मकानों पर नहीं चलेगा बुलडोजर, हाई कोर्ट के आदेश पर लगी सुप्रीम रोक
News In Short
- जयपुर के B-2 बाइपास मामले में सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक, हाई कोर्ट के 18 मई के आदेश पर रोक
- हाईकोर्ट में लंबित अपील के तय होने तक बचे हुए 10 मकानों पर मिली राहत।
- हाई कोर्ट की एसबी के आदेश पर डिविजन बेंच ने रोक लगाई और फिर हटा ली थी रोक।
- हाउसिंग बोर्ड ने 23-24 मई को ताबड़तोड़ एक्शन कर अधिकांश दुकानें और मकान ढहा दिए थे।
- 42 बीघा की इस बेशकीमती जमीन को हाउसिंग बोर्ड 1991 में अधिग्रहण कर चुका था
News In Detail
Jaipur: सुप्रीम कोर्ट ने जयपुर के बी-टू बाइपास स्थित 42 बीघा जमीन पर 10 मकान में तोड़फोड़ या अन्य किसी तरह के एक्शन पर रोक लगा दी है। यह रोक हाईकोर्ट में लंबित अपील के निपटारे तक रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को अपील पर जुलाई में सुनवाई करने को कहा है। कोर्ट ने यह आदेश श्रीराम नगर-बी कॉलोनी विकास समिति की अपील का निपटारा करते हुए दिए।
अब सिर्फ 10 मकान ही बचे
एडवोकेट आशीष शर्मा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि हाई कोर्ट की सिंगल बैंच के 9 अप्रैल के आदेश पर डिविजन बैंच ने 21 अप्रेल को रोक लगा दी थी।
18 मई को डिविजन बैंच ने बिना किसी कारण के अचानक रोक हटा दी थी, जबकि मूल अपील अभी भी लंबित है। इसलिए हाईकोर्ट के 18 मई के रोक हटाने के आदेश को रद्ध किया जाए और जमीन पर बने निर्माणों को तोड़ने पर रोक लगाई जाए।
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने 18 मई को रोक हटाए जाने के बाद 23 और 24 मई को इस बेशकीमती जमीन पर बने अधिकांश मकान और दुकानों को तोड़कर जमीन का कब्जा ले लिया और अब वहां सिर्फ 10 मकान ही बचे हैं।
करीब 2200 करोड़ की है जमीन
बी-टू बाइपास चौराहे से द्रव्यवती नदी तक 42 बीघा से ज्यादा जमीन मौजूद है। इस जमीन की कीमत बाजार में करीब 2200 करोड़ रुपए से ज्यादा है।
हाउसिंग बोर्ड प्रशासन ने वर्ष 1989 में इस जमीन को अवाप्त करने की प्रकिया शुरू की थी जो 1991 में पूरी हुई थी। लेकिन तब कब्जा नहीं लिया था।
इस बीच जमीन पर कुछ भूमाफियाओं ने जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति के पट्टे के आधार पर कॉलोनी बसा दी और भूखंडों का बेचान दिखा दिया। समिति का कहना था कि उसने खातेदारों से यह जमीन 1981 में खरीद ली थी।
नियमन की कार्यवाही को चुनौती
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने 2019 में जमीन के नियमन के लिए एनओसी देने से इंकार कर दिया था। बोर्ड ने जमीन लेने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाउसिंग बोर्ड का कहना था कि जब जमीन पर 50 फीसदी निर्माण ही नहीं है तो नियमन क्यों किया जा रहा है? कॉलोनी बसाने वाली हाउसिंग सोसाइटी के खिलाफ FIR भी दर्ज करवाई गई। मामला एसीबी को भेजने के साथ ही नियमन की कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी थी।
एसबी ने कहा गैर-कानूनी है कॉलोनी
हाईकोर्ट ने बोर्ड की याचिका मंजूर करते हुए सिंगल बैंच ने 9 अप्रैल के आदेश में कहा था कि 42 बीघा जमीन को राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की है। सरकार जमीन मालिकों को जमीन के बदले मुआवजा दे चुकी है।
जेडीए की 29 मई 1995 को दी गई योजना स्वीकृति और उसके बाद के आदेश अवैध हैं। विक्रय पत्र से जमीन का मालिकान हक ट्रांसफर नहीं होता है। सिंगल बैंच ने जमीन पर बने मकानों को अवैध बताते हुए बोर्ड को इन्हें हटाकर जमीन का कब्जा लेने को कहा था। इस आदेश के बाद हाउसिंग बोर्ड ने यहां खाली जमीन सहित कुछ निर्माण हटाकर कब्जा ले भी लिया था।
27 दिन बाद ही हट गई रोक
सिंगल बैंच के आदेश को डिविजन बैंच में चुनौती दी गई थी। इस पर डीबी ने 21 अप्रैल को सिंगल बैंच के 9 अप्रेल के आदेश पर रोक लगा दी थी। लेकिन, 18 मई को मामले में पक्षकार बनने की अर्जी पर सुनवाई के दौरान 21 अप्रैल को लगाई रोक को हटा लिया था।
कोर्ट का कहना था कि डीबी पहले से ही हाउसिंग बोर्ड की जमीन पर बसी 87 कॉलोनियों के नियमन के खिलाफ सुनवाई कर रही है। श्रीराम नगर-बी का मामला भी उन्हीं में से एक है,लेकिन अपीलकर्ताओं और हाउसिंग बोर्ड ने मिलीभगत से यह फैक्ट छिपा लिया था।
FAQs
जयपुर के बी-टू बाइपास स्थित 42 बीघा जमीन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट में लंबित अपील के निपटारे तक 42 बीघा जमीन पर 10 मकानों को तोड़ने या किसी अन्य एक्शन पर रोक लगा दी है।
जमीन का कुल मूल्य और स्थिति क्या है?
यह जमीन लगभग 42 बीघा में फैली हुई है और इसका बाजार मूल्य करीब 2200 करोड़ रुपए से अधिक है। वर्तमान में हाउसिंग बोर्ड ने अधिकांश निर्माण हटा दिए हैं और केवल 10 मकान बचे हैं।
कॉलोनी को गैर-कानूनी क्यों बताया गया है?
कोर्ट ने बताया कि कॉलोनी अवैध है क्योंकि जमीन हाउसिंग बोर्ड की है, और कॉलोनी बनाने वाली सोसाइटी ने नकली पट्टे के आधार पर इसे बसा दिया था। हाउसिंग बोर्ड ने 2019 में एनओसी देने से इंकार किया और कोर्ट ने इसे गैर-कानूनी माना।
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