अमेरिका में बैठी महिला को कोर्ट में हाजिर होने का दिया सिर्फ 8 दिन का वक्त, यह कैसा समन?

Mukesh Sharma | May 29, 2026, 16:50 IST
Photograph: (the sootr)
जयपुर की एक कोर्ट कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। मामला यह है कि कोर्ट ने अमेरिका की बुजुर्ग महिला को अंतरराष्ट्रीय हेग कन्वेंशन और घरेलू सिविल नियमों के विपरीत समन जारी कर दिया। इस फैसले की निष्पक्षता पर अब सवाल उठाए जा रहे हैं।

News In Short

  • कोर्ट ने अमेरिका में रह रही 77 वर्षीय महिला को पेश होने के लिए दिया सिर्फ 8 दिन का समय।
  • भारत-अमेरिका संधि को दरकिनार कर अमेरिका में रह रही बुजुर्ग महिला को सीधे भेजा गया समन।
  • राजस्थान सिविल नियमों के तहत मिलने वाले 7 महीने के अनिवार्य समय को 8 दिन में समेटा।
  • भारत और अमेरिका के टाइम ज़ोन को भुलाकर हर 48 घंटे में रखी जा रही हैं सुनवाई।
  • एकतरफा फैसले की आशंका के बीच पीड़ित पक्ष ने जिला जज से लगाई केस शिफ्ट की गुहार।

News In Detail

जयपुर की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट अमेरिका के मैसाचुसेट्स (Massachusetts) में रहने वाली 77 साल की भारतीय-अमेरिकी बुजुर्ग महिला को समन जारी किया है। इसमें उसे कोर्ट में पेश होने के लिए सिर्फ 8 दिन का समय दिया गया। भौगोलिक रूप से देखा जाए तो इतने कम समय में अमेरिका से जयपुर पहुंचकर कोर्ट में उपस्थित होना मुश्किल है।



यह मामला जयपुर की एसीएमएम नंबर- 2 (Jaipur Metro-I) की कोर्ट से जुड़ा है। कोर्ट में अमृत कलश फ्लैट ओनर्स वेलफेयर एंड मेंटेनेंस सोसायटी बनाम सुशीला देवी व अन्य नाम से एक सिविल मुकदमा चल रहा है। यह केस 18 साल पुरानी (2008 की) दो सेल-डीड और रजिस्ट्री को रद्द कराने का है।



केस दायर करने वाले को पता है कि डॉ. कुंज बाला शर्मा 50 साल से अमेरिका में रहती हैं। कोर्ट के दस्तावेजों में उनका अमेरिका का ही पता लिखा है। लेकिन कोर्ट ने जल्दबाजी दिखाकर अंतरराष्ट्रीय और राज्य के नियमों को ताक पर रखकर समन जारी कर दिया।



आठ दिन में आना कैसे संभव

आरोप है कि इस कोर्ट ने अमेरिका के मैसाचुसेट्स (Massachusetts) में रहने वाली 77 वर्षीय भारतीय-अमेरिकी बुजुर्ग महिला को सिविल मामले में समन जारी करके पेश होने के लिए सिर्फ 8 दिन का समय दिया।



कानूनी जानकारों के अनुसार तकनीकी और भौगोलिक रूप से इतने कम समय में किसी विदेशी नागरिक का कोर्ट में उपस्थित होना असंभव ही है।



महिला के वकील महेंद्र गौड़ ने जयपुर महानगर-प्रथम (Jaipur Metropolitan-I) के जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District and Sessions Judge) के पास एक तत्काल शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने मामले में कोर्ट के रवैये के आधार पर तत्काल जांच करने या केस को दूसरी कोर्ट में ट्रांसफर करने की गुहार की है।



हेग सर्विस कन्वेंशन 1965 का उल्लंघन

एडवोकेट गौड़ ने बताया कि भारत और अमेरिका दोनों ही हेग सर्विस कन्वेंशन (Hague Service Convention) संधि के सदस्य देश हैं। इस अंतरराष्ट्रीय संधि के नियम 2 और 5 के अनुसार यदि किसी देश की अदालत को दूसरे देश में रहने वाले व्यक्ति को कोई कानूनी दस्तावेज या समन भेजना है, तो उसे दोनों देशों द्वारा तय की गई केंद्रीय एजेंसी (Central Authority) के माध्यम से ही भेजा जा सकता है।



भारत में यह जिम्मेदारी कानून एवं न्याय मंत्रालय (Ministry of Law & Justice) की है, जो अमेरिका के न्याय विभाग (Department of Justice) से संपर्क कर कानूनी तरीके से समन तामील करवाता है।



भारत ने इस संधि के तहत किसी को सीधे ईमेल या निजी कूरियर से समन भेजने पर रोक लगा रखी है। लेकिन इस मामले में इन नियमों का पालन नहीं किया गया।



राजस्थान के सामान्य नियम की अनदेखी

एडवोकेट गौड़ ने मामले में राजस्थान के अधीनस्थ अदालतों पर लागू होने वाले सामान्य नियम (सिविल)- 2018 के भी गंभीर अनदेखी का आरोप लगाया है।



इन नियमों के अनुसार यदि कोई कोर्ट विदेश में रहने वाले व्यक्ति को समन जारी करता है तो सुनवाई की अगली तारीख कम से कम 7 महीने बाद की तय होनी चाहिए। ताकि दस्तावेज सरकारी चैनलों से अमेरिका पहुंच सकें।



