जयपुर में खुला हजारों साल पुरानी वस्तुओं का हाईटेक संसार, इसे देखकर आप भी हो जाएंगे रोमांचित

The Sootr | May 18, 2026, 18:12 IST
Photograph: (the sootr)
भारतीय पुरातत्व और कला-इतिहास की पुरानी अवधारणाओं को बदलने आ गया है जयपुर का एक अनूठा हाईटेक संग्रहालय। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जयपुर में मानसरोवर परिसर में स्थापित यह केंद्र राजस्थान आने वाले पर्यटकों, शोधार्थियों के लिए आकर्षण का एक नया गढ़ होगा।

गुलाब बत्रा@जयपुर



राजस्थान की राजधानी जयपुर के इस अनूठे हाईटेक संग्रहालय के अस्तित्व में आने की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है। वर्ष 2003 में देश के मशहूर पुरातत्वविद डॉ. दिलीप चक्रवर्ती ब्रज अंचल के पुरास्थलों का सर्वे कर रहे थे।



गोवर्धन-डीग मार्ग पर स्थित बहज गांव में एक अत्यंत ऊंचे टीले को देखकर वह चौंक गए। उनके साथ एएसआई के डॉ. विनय कुमार गुप्ता भी थे। डॉ. चक्रवर्ती ने इस टीले में इतिहास का एक बड़ा खजाना छिपे होने की संभावना जताई थी।


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नियति देखिए, साल 2022 में डॉ. विनय कुमार गुप्ता का जयपुर मंडल में अधीक्षण पुरातत्वविद के रूप में पदस्थापन हुआ। उनके निर्देशन में साल 2024 और 2025 में बहज में दो सत्रों में ऐतिहासिक उत्खनन (खुदाई) किया गया।



खुदाई से निकले इस बेशकीमती खजाने को सहेजने के लिए डॉ. गुप्ता ने परिसर के प्रथम तल पर स्थित जगतपति जोशी सभागार में पुरातात्विक वीथिका एवं व्याख्या केन्द्र के सपने को सच कर दिखाया। बता दें कि पूर्व महानिदेशक जगतपति जोशी ने ही गुजरात में ऐतिहासिक धोलावीरा की खोज की थी।



बहज से मिली कुछ पुरावस्तुओं को डीग के प्रसिद्ध जलमहलों में स्थित किशन भवन के खाली पड़े कक्ष में भी प्रदर्शित किया गया है। मेजर जनरल (R.) राहुल कुमार, पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद बीआर मीणा, आरडी सिंह तथा एसके शर्मा जैसी हस्तियों ने इस केंद्र की मुक्त कंठ से सराहना की है।



12 शोकेस और हजारों साल पुराना इतिहास

जयपुर के इस संग्रहालय में 12 शोकेस में लगभग 1400 पुरावस्तुएं सजाई गई हैं। करीब 700 पुरावशेष अकेले बहज की खुदाई से हैं। ब्यावर जिले के ओझियाना की खुदाई से प्राप्त 250 पुरावशेष शामिल हैं।



खास बात यह है कि ओझियाना में भारत के प्राचीनतम शीशे का साक्ष्य (टुकड़े के रूप में) मिला है। साथ ही यहां सबसे अधिक नंदी की मृण्मूर्तियों सहित थनों वाली गाय की मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं। ​डीग के संग्रहालय में 14 शोकेस में बहज से मिली लगभग 4,000 पुरावस्तुएं प्रदर्शित हैं।



सीकर जिले का बेवान भी गणेश्वर संस्कृति से जुड़ा स्थल है, जो प्राचीनकाल में ताम्बे और लोहे के निर्माण का बड़ा केंद्र था।



​यहां प्रदर्शित पुरावस्तुएं 1700 साल से लेकर 5000 साल पुरानी संस्कृति की गवाह हैं। टोंक-उनियारा मार्ग पर स्थित नगर फोर्ट से प्राप्त लगभग 1200 साल पुरानी पार्श्वनाथ जी की भव्य प्रतिमा भी यहां का गौरव बढ़ा रही है।



डॉ. गुप्ता के अनुसार कई किलोमीटर में फैला नगर फोर्ट का टीला देश में एएसआई की सबसे बड़ी पुरातात्विक साइट है, जहा आखिरी बार ब्रिटिश काल (1920) में खुदाई हुई थी।





