्तान ले जाने की योजना बनाई गई।
हैंडलर्स ने बबीता से वादा किया था कि वे इस अवैध यात्रा के खर्च के लिए उसे क्रिप्टोकरेंसी के जरिए पैसे भेजेंगे। हालांकि, पुलिस और एटीएस मुस्तैद थी।
इससे पहले कि बबीता तक कोई पैसा पहुंच पाता, 22 जून को राजस्थान ATS (एंटी-टेररिज्म स्क्वाड) ने उसे धर दबोचा।
प्राथमिक चरण में ही विफल हुआ मिशन
राहत की बात यह रही कि बबीता को आतंकियों की तरफ से अभी तक कोई बड़ा टास्क नहीं सौंपा गया था। न ही वह कोई गोपनीय या संवेदनशील जानकारी उनके साथ साझा कर पाई थी।
वह इस पूरी आतंकी साजिश के बिल्कुल शुरुआती दौर में ही पकड़ी गई। यानी वह स्लीपर सैल के रूप में जुड़ रही थी।
गिरफ्तारी के बाद बबीता पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया। उस पर यूएपीए की धारा 38 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता), धारा 39 (आतंकवादी संगठन को दिए गए समर्थन) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 238 (सबूतों को गायब करने का प्रयास) लगाई गई हैं।
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