गलत कीमोथैरेपी केस: स्थायी लोक अदालत ने डॉक्टर व अस्पताल पर ठोंका 23.36 लाख जुर्माना

Mukesh Sharma | Aug 29, 2026, 18:17 IST
गलत कीमोथैरेपी केस
भरतपुर की एक महिला को जयपुर के अस्पताल में टीबी की जगह कैंसर का मरीज बताकर कीमोथैरेपी दी गई l मुंबई में सही बीमारी का पता चलने पर स्थायी लोक अदालत ने डॉक्टर व अस्पताल को 23.36 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

समझें क्या है पूरा मामला

  • टीबी को कैंसर समझकर महिला को लगातार दी गई दर्दनाक कीमोथैरेपी।
  • मुंबई के टाटा मेमोरियल में जांच के बाद हुआ बीमारी का सही इलाज।
  • भरतपुर की स्थायी लोक अदालत ने माना चिकित्सकीय लापरवाही का मामला।
  • मानसिक पीड़ा और इलाज खर्च के मद में 23.36 लाख क्षतिपूर्ति तय।

भरतपुर की रहने वाली एक महिला को जयपुर के एक अस्पताल में टीबी की जगह कैंसर का मरीज बताकर दर्दनाक कीमोथैरेपी दी गई। बाद में मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में सही जांच से पता चला कि महिला को कैंसर नहीं, बल्कि तपेदिक (टीबी) की बीमारी थी। भरतपुर की स्थायी लोक अदालत ने इसे चिकित्सकीय लापरवाही का स्पष्ट मामला मानते हुए संबंधित डॉक्टर और अस्पताल पर 23.36 लाख रुपए का मुआवजा तय किया है। यह फैसला 24 अगस्त को सुनाया गया।



पेट दर्द के इलाज के लिए पहुंची थी महिला

महिला पेट दर्द के इलाज के लिए जयपुर के अस्पताल पहुंची थी। आरोप है कि बिना जांच दोहराए ही उसे कैंसर का मरीज घोषित कर दिया गया। इसके बाद बिना पुष्टि के ही महिला को लगातार दर्दनाक कीमोथैरेपी की प्रक्रिया से गुजारा गया।



टाटा अस्पताल में हुआ बड़ा खुलासा

जब कीमोथैरेपी के बावजूद महिला की सेहत में सुधार नहीं हुआ, तो परिजन उसे मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल अस्पताल ले गए। वहां हुई विस्तृत जांच में साफ हो गया कि महिला को कैंसर नहीं, बल्कि टीबी की शिकायत थी। इसके बाद महिला का सही बीमारी के अनुसार इलाज शुरू किया गया।



लोक अदालत ने माना लापरवाही का मामला

भरतपुर की स्थायी लोक अदालत ने इस पूरे मामले की सुनवाई के बाद इसे चिकित्सकीय लापरवाही का स्पष्ट मामला स्वीकार किया। पीठासीन अधिकारी गंभीर सिंह और सदस्य योगेश कुमार शर्मा व रजनीकांत शर्मा की पीठ ने 24 अगस्त को यह फैसला सुनाया।



23.36 लाख रुपए का मुआवजा तय

अदालत ने महिला को हुई मानसिक पीड़ा, शारीरिक कष्ट और आर्थिक नुकसान के एवज में 20 लाख रुपए का मुआवजा तय किया। इसके अलावा इलाज में हुए खर्च के बिलों के भुगतान के लिए 3.36 लाख रुपए अलग से जोड़े गए। इस तरह कुल 23,36,774 रुपए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया गया।



मरीजों के लिए क्यों अहम है यह फैसला

यह मामला दिखाता है कि गंभीर बीमारी का इलाज शुरू करने से पहले जांच की दोबारा पुष्टि कितनी जरूरी होती है। लोकसहक, अदालत का यह फैसला मरीजों के अधिकारों और चिकित्सकीय जवाबदेही से जुड़ा एक अहम उदाहरण माना जा रहा है।



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