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हाईटेक विजुअल्स और साइन लैंग्वेज की अनूठी पहल

यह सिर्फ एक पारंपरिक संग्रहालय नहीं है, बल्कि पूरी तरह हाईटेक है। महाभारत कालखंड, गुप्तकाल, कुषाण, शुंग, मौर्य तथा मौर्य-पूर्व संस्कृति की डिजिटल जानकारी के लिए टच स्क्रीन कियोस्क लगाए गए हैं।



मूक-बधिर (Deaf & Dumb) दर्शकों को इतिहास से रूबरू कराने के लिए यहां साइन लैंग्वेज (सांकेतिक भाषा) की विशेष व्यवस्था है।



यहां 30-40 सीटों वाले वीविंग एरिया में दर्शक बड़ी एलईडी स्क्रीन पर रणथम्भौर दुर्ग, भानगढ़, नीलकंठ महादेव, आभानेरी की बावड़ी और बयाना दुर्ग जैसे ऐतिहासिक स्मारकों का सजीव सफर कर सकेंगे।





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​क्या है वज्रनाभ का खेड़ा और बहज का रहस्य?

​बहज की खुदाई में पुरापाषाण काल से लेकर उत्तर मध्यकाल तक का लगभग 20 मीटर गहरा अटूट (निर्वाध) सांस्कृतिक क्रम मिला है, जो पुरातत्व विभाग में असाधारण माना जाता है। इससे प्राचीन व्यापारिक मार्गों पर बहज की भूमिका समझने में मदद मिलेगी।


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पौराणिक कथाएं के अनुसार बहज भगवान श्रीकृष्ण के नाती (पोते के बेटे) वज्रनाभ का गांव माना जाता है, जिसे साहित्यों में वज्रनाभ के खेड़े के नाम से जाना गया है। यहां मिले अवशेष साबित करते हैं कि प्राचीन ब्रज अंचल धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद उन्नत था और यहाँ कोई विशाल सभ्यता मौजूद थी।





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​इतिहास बदलने वाली 4 नायाब खोजें

बिना पकी मिट्टी की 4 मुहरें: इन पर ब्राह्मी लिपि में जनक और नोखर लिखा है (600 ईसा पूर्व)। ये भारतीय उपमहाद्वीप में ब्राह्मी लिपि के सबसे पुराने ज्ञात उदाहरण हैं।



दुर्लभ जैस्पर पत्थर की मुहर: कुषाण और मौर्य कालखंड की इन मुहरों पर अंकित प्रतीक सनातन धर्म के प्राचीन महत्व को दर्शाते हैं।



शिव-पार्वती टेराकोटा मूर्ति: गोल डिस्क जैसी दिखने वाली मानव आकृतियों वाली यह मृण्मूर्ति शिव-पार्वती का रूप है। यह देश में पूजा की परंपरा को 3,000 से 3,500 साल पीछे ले जाती है।



त्रिशूल-डमरू अंकित बर्तन: 200 ईसा पूर्व के मिट्टी के बर्तन पर त्रिशूल के साथ बंधा डमरू उकेरा गया है। मूर्तिकला के शुरुआती दौर में त्रिशूल-डमरू का ऐसा प्राचीन उदाहरण पूरे देश में कहीं और नहीं मिलता।



इसके अलावा संग्रहालय में पुरापाषाण काल के औजार, जेस्पर पत्थर की स्टोन रिंग, कीमती मनके, प्राचीन सिक्के, शंख और कांच की चूड़ियां भी प्रदर्शित हैं। गोवर्धन पहाड़ियों और बहज के सबसे निचले स्तर पर मिले फ्लेक औजार इस साइट की प्राचीनता को हजारों-लाखों साल पीछे प्रागैतिहासिक भारत से जोड़ते हैं।





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​बना एक अनोखा रिकॉर्ड

​इस पूरे मिशन के सूत्रधार डॉ. विनय कुमार गुप्ता ने बहज उत्खनन पर 2,550 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है। पुरातत्व के इतिहास में यह अब तक की सबसे लंबी रिपोर्ट है। साथ ही बहज में की गई 23 मीटर गहराई तक की खुदाई भी अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान है।


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जयपुर का यह संग्रहालय देश की गौरवशाली विरासत को करीब से महसूस करने का एक बेहतरीन जरिया बनने जा रहा है।



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