मध्यप्रदेश से राजस्थान तक चीते की लंबी दौड़, भरतपुर के जंगल में बनाया ठिकाना

Jageshwar prasad | Jun 03, 2026, 11:46 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकला चीता KP-3 लगभग 194 किलोमीटर की दूरी तय कर भरतपुर के बंध बारैठा वन्यजीव अभयारण्य पहुंच गया है। चीते ने यहां एक बछड़े का शिकार किया। वन विभाग उसकी GPS कॉलर के जरिए निगरानी कर रहा है।

News In Short

  • कूनो नेशनल पार्क से निकला चीता KP-3 194 किमी दूर भरतपुर के बंध बारैठा अभयारण्य पहुंचा।
  • यह चीता अफ्रीका से लाए गए आशा और ओबान की संतान है, जिसका जन्म कूनो में हुआ था।
  • चीते ने बंध बारैठा अभयारण्य में एक बछड़े का शिकार किया, वह वातावरण में पूरी तरह सहज है।
  • चीते के गले में लगी GPS कॉलर से वन विभाग उसकी हर गतिविधि पर नजर रख रहा है।
  • भरतपुर के जंगल में प्रचुर मात्रा में शिकार और पानी होने के कारण चीता यहां ठहरा हुआ है।

News In Detail

वन्यजीव संरक्षण और कूनो चीता प्रोजेक्ट के लिहाज से एक अच्छा घटनाक्रम सामने आया है। मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकला एक युवा चीता KP-3 लगभग 194 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर राजस्थान में भरतपुर के बंध बारैठा वन्यजीव अभयारण्य में अपना नया ठिकाना बना चुका है।



वन विभाग के अनुसार, यह चीता कूनो में जन्मा है और इसके माता-पिता वर्ष 2022 में अफ्रीका से भारत लाए गए प्रसिद्ध चीते आशा और ओबान हैं। वर्तमान में यह चीता भरतपुर के जंगलों में पूरी तरह सहज है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में खुद को ढाल चुका है।



चीते ने बछड़े का किया शिकार

भरतपुर के डीएफओ चेतन कुमार ने बताया कि चीता KP-3 लगभग एक सप्ताह से बंध बारैठा क्षेत्र में मौजूद है। वह यहां के वातावरण में पूरी तरह सहज दिखाई दे रहा है। चीते ने एक बछड़े का भी शिकार किया था। यह उसके स्वस्थ होने और सक्रिय शिकार क्षमता का संकेत है।



डीएफओ ने बताया कि चीते के गले में कॉलर आईडी है, जिसमें जीपीएस लगा है। उसके जरिए कूनो प्रशासन ने हमें बताया कि चीता बंध बारैठा में आया हुआ है। हमारी टीमें चीते की हर गतिविधि पर नजर रख रही है।



बंध बरैठा का वातावरण चीते के लिए अनुकूल

डीएफओ चेतन कुमार के अनुसार बंध बारैठा वन्यजीव अभयारण्य का प्राकृतिक वातावरण किसी भी मांसाहारी वन्यजीव के लिए अनुकूल माना जाता है। लगभग 36 हजार हेक्टेयर में फैले इस संरक्षित क्षेत्र में घने जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियां, प्राकृतिक तालाब और बांध मौजूद हैं।



यहां स्थित बंध बारैठा बांध और दर बराहना झरना पूरे क्षेत्र को सालभर पानी उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा जंगल में जंगली सूअर, नीलगाय, हिरण और अन्य वन्यजीव पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं, जो चीते के लिए अच्छा शिकार है। भोजन, पानी और सुरक्षित आवास के कारण ही KP-3 फिलहाल यहां ठहरा हुआ है।



टमकौली क्षेत्र में पानी पीते हुए दिखाई दिया

डीएफओ चेतन कुमार का कहना है कि कूनो से निकलकर राजस्थान की सीमा में प्रवेश करने वाला यह चीता अब वन विभाग की निगरानी में है। हाल ही में KP-3 को अभयारण्य के टमकौली क्षेत्र में पानी पीते हुए देखा गया, जिसके बाद उसकी मौजूदगी की पुष्टि हुई।



फॉरेस्ट गार्ड भरत सिंह ने बताया कि 26 मई को पहली बार बंध बारैठा वन्यजीव अभयारण्य में KP-3 की लोकेशन ट्रेस हुई थी। इसके बाद से लगातार उसकी निगरानी की जा रही है।



करौली के जंगलों में भी विचरण

हालांकि चीता कभी-कभी करौली वन क्षेत्र की दिशा में भी बढ़ जाता है, लेकिन अब तक उसका मुख्य ठिकाना बंध बारैठा ही बना हुआ है। करौली और बंध बारैठा के जंगल आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए उसका दोनों क्षेत्रों में आना-जाना स्वाभाविक माना जा रहा है।



वन विभाग के अनुसार चीते को फिलहाल ऐसा कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं मिला है जो उसके लिए गंभीर खतरा बन सके। हालांकि अभयारण्य में करीब 10 से 12 तेंदुए मौजूद हैं। तेंदुआ चीते की तुलना में ज्यादा ताकतवर और आक्रामक होता है, ऐसे में अगर दोनों का आमना-सामना होता है तो चीते को खतरा पैदा हो सकता है।



चीतों की वर्तमान स्थिति

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चीता सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय जीव

वन विभाग के अफसरों का कहना है कि चीता सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय जीव माना जाता है। यह सामान्य रूप से 80 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ सकता है, जबकि इसकी अधिकतम गति 110 से 120 किलोमीटर प्रति घंटा तक दर्ज की गई है, हालांकि कई बार यह रफ्तार 150 किलोमीटर तक भी पहुंच सकती है।



ऐसे में कूनो से बंध बारैठा तक लगभग 194 किलोमीटर की दूरी तय करने में चीते को बहुत अधिक समय नहीं लगा होगा। वन विभाग की टीमें लगातार चीते पर नजर रखे हुए हैं ताकि उसकी और आसपास के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।



FAQ

  1. भारत का प्रोजेक्ट चीता क्या है?
    प्रोजेक्ट चीता भारत सरकार का एक महत्वाकांक्षी वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम है, जिसका मुख्य उद्देश्य 70 से अधिक वर्षों पहले देश से विलुप्त हो चुके चीतों को भारतीय जंगलों में फिर से बसाना है। यह दुनिया का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है जिसमें किसी बड़े मांसाहारी जीव को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप लाकर जंगलों में छोड़ा गया है।

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