चश्मदीद गवाह साबित नहीं हुए माता-पिता, दोहरे हत्याकांड में आरोपी बरी
समझें क्या है पूरा मामला
- हाई कोर्ट ने दोहरे हत्याकांड में माता-पिता को चश्मदीद गवाह नहीं माना, आरोपी दोषमुक्त।
- निचली अदालत ने आरोपी विजय सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, हाई कोर्ट ने सजा रद्द की।
- कोर्ट ने कहा- मृतकों की मां घर पहुंची तो घटना हो चुकी थी, वह चश्मदीद नहीं है।
- अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में विरोधाभास पाए गए और सभी कड़ियां आपस में मेल नहीं खातीं।
- यह मामला 14 अगस्त 2012 का है, जब एक ही परिवार के बेटे और बेटी की हुई थी हत्या।
राजस्थान हाई कोर्ट ने राजधानी जयपुर के नाहरगढ़ थाना इलाके में वर्ष 2012 में हुए एक सनसनीखेज दोहरे हत्याकांड के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने वारदात के शिकार हुए बच्चों के माता-पिता को चश्मदीद गवाह स्वीकार नहीं किया और अपराध पूरी तरह प्रमाणित न होने के अभाव में मुख्य आरोपी विजय सिंह को दोषमुक्त कर दिया है।
इसके साथ ही जस्टिस महेन्द्र गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने आरोपी विजय सिंह की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा 15 दिसंबर, 2017 को उसे सुनाई गई उम्रकैद की सजा को खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने क्यों पलटा निचली अदालत का फैसला?
जस्टिस महेन्द्र गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने अभियोजन पक्ष के मुख्य साक्ष्यों और मृतकों के माता-पिता के बयानों का गहन विश्लेषण करने के बाद कई कमियां पाईं।
खंडपीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि मृतकों की मां ने अपने आधिकारिक बयान में कहा था कि जब वह घर पहुंची, तो मकान का दरवाजा खुला हुआ था और अंदर खून बिखरा हुआ था। उस समय वहां अन्य लोग भी मौजूद थे।
अदालत ने कहा कि जब वहां पहले से लोग मौजूद थे और किसी ने भी भागते हुए आदमी को नहीं पकड़ा, तो इससे यह साफ सिद्ध होता है कि मां घटना की चश्मदीद साक्षी नहीं थी, बल्कि वह वारदात हो जाने के बाद मौके पर पहुंची थी।
मृतकों के पिता ने अपनी गवाही में कहा था कि जब वह घर पहुंचे, तो बच्चों को पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाया जा चुका था।
हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष (पुलिस और सरकारी वकील) द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों में न केवल भारी विरोधाभास है, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य की सभी कड़ियां भी आपस में जुड़ी हुई नहीं हैं।
कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, संदेह कितना भी गहरा हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए अभियोजन आरोपी के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
क्या था 14 साल पुराना यह पूरा मामला?
मामले से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश गोस्वामी ने बताया कि यह घटना 14 अगस्त, 2012 की है। घटना के दिन परिवादी मंजीत सिंह ने जयपुर के नाहरगढ़ पुलिस थाने में एक लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दोपहर करीब ढाई बजे मंजीत सिंह अपने घर पर खाना खाने आया था। उसकी पत्नी घर के बाहर एक कोने में बैठी हुई थी। जब वे दोनों मकान के दरवाजे के अंदर दाखिल हुए, तो उन्होंने देखा कि आरोपी विजय सिंह उनके बेटे के सीने पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर रहा था।
भाई को मरता देख जब उसकी बहन (मंजीत की बेटी) उसे बचाने के लिए बीच-बचाव करने आई, तो आरोपी विजय सिंह ने उस पर भी चाकू से जानलेवा हमला कर दिया। रिपोर्ट में कहा गया था कि माता-पिता को देखकर आरोपी मौके से फरार हो गया था।
इस रिपोर्ट के आधार पर नाहरगढ़ थाना पुलिस ने हत्या का मुकदमा दर्ज कर आरोपी विजय सिंह को गिरफ्तार किया था और अदालत में चालान पेश किया था। वर्ष 2017 में निचली अदालत ने इसे चश्मदीद गवाहों का मामला मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब उच्च न्यायालय ने पलट दिया है।
FAQ
- चश्मदीद गवाह और बाद में पहुंचे गवाह में क्या फर्क होता है?
चश्मदीद गवाह वह होता है जिसने घटना अपनी आंखों से होते हुए देखी हो। बाद में पहुंचे गवाह की गवाही कमजोर मानी जाती है क्योंकि वह घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं होती। इस मामले में हाईकोर्ट ने माता-पिता को इसी आधार पर चश्मदीद नहीं माना। - अभियोजन पक्ष की विफलता का क्या मतलब होता है?
अभियोजन पक्ष यानी सरकार की ओर से पैरवी करने वाला वकील अगर अपराध को संदेह से परे साबित नहीं कर पाए तो आरोपी को बरी करना अदालत की कानूनी बाध्यता होती है। यह सिद्धांत "संदेह का लाभ आरोपी को" के नाम से जाना जाता है।
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