झंडा विवाद पर विश्वेंद्र सिंह का बड़ा ऐलान, 13 फरवरी को मोती महल पर फहराएंगे रियासतकालीन ध्वज, परिवार की कलह फिर सड़कों पर

Ashish Bhardwaj | Jan 30, 2026, 11:44 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में भरतपुर के मोती महल का झंडा विवाद फिर सामने आया है। इससे भरतपुर के पूर्व राजपरिवार का कलह फिर सड़कों पर आता दिख रहा है। विश्वेंद्र सिंह ने 13 फरवरी को झंडा लगाने का किया ऐलान

News In Short

  • भरतपुर में मोती महल पर झंडा फहराने का विवाद फिर गहराया
  • अब विश्वेंद्र सिंह ने 13 फरवरी को झंडा लगाने का किया ऐलान
  • विश्वेंद्र सिंह की घोषणा से पूर्व राजपरिवार की कलह फिर उजागर
  • रियासतकालीन झंडा माना जाता है भरतपुर की अस्मिता का प्रतीक
  • पिछले साल भरतपुर की जनता ने की थी ध्वज लगाने की घोषणा

News In Detail

भरतपुर। राजस्थान की ऐतिहासिक रियासत रही भरतपुर में पूर्व राजपरिवार का झंडा विवाद फिर सुर्खियों में है। इस बार खुद पूर्व राजपरिवार के सदस्य और पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने मोती महल पर झंडा फहराने का ऐलान किया है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए यह घोषणा कर प्रशासन सहित अपने विरोधियों के बीच हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने कहा है कि वे 13 फरवरी को महाराजा सूरजमल के जन्मदिन पर खुद मोती महल जाकर रियासतकालीन झंडा फहराएंगे।



विश्वेंद्र सिंह रहते हैं किराए के मकान में

दरअसल, भरतपुर का मोती महल खुद विश्वेंद्र सिंह का है। लेकिन, अपनी पत्नी दिव्या सिंह और बेटे अनिरुद्ध सिंह से अनबन के बाद वे मोती महल से बाहर किराए के मकान में रहते हैं। अनिरुद्ध ने मोती महल से रियासतकालीन झंडा उतार कर उसकी जगह दुसरा ध्यज फहराया दिया है। पिछले बार भारत के जाट समुदाय ने


मोती महल पर झंडा लगाने की घोषणा की थी। लेकिन, मोती महल पर रियासतकालीन झंडा नहीं लग पाया। इस बार खुद विश्वेंद्र ने मोती महल पर ध्वज लगाने का ऐलान कर सामाजिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी हैं।




विश्वेंद्र बोले: किसी में हिम्मत है तो रोक ले

​विश्वेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट में न केवल झंडा फहराने की घोषणा की, बल्कि कड़े शब्दों में अप्रत्यक्ष रूप से अपनी पत्नी और बेटे को चुनौती भी दी है। उन्होंने लिखा कि झंडा फहराने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रस्सी और तार काट दिए गए हैं, लेकिन यह बाधा उन्हें रोक नहीं पाएगी। उन्होंने कहा, यदि किसी में हिम्मत है, तो मुझे रोक कर दिखाए। उनका कहना है कि यदि उनसे पहले मोती महल में उनकी पत्नी और बेटा झंडा नहीं लगाते हैं, तो वे स्वयं यह कदम उठाएंगे।



​क्या है 'मोती महल' झंडा विवाद

मोती महल का रियासतकालीन झंडा भरतपुर की अस्मिता और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। भरतपुर रियासत के संस्थापक महाराजा सूरजमल के समय से ही यहां एक विशेष 'रियासतकालीन झंडा' फहराया जाता रहा है। विवाद तब शुरू हुआ, जब कुछ समय पहले मोती महल पर लगे इस झंडे को हटाकर वहां 'युद्ध भूमि का झंडा' लगा दिया गया। इस बदलाव का 'सर्व समाज' और स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया।



झंडा विवाद का ​प्रमुख घटनाक्रम

सितंबर 2025 का निर्णय: पिछले साल सितंबर में भरतपुर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में महापंचायतें हुईं। इन पंचायतों में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया था कि 21 सितंबर 2025 तक युद्ध भूमि का झंडा हटाकर रियासतकालीन झंडा लगाया जाए।



​पारिवारिक कलह का साया: यह विवाद तब और जटिल हो गया, जब भरतपुर पूर्व राजपरिवार के बीच संपत्ति और अधिकारों को लेकर पांच साल से चल रहा आंतरिक विवाद इसमें शामिल हो गया। एक तरफ विश्वेंद्र सिंह परंपराओं की दुहाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ मोती महल पर काबिज उनकी पत्नी दिव्या और बेटा अनिरुद्ध इसे अलग दृष्टिकोण से देख रहे हैं।



​महाराजा सूरजमल के जन्मदिन का महत्व

​13 फरवरी का दिन भरतपुर के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। अजेय दुर्ग माने जाने वाले लोहागढ़ किले के निर्माता महाराजा सूरजमल का जन्मदिन पूरे ब्रज क्षेत्र में गर्व के साथ मनाया जाता है। विश्वेंद्र सिंह ने इसी दिन को चुना है, जिससे वे अपनी पैतृक विरासत और जनभावनाओं को एक सूत्र में पिरो सकें। ​उनका तर्क है कि महाराजा सूरजमल की विरासत का सम्मान तभी होगा जब उनके महल पर वही ध्वज लहराएगा जिसके नीचे उन्होंने भरतपुर की नींव रखी थी।



​आगे क्या

​विश्वेंद्र सिंह के इस खुले ऐलान के बाद भरतपुर जिला प्रशासन और पुलिस अलर्ट मोड पर आ गई है। मोती महल पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति होने के साथ ही भारतपुर की गहरी जन-संवेदनाओं से जुड़ा स्थान है। पूर्व में भी यहाँ झंडे को लेकर तनाव की स्थिति बन चुकी है। 13 फरवरी को होने वाले इस संभावित शक्ति प्रदर्शन को देखते हुए कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी।



​निष्कर्ष

​भरतपुर का मोती महल केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि जाट शौर्य और राजसी गौरव का प्रतीक है। झंडा विवाद ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जहां पारिवारिक प्रतिष्ठा, सामाजिक भावनाएं और ऐतिहासिक विरासत आपस में टकरा रही हैं। 13 फरवरी को विश्वेंद्र सिंह का यह कदम भरतपुर की राजनीति की अगली दिशा तय करेगा।



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