पद्मजा कुमारी की याचिका खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट बोला-जब तक लक्ष्यराज का वसीयत केस लंबित, फैसला नहीं

Ashish Bhardwaj | Mar 17, 2026, 19:04 IST
Photograph: (the sootr)
दिल्ली हाई कोर्ट ने राजस्थान में मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार में संपत्ति विवाद को लेकर पद्मजा कुमारी की याचिका खारिज कर दी है। पद्मजा ने संपत्ति प्रबंधन के लिए 'प्रशासन पत्र' की गुहार की थी।

News In Short

  • मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के संपत्ति विवाद में पद्मजा की याचिका खारिज।
  • दिल्ली हाई कोर्ट ने पद्मजा कुमारी की 'प्रशासन पत्र' की मांग को ठुकराया।
  • कोर्ट में भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ का प्रस्तुत वसीयतनामा बना ढाल।
  • दशकों पुराना है राजस्थान में मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार का प्रॉपर्टी विवाद।
  • अब दिल्ली हाई कोर्ट में 4 मई को होगी अगली सुनवाई।

News In Detail

राजस्थान में उदयपुर के पूर्व राजपरिवार में चल रही करोड़ों की संपत्ति की लड़ाई में अब दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। मेवाड़ के पूर्व महाराज दिवंगत अरविंद सिंह मेवाड़ की पुत्री पद्मजा कुमारी को कोर्ट से राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने उनके भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के पक्ष को ध्यान में रखते हुए फिलहाल पद्मजा की 'प्रशासन पत्र' की मांग को ठुकरा दिया है।



क्या था पद्मजा कुमारी का दावा?

पद्मजा कुमारी ने कोर्ट में दलील दी थी कि उनके पिता अरविंद सिंह मेवाड़ ( निधन 16 मार्च 2025 को हुआ था) ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी। इसी आधार पर उन्होंने पिता की संपत्ति के प्रबंधन के लिए लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की मांग की थी, ताकि संपत्ति का बंटवारा बिना वसीयत वाले नियमों के तहत हो सके।



लक्ष्यराज का वसीयतनामा बना ढाल

भाई लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने कोर्ट के सामने अपने पिता द्वारा पेश किए वसीयतनाम का दावा पेश किया है। जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने स्पष्ट किया कि जब तक कोर्ट में भाई द्वारा पेश की गई वसीयत की वैधता का मामला लंबित है, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि पिता ने वसीयत नहीं बनाई थी। इसलिए, बिना वसीयत वाले दावे के आधार पर कोई भी कानूनी आदेश फिलहाल जारी नहीं किया जा सकता।



सिटी पैलेस और होटल्स पर टिकी नजरें

विवाद की जड़ में उदयपुर का ऐतिहासिक सिटी पैलेस और मशहूर एचआरएच (HRH) होटल्स ग्रुप समेत कई बेशकीमती संपत्तियां हैं। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ फिलहाल परिवार के उत्तराधिकारी और होटल ग्रुप के मालिक के तौर पर कामकाज संभाल रहे हैं।



कैसे आया दिल्ली हाईकोर्ट में मामला?

जब मेवाड़ राजपरिवार का विवाद बढ़ा तो दोनों पक्षों ने अलग-अलग राज्यों की अदालतों में केस फाइल कर रखे थे। इसे लेकर क्षेत्राधिकार की खींचतान चल रही थी।



लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने मांग की थी कि जो मामले मुंबई हाईकोर्ट में चल रहे हैं, उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट भेज दिया जाए, क्योंकि विवाद राजस्थान की संपत्तियों से जुड़ा है।



पद्मजा कुमारी ने इसके विपरीत मांग की। उन्होंने चाहा कि राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ में चल रहे मामलों को बॉम्बे हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया जाए।



जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां इसका एक व्यावहारिक समाधान निकाला गया। निष्पक्षता और सुविधा के लिए सभी मामलों को न तो मुंबई और न ही राजस्थान, बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।



दशकों पुराना है मेवाड़ का प्रॉपर्टी विवाद

मेवाड़ के पूर्व राज परिवार में लंबे समय से संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। यह विवाद भगवत सिंह मेवाड़ के फैसले के बाद और बढ़ा, जिन्होंने 1983 में पारिवारिक संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का निर्णय लिया था। उनका यह फैसला उनके बड़े बेटे महेंद्र सिंह को पसंद नहीं आया, और उन्होंने अपने पिता के खिलाफ कोर्ट में मामला दायर किया।



इसके बाद, भगवत सिंह ने अपनी वसीयत और संपत्ति से जुड़े फैसलों की जिम्मेदारी छोटे बेटे अरविंद सिंह को सौंप दी। इससे महेंद्र सिंह मेवाड़ को ट्रस्ट और संपत्ति से लगभग बाहर कर दिया गया।



भगवत सिंह के निधन के बाद गहराया विवाद

3 नवंबर 1984 को भगवत सिंह का निधन हो गया। इसके बाद संपत्ति विवाद और गहरा गया। यह विवाद 37 साल तक कोर्ट में चलता रहा। वर्ष 2020 में इस पर उदयपुर की जिला अदालत ने फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि विवादित संपत्ति को चार हिस्सों में बांटा जाए। एक हिस्सा भगवत सिंह के नाम पर रहे और बाकी तीन हिस्से उनके तीन बच्चों महेंद्र सिंह, अरविंद सिंह, और योगेश्वरी कुमारी के बीच बांटे जाएं।



अदालत के फैसले तक अधिकांश संपत्ति अरविंद सिंह मेवाड़ के कब्जे में रही, जबकि महेंद्र सिंह और उनकी बहन योगेश्वरी को सीमित हिस्सा मिला। इसके अलावा अदालत ने शंभू निवास पैलेस, बड़ी पाल और घासघर जैसी संपत्तियों से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर तत्काल रोक लगा दी थी।



4 मई को होगी अगली 'सुनवाई'

कोर्ट ने पद्मजा कुमारी को अपने भाई के दावों के खिलाफ अपनी दलीलें और संदेह पेश करने की अनुमति दी है। अब सभी की नजरें 4 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि मेवाड़ की इस विशाल विरासत की बागडोर किसके हाथ में रहेगी।



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