पूर्व राज्यपाल दिवंगत कमला बेनीवाल को हाई कोर्ट से राहत, आपराधिक कार्यवाही रद्द
समझें क्या है पूरा मामला
- हाई कोर्ट ने कहा कि सिविल व राजस्व मामलों को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।
- निचली अदालत के प्रसंज्ञान और रिविजन के आदेश को रद्ध किया।
- कोर्ट के अनुसार विशेष अधिनियम (सहकारी समिति कानून) के होते IPC लागू नहीं होती।
- खातेदारी व स्वामित्व से जुड़े मूल मुद्दे अभी भी कानूनी मंचों में विचाराधीन हैं।
राजस्थान हाई कोर्ट ने गुजरात की पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल के विरुद्ध करोडों रुपयों की सरकारी जमीन हड़पने के मामले में बेनीवाल सहित अन्य के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की आपराधिक कार्यवाही को रद्ध कर दिया है।
जस्टिस गणेश राम मीणा ने गुजरात की पूर्व राज्यपाल दिवंगत कमला बेनीवाल सहित अन्य की आपराधिक विविध याचिकाओं पर यह आदेश दिया है। कोर्ट ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-7, जयपुर महानगर के 15 जुलाई,2019 के प्रसंज्ञान आदेश और एडीजे-4 जयपुर महानगर के 15 अक्टूबर,2019 के रिविजन आदेश को रद्ध कर दिया है।
सिविल मामले को नहीं बना सकते आपराधिक मामला
कोर्ट ने कहा है कि सिविल विवादों को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पूरा विवाद कृषि भूमि के पट्टे,स्वामित्व और खातेदारी अधिकारों से संबंधित है। जो मूल रूप से सिविल और राजस्व प्रकृति का है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मामले की सुनवाई सिविल कोर्ट में में जारी हो,तो सिविल विवाद को आपराधिक रूप देना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अलग-अलग कानूनी फोरम पर लंबित हैं मामले
कोर्ट ने कहा कि प्रकरण से संबंधित कई मामले अलग-अलग कानूनी फोरम में लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं को 1958 में दिए गए खातेदारी अधिकार, जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) का जमीन अवाप्ति करना, भू-राजस्व अधिनियम के तहत रेफरेंस और मुआवजे का वितरण जैसे मुद्दे अभी भी हाईकोर्ट और रेवेन्यू बोर्ड में विचाराधीन हैं। जब तक सक्षम सिविल और राजस्व अदालतें इन अधिकारों को रद्द नहीं कर देतीं, तब तक धोखाधड़ी या कूटरचना (Forgery) का आरोप नहीं बनता।
खातेदारी अधिकार पर भी होना है फैसला
कोर्ट ने कहा है कि रिकार्ड से साफ है कि याचिकाकर्ताओं को वर्ष 1958 में खातेदारी अधिकार प्रदान किए गए थे। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम-1955 की धारा 15(2) के तहत, अधिनियम लागू होने के समय जो व्यक्ति भूमि पर काबिज था, वह खातेदारी अधिकारों का हकदार था। खातेदारी अधिकार पर अभी फैसला होना बाकी है।
विशेष कानून का सामान्य कानून पर प्रभाव
शिकायत में सहकारी समिति की ओर से गलत तथ्य पेश करने के आरोप थे। हाईकोर्ट ने कहा है कि राजस्थान सहकारी समिति अधिनियम,1953 (एवं 1965) में गलत जानकारी देने पर कार्रवाई के लिए विशेष धाराएं (70, 71 और 74) मौजूद हैं। कानूनी सिद्धांत के अनुसार, जहां विशेष कानून उपलब्ध हो, वहां आईपीसी की आपराधिक धाराएं लागू नहीं हो सकतीं।
यह है मामला
