15 करोड़ खर्च कर भी कैद है दुनिया की सबसे बड़ी घंटी, 4 साल से अटका है काम
समझें क्या है पूरा मामला
- चंबल रिवर फ्रंट की दुनिया की सबसे बड़ी घंटी 4 साल से सांचे में कैद।
- 15 करोड़ खर्च के बाद भी घंटी को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिला।
- 79 हजार किलो वजनी घंटी के सांचे के 24 ब्लॉक अभी बंद हैं।
- डिजाइनर देवेंद्र आर्य की मौत के बाद काम अधूरा रह गया।
- अब विशेषज्ञों की मदद से घंटी निकालने की कोशिश होगी।
कोटा के चंबल रिवर फ्रंट पर ढाली गई दुनिया की सबसे बड़ी घंटी तमाम प्रयासों के बावजूद अब भी सांचे से बाहर नहीं आ सकी है। बीते 4 सालों से यह सांचे में ही कैद है। इसे खोलने का फॉर्मूला किसी को नहीं मिल पाया है। इस पूरी परियोजना पर अब तक 15 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।
कैसे शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट
चंबल रिवर फ्रंट का काम 17 जून 2020 को शुरू हुआ था। घंटी की ढलाई का काम 3 जुलाई 2022 से शुरू किया गया। यह पूरा काम स्टील मेन के नाम से मशहूर धातु विशेषज्ञ देवेन्द्र आर्य की अगुवाई में हुआ। यह काम 17 अगस्त 2023 को पूरा हुआ।
दुनिया की सबसे बड़ी घंटी बनाने के लिए आर्य ने कई धातुओं को मिलाकर एक खास ज्वॉइंटलेस चैन अलॉय तैयार की। उन्होंने 22 भट्टियों में इसी खास अलॉय से घंटी की ढलाई की। इस दौरान वहां तापमान करीब 3000 डिग्री तक पहुंच गया था। विशेष हीट रेजिस्टेंस सूट पहनकर उन्होंने यह ढलाई पूरी कर वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाया।
हादसे में गई थी डिजाइनर की जान
घंटी बनाने के लिए करीब 79 हजार किलो अलॉय का इस्तेमाल हुआ। इसके लिए धरती में कई मीटर गहरा गड्ढा खुदवाया गया था। सिलिका रेत और खास केमिकल मिलाकर एक मजबूत सांचा तैयार किया गया, जिसमें घंटी की ढलाई की गई।
ढलाई के बाद सांचा खोलने का काम शुरू हुआ। इसी दौरान क्रेन से जुड़े हादसे में 19 नवंबर 2023 को प्रोजेक्ट डिजाइनर देवेन्द्र आर्य और उनके सहायक की मौत हो गई। इस हादसे के साथ ही सांचा खोलने का काम भी पूरी तरह ठप हो गया।
15 करोड़ खर्च फिर भी अधूरा काम
कोटा विकास प्राधिकरण (KDA – Kota Development Authority) ने अलग-अलग विशेषज्ञों और देवेन्द्र आर्य के सहायक के जरिए भी घंटी को खोलने की कोशिश की। लेकिन सभी प्रयास विफल रहे।
दरअसल घंटी के सांचे को डिकेमिकलाइज करके खोला जाना था। इसका पूरा राज सिर्फ देवेन्द्र आर्य के पास ही था। सांचे के कुल 29 ब्लॉक में से अब तक सिर्फ 5 ही खोले जा सके हैं। बाकी 24 ब्लॉक अब भी बंद पड़े हैं। इस पूरी परियोजना पर 15 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद घंटी सांचे में ही फंसी है। इसे टांगने के लिए बनाया गया हैंगर भी अब तक खाली पड़ा है।
कितनी बड़ी है यह घंटी
79 हजार किलो वजनी इस घंटी की ऊंचाई 30 फीट और चौड़ाई 28 फीट है। इसकी गूंज करीब 8 किलोमीटर तक सुनाई देनी थी।
इसे देवेन्द्र आर्य की अगुवाई में 200 से ज्यादा विशेषज्ञों ने पांच दिन की मेहनत के बाद सांचे में ढाला था। इससे पहले तैयारी के दौर में करीब एक साल तक 1000 कर्मचारियों ने 10 अलग-अलग प्रोजेक्ट पर काम किया था।
घंटी की ढलाई का लाइव टेलीकास्ट अमरीका के इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी किया गया था। कास्टिंग में 65 हजार लीटर से ज्यादा डीजल और 600 एलपीजी (LPG – Liquefied Petroleum Gas) सिलेंडर इस्तेमाल हुए। हीट का असर कम करने के लिए कर्मचारियों को ग्लूकोज और गुड़ का पानी दिया गया था।
अब आगे क्या
अधिकारियों के अनुसार घंटी को सांचे से बाहर निकालने के लिए अब विशेषज्ञों से सलाह ली जाएगी। इसके लिए क्या बेहतर तरीका अपनाया जा सकता है, इस दिशा में आगे काम किया जाएगा।
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