गणेश चतुर्थी 2026: जानिए राजस्थान के प्रसिद्ध गणेश मंदिरों की अनोखी कहानियां
ज्योति शर्मा @ जयपुर
आज यानी 14 सितंबर 2026 को देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना जाता है। इस दिन घरों और मंदिरों में बप्पा की स्थापना कर सुख, समृद्धि और सफलता की कामना की जाती है।
जयपुर में गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त करीब 11:08 बजे से दोपहर 1:36 बजे तक बताया गया है। वहीं गणेश विसर्जन के लिए अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026 को होगी। जयपुर में उस दिन सुबह 6:16 से 10:48 बजे, दोपहर 12:18 से 1:49 बजे और शाम 4:50 से 6:20 बजे तक शुभ चौघड़िया बताए गए हैं। अलग-अलग पंचांगों में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
लेकिन राजस्थान में गणेश चतुर्थी सिर्फ घरों में बप्पा की स्थापना तक सीमित नहीं है। यहां भगवान गणेश से जुड़े कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी कहानियां और मान्यताएं भक्तों को अपनी ओर खींचती हैं।
मोती डूंगरी गणेश मंदिर - जहां रुक गया था राजा का रथ
जयपुर का मोती डूंगरी गणेश मंदिर राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध गणेश मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि मेवाड़ के एक राजा भगवान गणेश की विशाल प्रतिमा को बैलगाड़ी से लेकर जा रहे थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि जहां बैलगाड़ी रुक जाएगी, वहीं भगवान गणेश का मंदिर बनाया जाएगा।
रास्ते में बैलगाड़ी मोती डूंगरी की पहाड़ी के नीचे आकर रुक गई। इसके बाद यहीं भगवान गणेश की स्थापना की गई।आज यही स्थान जयपुर की आस्था का बड़ा केंद्र है। राजस्थान पर्यटन के अनुसार मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में सेठ जय राम पालीवाल ने कराया था।
गणेश चतुर्थी पर यहां भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ती है और मंदिर में भगवान गणेश के जन्मोत्सव का आयोजन भी किया जाता है। मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 14 सितंबर 2026 को गणेश जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।
गढ़ गणेश मंदिर - पहाड़ी पर विराजे गणपति
जयपुर के अरावली क्षेत्र में स्थित गढ़ गणेश मंदिर भी भगवान गणेश की भक्ति का प्रसिद्ध केंद्र है। यह मंदिर अपनी ऊंचाई और प्राचीन धार्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यहां भगवान गणेश की आराधना का अनुभव बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग नजर आता है।
मान्यता है कि गढ़ गणेश मंदिर जयपुर के पुराने धार्मिक स्थलों में शामिल है और जयपुर के इतिहास तथा राजपरिवार की परंपराओं से इसका गहरा संबंध रहा है।
गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए पहाड़ी तक पहुंचना भी भक्ति और आस्था का एक हिस्सा बन जाता है नाहर के गणेश जी- जयपुर की पुरानी आस्था जयपुर का नाहर के गणेश जी मंदिर भी भगवान गणेश के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है। पुराने जयपुर शहर और ब्रह्मपुरी क्षेत्र से जुड़ा यह मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच विशेष
आस्था रखता है। यहां भक्त भगवान गणेश के दर्शन कर अपने नए कार्यों की शुरुआत और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। गणेश चतुर्थी पर ऐसे मंदिरों में सिर्फ पूजा नहीं होती, बल्कि पूरा माहौल 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारों से भक्तिमय हो जाता है।
रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश - जहां चिट्ठियों से पहुंचती हैं मनोकामनाएं