संजय किशोर अग्रवाल ने 16 अगस्त,2012 को कोर्ट में शिकायत दी थी। इसमें बताया था कि 1951 में सरकार ने अनुपयोगी कृषि की जमीन 20 साल के लिए खेती करने को देने की योजना बनाई थी। 1952 में इसमें संशोधन करके कहा कि पहले पांच साल जमीन का सही उपयोग होने पर ही खातेदारी अधिकारी मिलेंगे। संशोधन से 20 की अवधि को बढ़ाकर 25 साल कर दिया। 25 साल बाद जमीन पुन: राज्य सरकार की हो जाएगी।
सरकार ने 5 जनवरी,1953 को राजेंद्र सिंह व अन्य की किसान सामुहिक कृषि सहकारी समिति, झोटवाड़ा को आवंटित की थी। जबकि यह समिति 13 फरवरी,1953 को रजिस्टर्ड हुई थी समय के साथ समिति के सदस्य अन्य कार्य करने लगे थे और गलत तथ्यों के आधार पर खातेदारी अधिकार प्राप्त कर लिए थे।
1978 में 25 साल पूरे होने के बावजूद सरकार ने जमीन वापिस नहीं ली। इसके कुछ साल बाद जेडीए ने पृथ्वीराज नगर योजना के लिए जमीन अवाप्ति की अधिसूचना जारी कर दी। समिति सदस्यों को अवाप्ति के बदले मुआवजे के रुप में 15 फीसदी विकसित जमीन देने का ऑफर दिया गया।
इस बीच अतिरिक्त रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव ने अपनी रिपोर्ट में माना कि समिति सदस्य गलत व झूठे तथ्यों के आधार पर मुआवजे में जमीन लेने की कोशिश कर रहे हैं।
समिति के वर्तमान सदस्यों में से एक भी सदस्य समिति के ऑरिजनत सदस्य नहीं हैं। इन लोगों ने फर्जकारी करके व समिति पर आठ करोड़ का कर्ज बताकर करीब 400 करोड़ रुपये की 1516 वर्गमीटर जमीन मुआवजे में ले ली है।
करधनी थाने ने मामले में एफआर लगा दी थी। शिकायतकर्ता की प्रोटेस्ट पिटिशन पर कोर्ट ने 15 मई,2014 को दिवंगत कमला बेनीवाल सहित अन्य के खिलाफ प्रसंज्ञान लेकर मुकदमा चलाने के आदेश दिए थे। मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश पर एडीजे कोर्ट ने भी दखल देने से इंकार कर दिया था। इन दोनों आदेश को रद्ध करने के लिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
यह कहा हाईकेार्ट में
याचिकाकर्ताओं की ओर से हाईकेार्ट में कहा गया कि अभी तो खातेदारी अधिकार पर भी फैसला होना बाकी है। क्यों कि समिति के प्रस्ताव पर रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव ने रोक लगा दी थी। साथ ही अपील व रिविजन भी लंबित हैं। सरकार के चार रेफरेंस रेवेन्यू बोर्ड में लंबित हैं। खातेदारी अधिकार तो 1958 में ही मिल गए थे।
शिकायतकर्ता ने मामले में किसी सरकारी अधिकारी केा आरोपी नहीं बनाया है। समिति की अवाप्ति व दो अवार्ड को चुनौती देने वाली याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त,2014 को समिति के लिए 25 फीसदी विकसित जमीन समिति के लिए आरक्षित करने के आदेश दिए हुए हैं। यह जमीन हाईकोर्ट में लंबित याचिका के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी। इसके अलावा जयपुर कलक्टर के रैफरेंस करने के 13 अप्रेल,2015 के आदेश के खिलाफ भी याचिका लंबित है।
रेवेन्यू बोर्ड ने 26 जून,2023 को रेफरेंस सरकार के पक्ष में निर्णित किया था। किसान सामुहिक सहकारी समिति की अपील पर रेवेन्यू बोर्ड ने समिति के पक्ष में अंतिरिम आदेश दे रखा है। इसलिए मामले में आपराधिक कार्यवाही शुरु करने का कोई आधार नहीं है।
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