थार में फिर उड़ेंगे गोडावण, कैप्टिव ब्रीडिंग से तैयार पक्षियों को जंगल में छोड़ने की तैयारी
समझें क्या है पूरा मामला
- थार में फिर उड़ेंगे गोडावण, बड़ी तैयारी शुरू
- 10 गोडावण तैयार, अक्टूबर में जंगल में छोड़ने की योजना
- रामदेवरा या सुदाश्री, जल्द तय होगी रिलीज की जगह
- गुजरात भेजने पर उठा था विवाद, अब राजस्थान में वापसी
- जंगल छोड़ना आसान नहीं, आगे है असली चुनौती
जयपुर। राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण को अब फिर से खुले आसमान में लौटाने की तैयारी शुरू हो गई है। जैसलमेर के संरक्षण केंद्रों में कैप्टिव ब्रीडिंग से तैयार किए गए गोडावण को पहली बार थार के प्राकृतिक इलाके में छोड़ने की तैयारी है। यह प्रक्रिया अक्टूबर में वाइल्डलाइफ वीक के दौरान शुरू हो सकती है।
सरकार ने इसके लिए जैसलमेर जिले में रामदेवरा और सुदाश्री को संभावित जगह के तौर पर चिन्हित किया है। फिलहाल रामदेवरा को पहली रिलीज के लिए ज्यादा संभावित माना जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला और जरूरी मंजूरियां अभी बाकी हैं।
10 गोडावण तैयार, लेकिन कितने जंगल में जाएंगे?
संरक्षण केंद्रों में फिलहाल 10 गोडावण रिलीज के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी 10 को एक साथ जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
कितने पक्षियों को पहले चरण में छोड़ा जाए, इसका फैसला वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की वैज्ञानिक जांच और तय प्रोटोकॉल के आधार पर होगा। यानी पक्षियों की हालत, उनके व्यवहार और जंगल में खुद जिंदा रहने की क्षमता देखने के बाद ही अंतिम संख्या तय होगी।
संभावित तौर पर पहला रिलीज कार्यक्रम 4 अक्टूबर के आसपास हो सकता है।
अब तक अंडे बचाने से लेकर जंगल में लौटाने तक पहुंची मुहिम
गोडावण को बचाने की यह मुहिम अचानक शुरू नहीं हुई है। केंद्र की एकीकृत गोडावण संरक्षण परियोजना 2016 में शुरू हुई थी, जबकि राजस्थान में संरक्षण के लिए कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम 2019 से चल रहा है।
जैसलमेर के सम में शुरुआती अस्थायी केंद्र बनाया गया। इसके बाद रामदेवरा में बड़ा संरक्षण प्रजनन केंद्र 2022 में शुरू हुआ। मार्च 2023 में यहां कैप्टिव ब्रीडिंग से पहली गोडावण चूजें पैदा हुईं।
अब तक मुहिम का फोकस गोडावण के अंडों को सुरक्षित रखना, चूजों को तैयार करना और कैप्टिव आबादी बढ़ाना था। अब इसका अगला चरण शुरू हो रहा है—इन पक्षियों को धीरे-धीरे वापस उनके प्राकृतिक घर यानी थार में बसाना।
पहले जंगल जैसा माहौल, फिर खुले थार रेगिस्तान में उड़ान
जुलाई में रामदेवरा में तैयार किए गए विशेष री-वाइल्डिंग केंद्र में तीन कैप्टिव-ब्रेड गोडावण चूजों को प्राकृतिक माहौल के लिए तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। वहां पक्षियों को इंसानों से कम से कम संपर्क रखते हुए थार के मौसम, वनस्पति और प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा रहा है।
इसका मकसद यह है कि जंगल में जाने के बाद गोडावण इंसानों पर निर्भर न रहें और खुद भोजन तलाश सकें, मौसम का सामना कर सकें और प्राकृतिक वातावरण में रह सकें।
गुजरात भेजने की योजना पर राजस्थान में उठा था सवाल
गोडावण को जंगल में छोड़ने की तैयारी के बीच एक और विवाद भी सामने आया था। जैसलमेर के संरक्षण केंद्रों में तैयार किए गए गोडावण को पहले गुजरात के नलिया में छोड़ने की योजना पर राजस्थान के कुछ संरक्षण विशेषज्ञों ने आपत्ति जताई थी।
उनका तर्क था कि जिन अंडों से ये पक्षी तैयार हुए हैं, वे राजस्थान के थार क्षेत्र से लिए गए थे। ऐसे में पहली बार इन्हें उनके मूल प्राकृतिक आवास यानी जैसलमेर के थार में ही छोड़ा जाना चाहिए। इसी मांग के बाद राजस्थान में ही पहली रिलीज की संभावना बढ़ी है।
थार में ही क्यों अहम है गोडावण की वापसी?
गोडावण भारत के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है। जैसलमेर में हुए हालिया सर्वे के मुताबिक वहां गोडावण की आबादी पिछले करीब एक दशक में मोटे तौर पर स्थिर रही है, लेकिन उपलब्ध उपयुक्त इलाके के बावजूद पक्षी हर समय केवल करीब 16% क्षेत्र में ही पाए जाते हैं।
सर्वे में यह भी सामने आया कि गोडावण मुख्य रूप से उन खुले घास के मैदानों में टिके हैं जहां मानव बस्तियां और अक्षय ऊर्जा से जुड़ा ढांचा कम है। यानी सिर्फ पक्षियों को जंगल में छोड़ देना काफी नहीं होगा, उनके लिए सुरक्षित और उपयुक्त इलाका बचाना भी उतना ही जरूरी है।
असली चुनौती अब शुरू होगी
कैप्टिव ब्रीडिंग से गोडावण की नई पीढ़ी तैयार करना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब ये पक्षी खुले थार में जाएंगे।
उन्हें बिजली की हाईटेंशन लाइनों, इंसानी गतिविधियों, बदलते घास के मैदानों, आवारा कुत्तों और दूसरे खतरों से बचाना होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक गोडावण की वापसी तभी सफल होगी जब पक्षी छोड़ने के साथ उसका प्राकृतिक आवास भी सुरक्षित रखा जाए।
फिलहाल राजस्थान के लिए यह सिर्फ एक पक्षी को जंगल में छोड़ने की कवायद नहीं है। यह उस प्रजाति को उसके पुराने घर में वापस बसाने की कोशिश है, जिसकी संख्या लगातार संकट में रही है।
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