समन पर खुद जज (पीठासीन अधिकारी) के हस्ताक्षर होने चाहिए और उसका अंग्रेजी अनुवाद साथ होना चाहिए।



लेकिन कोर्ट ने किया यह

एडवोकेट गौड़ की शिकायत के अनुसार कोर्ट ने 28 अप्रैल 2026 को समन जारी किया। इस पर जज के बजाय कोर्ट रीडर के दस्तखत थे। पहली सुनवाई की तारीख 6 मई 2026 तय कर दी।



यानी अमेरिका में बैठी एक 77 साल की बुजुर्ग महिला को कानूनी कागजात समझने, भारत में वकील ढूंढने और जवाब तैयार करने के लिए सिर्फ 8 दिन का समय दिया गया। यह पूरी तरह गैर-कानूनी है।



प्राकृतिक न्याय का घोंटा गला

शिकायत में बताया गया कि कोर्ट ने महिला को 24 घंटे के भीतर जवाब देने जैसी स्थिति में ला खड़ा किया है।



अप्रैल के अंत से लेकर मई के अंत तक कोर्ट ने हर दो-तीन दिन में लगातार सुनवाई रखी। यहां तक कि 25, 26 और 27 मई को लगातार बैक-टू-बैक तारीखें दी गईं।





ChatGPT Image May 29, 2026, 04_19_01 PM


यह रफ्तार इसलिए भी सही है, क्योंकि अमेरिका (EST) और भारत (IST) के समय में साढ़े 9 से साढ़े 10 घंटे का अंतर है।



जब यहां कोर्ट काम करती हैं तो वहां होती है आधी रात

एडवोकेट गौड़ ने अपनी अर्जी में लिखा है कि जिस समय जयपुर में कोर्ट कोई आदेश जारी करती है, उस समय अमेरिका के मैसाचुसेट्स में आधी रात हो रही होती है।



आधी रात को जागकर एक बुजुर्ग महिला के लिए भारत में वकीलों से संपर्क करना। दो अलग-अलग महाद्वीपों में फैले दस्तावेज़ों को जुटाना, इसके बाद कुछ ही घंटों में कोर्ट को जवाब भेजना शारीरिक और व्यावहारिक रूप से असंभव है।



केस ट्रांसफर करने की मांग

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा है कि कोर्ट एकतरफा (ex-parte) फैसला सुनाने की जल्दबाजी में लग रहा है। इस कारण न्याय की उम्मीद नहीं है।



उन्होंने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट अनुपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तय कर चुका है कि यदि किसी कानून या नियम में किसी काम को करने का एक तय तरीका बताया गया है,तो कोर्ट को उसी तरीके से काम करना होगा अपनी मर्जी से नहीं।



इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट कुलविंदर कौर बनाम कांडी फ्रेंड्स एजुकेशन ट्रस्ट मामले में मान चुका है कि यदि किसी पक्षकार को यह वाजिब डर हो कि उसे कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा। या भौगोलिक दूरियों के कारण केस लड़ना असंभव हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत केस को दूसरी अदालत में ट्रांसफर किया जा सकता है।



एडवोकेट गौड़ ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश से गुहार लगाई है कि या तो ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड मंगाकर इस गलती को सुधारा जाए। या फिर निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को बचाने के लिए केस को फौरन जयपुर महानगर-प्रथम की ही किसी दूसरी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया जाए।



FAQ

  1. हेग सर्विस कन्वेंशन 1965 क्या होता है?
    हेग सर्विस कन्वेंशन 1965 (Hague Service Convention 1965) एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य अलग‑अलग देशों में रहने वाले लोगों को कानूनी दस्तावेज, जैसे समन (summons), नोटिस या अदालत के आदेश सुरक्षित और वैधानिक तरीके से भेजना है।

FAQ

  1. हेग सर्विस कन्वेंशन 1965 क्या होता है?
    हेग सर्विस कन्वेंशन 1965 (Hague Service Convention 1965) एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसका उद्देश्य अलग‑अलग देशों में रहने वाले लोगों को कानूनी दस्तावेज, जैसे समन (summons), नोटिस या अदालत के आदेश सुरक्षित और वैधानिक तरीके से भेजना है।
  2. सेशन कोर्ट में केस कब और क्यों ट्रांसफर होते है
    CPC (Civil Procedure Code) की धारा 24 के अनुसार, जब केस लड़ना असंभव हो या पक्षकार को न्याय पाने में दिक्कत हो।

ये भी पढे़:-

राजस्थान में NEET परीक्षा को लेकर हाई-अलर्ट, वायु सेना संभालेगी पेपर की कमान



SOG की बड़ी कार्रवाई, फर्जी ताइक्वांडो सर्टिफिकेट मामले में एक और अभ्यर्थी गिरफ्तार



113 साल पुरानी सीमेंट फैक्ट्री पर ताला, 20,000 लोगों के बेरोजगार होने का खतरा



गहराया बजरी संकट, सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई तक लगाई माइनिंग लीज पर रोक



Tags:
  • सुप्रीम कोर्ट
  • पीठासीन अधिकारी
  • बुजुर्ग महिला
  • भारत-अमेरिका