Dolphin Census: चंबल नदी में विलुप्तप्राय रिवर डॉल्फिन की गणना शुरू, आधुनिक तकनीक से होगा सर्वेक्षण
धौलपुर (Dholpur) के राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में रिवर डॉल्फिन (River Dolphin) की गणना शुरू हो गई है। यह गणना आधुनिक तकनीक से की जा रही है। इसमें राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के वनकर्मी शामिल हैं। देहरादून के वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ भी साथ हैं। फरवरी 2026 की गणना में यहां 155 डॉल्फिन मिली थीं।
तीन राज्यों की संयुक्त पहल
इस अभियान का मकसद डॉल्फिन की असली संख्या का पता लगाना है। साथ ही उनके प्राकृतिक आवास को बेहतर समझना भी इसका उद्देश्य है। विलुप्तप्राय जलीय जीवों के संरक्षण की दिशा में इसे अहम माना जा रहा है।
गणना दल में वन विभाग के कर्मचारी और वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल हैं। प्रशिक्षित सदस्य भी टीम का हिस्सा हैं। स्थानीय वनकर्मी अपने क्षेत्र में दल के साथ रहकर सहयोग करेंगे।
अभियान से पहले मिला प्रशिक्षण
अभियान शुरू होने से पहले वनकर्मियों को एक दिन का प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण देवरी घड़ियाल केंद्र पर हुआ। इसे भारतीय वन्यजीव संस्थान, यानी WII (Wildlife Institute of India), देहरादून के प्रशिक्षकों ने दिया।
प्रशिक्षण में गणना की आधुनिक तकनीकें सिखाई गईं। जलीय जीवों की पहचान की जानकारी भी दी गई। सर्वेक्षण के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं भी समझाई गईं।
चंबल अभयारण्य क्षेत्र के 50 से ज्यादा वनकर्मियों को यह प्रशिक्षण मिल चुका है। यह कर्मचारी अपने तय इलाकों में सर्वे दल के साथ रहेंगे। इससे आंकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ने की उम्मीद है।
फरवरी में मिली थीं 155 डॉल्फिन
फरवरी 2026 में जलीय जीवों की गणना हुई थी। तब चंबल के 435 किलोमीटर लंबे प्रतिबंधित क्षेत्र में 155 रिवर डॉल्फिन दर्ज हुई थीं। अब आधुनिक तकनीक से दोबारा गिनती हो रही है।
इससे डॉल्फिन की संख्या और वितरण की बेहतर जानकारी मिलेगी। उनके प्राकृतिक आवास को लेकर भी अहम आंकड़े मिलने की उम्मीद है। गणना दल नदी में सर्वे करते हुए आगे बढ़ेगा। वह अभयारण्य के अंतिम छोर तक पहुंचेगा। यह छोर उत्तरप्रदेश के इटावा स्थित पचनदा में है।
देश में डॉल्फिन गणना का दूसरा चरण
संस्थान के डॉक्टर विनीत सिंह ने गणना के चरणों की जानकारी दी। देश में रिवर डॉल्फिन गणना का पहला चरण 2021 से 2024 के बीच पूरा हुआ था। उस दौरान कुल 6,227 डॉल्फिन दर्ज हुई थीं।
इनमें 6,224 गंगा डॉल्फिन और तीन सिंधु डॉल्फिन थीं। सिंधु डॉल्फिन पंजाब की ब्यास नदी में मिली थीं।
दूसरे चरण की शुरुआत जनवरी 2026 में हुई। उत्तरप्रदेश के बिजनौर से गंगासागर तक गंगा में सर्वे हो चुका है। यह करीब 2,400 किलोमीटर का क्षेत्र है। अब चंबल और ब्रह्मपुत्र नदी में आधुनिक तकनीक से गिनती चल रही है।
संरक्षण के लिए क्यों जरूरी है सर्वे?
गंगा डॉल्फिन को स्थानीय भाषा में सूंस भी कहा जाता है। नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी अहम भूमिका है। प्रदूषण और आवास में बदलाव जैसी चुनौतियां इन जीवों को प्रभावित कर सकती हैं। मानवीय गतिविधियां भी इसमें असर डालती हैं।
इसलिए नियमित और वैज्ञानिक गणना जरूरी मानी जा रही है। इससे जीवों की स्थिति का सही आकलन हो सकेगा। भविष्य के लिए संरक्षण योजनाएं बनाने में भी मदद मिलेगी। अभियान में शामिल वनकर्मी भी इसे लेकर उत्साहित हैं।
चंबल में बढ़ रहा जलीय जीवों का कुनबा
चंबल नदी को देश की सबसे साफ नदियों में गिना जाता है। जलीय जीवों के लिए यहां का माहौल अनुकूल माना जाता है। यहां घड़ियाल, मगरमच्छ, डॉल्फिन और कछुओं की कई प्रजातियां मिलती हैं।
देवरी घड़ियाल केंद्र के अनुसार चंबल में अभी करीब 3,000 घड़ियाल हैं। करीब डेढ़ हजार मगरमच्छ भी यहां हैं। सैकड़ों कछुए भी पाए जाते हैं। कई प्रजातियों के पक्षी भी प्रजनन के लिए यहां पहुंचते हैं।