और अब बात राजस्थान के उस गणेश मंदिर की, जिसकी कहानी देशभर में अलग पहचान रखती है-रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश जी। रणथंभौर के किले में विराजमान त्रिनेत्र गणेश जी को लेकर भक्तों में गहरी आस्था है। यहां भगवान गणेश को तीन नेत्रों वाले स्वरूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भक्त अपनी मनोकामनाएं और विवाह के निमंत्रण तक भगवान गणेश को भेजते हैं। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से भक्तों की चिट्ठियां और निमंत्रण यहां पहुंचते हैं।
कहते हैं कि जब जीवन में कोई बड़ा शुभ काम शुरू करना हो, तो सबसे पहले गणपति को याद किया जाता है। और रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर में यही परंपरा सदियों से आस्था के साथ जुड़ी हुई है। गणेश चतुर्थी का संदेशमोती डूंगरी से लेकर गढ़ गणेश और रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश तक- राजस्थान में भगवान गणेश के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थान नहीं हैं।
ये मंदिर आस्था, इतिहास, परंपरा और लोकविश्वास की ऐसी कहानियां हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं।
भरतपुर के लोहागढ़ किले का चौबुर्जा गणेश मंदिर
भरतपुर के लोहागढ़ किले के गेट के सामने शहर के चौबुर्जा क्षेत्र में करीब 300 साल पुराना गणेश मंदिर है। इस मंदिर में एक साथ दो गणेश प्रतिमाएं विराजमान हैं। स्थानीय मान्यता में इन्हीं 'जुड़वा गणेश जी' को लोहागढ़ का 'अभय कवच' माना जाता है।
कहा जाता है कि युद्ध पर निकलने से पहले महाराजा और सेना यहां आशीर्वाद लेती थी।मान्यता थी कि गणेशजी का आशीर्वाद लेकर युद्ध के मैदान में जाने वाली सेना विजय प्राप्त करके लौटेगी। यही वजह है कि स्थानीय आस्था में इन गणेशजी को लोहागढ़ का 'अभय कवच' भी माना जाता है।
पुजारी संतोष ने बताया कि उस दौर में किले से बाहर निकलते ही घना जंगल हुआ करता था। तत्कालीन महाराजा सूरजमल जब किले के द्वार से बाहर निकलते थे तो आसपास जंगल और जंगली जानवर दिखाई देते थे। इसी वजह से किले से निकलते ही भगवान के दर्शन हों, इस उद्देश्य से यहां देवालय स्थापित कराने का विचार किया गया। इसके बाद चौबुर्जा क्षेत्र में गणेश मंदिर की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा कराई गई।
मंदिर में विराजमान दो गणेश प्रतिमाओं के बारे में भी एक रोचक घटना है। उस समय दो प्रतिमाएं लाई गई थीं। योजना यह थी कि एक प्रतिमा चौबुर्जा में स्थापित की जाएगी, जबकि दूसरी प्रतिमा को किसी दूसरे स्थान पर ले जाकर स्थापित किया जाना था, लेकिन इसी दौरान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध की परिस्थितियों के कारण दूसरी प्रतिमा को निर्धारित स्थान तक ले जाना संभव नहीं हो सका। ऐसे में दोनों प्रतिमाओं की स्थापना यहीं कर दी गई। इसी वजह से यहां एक ही मंदिर में दो गणेश प्रतिमाएं हैं।
चौबुर्जा मंदिर से जुड़ी सबसे दिलचस्प कहानियों में शाही हाथी की परंपरा भी शामिल है। उस समय आरती के लिए किले के महल से गंगाजल लाया जाता था। कहा जाता है कि शाही हाथी अपनी सूंड में गंगाजल से भरी बाल्टी उठाकर किले से मंदिर तक आता था। मंदिर के बाहर पहुंचकर वह बाल्टी रख देता था। आरती पूरी होने के बाद पुजारी उस गंगाजल से भगवान गणेश का पूजन और अभिषेक करते थे। इसके बाद वही हाथी अपनी सूंड से उस बाल्टी को उठाकर वापस किले की ओर ले जाता था।
आज गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर आइए, बप्पा से यही प्रार्थना करें
हे गणपति बप्पा, हमारे जीवन के सभी विघ्न दूर करें,
घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाएं।
गणपति बप्पा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!
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