गोडावण चूजों के लिए 9 करोड़ की टनल, बच्चे सीख रहे है जंगल में जीने का तरीका
समझें क्या है पूरा मामला
- रामदेवरा में 3 गोडावण चूजों की रिवाइल्डिंग ट्रेनिंग शुरू।
- ₹9.25 करोड़ की टनल में प्राकृतिक माहौल तैयार।
- चूजे खुद खाना-पानी तलाशना सीख रहे हैं।
- 24 घंटे CCTV से निगरानी की जा रही है।
- 4-6 महीने बाद डेजर्ट नेशनल पार्क में होंगे आजाद।
राजस्थान में जैसलमेर के रामदेवरा गोडावण ब्रीडिंग सेंटर में तीन गोडावण चूजों को रिवाइल्डिंग टनल में रखा गया है। यह टनल 9.25 करोड़ रुपये की लागत से बनाई गई है। यहां चूजे खतरे से बचना, खुद खाना ढूंढना और पानी पीना सीख रहे हैं। 4 से 6 महीने बाद उन्हें डेजर्ट नेशनल पार्क में छोड़ा जाएगा।
2 महीने का नन्हा गोडावण सामने मिट्टी, झाड़ियां और तेज धूप का सामना कर रहा है। खतरा महसूस होते ही झाड़ियों में छिप जाना, मिट्टी कुरेदकर कीड़े ढूंढना और प्यास लगने पर खुद पानी तक पहुंचना, ये सब अब गोडावण के ये बच्चे सीख रहे हैं। खास बात यह है कि उन्हें यह ट्रेनिंग किसी क्लासरूम में नहीं, बल्कि रेगिस्तान के जंगल जैसा माहौल तैयार कर बनाई गई एक खास रिवाइल्डिंग टनल में दी जा रही है।
एक महीने पहले लाए गए थे तीन चूजे
जैसलमेर के रामदेवरा स्थित गोडावण ब्रीडिंग सेंटर में बनी इस रिवाइल्डिंग टनल में तीन चूजों यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को करीब एक महीने पहले लाया गया था। उस समय उनकी उम्र सिर्फ एक महीना थी। अब वे दो महीने के हो चुके हैं और धीरे-धीरे इंसानी देखरेख से दूर रहकर प्राकृतिक माहौल में जीना सीख रहे हैं।
खुद पूरी कर रहे हैं अपनी जरूरतें
एसीएफ वन्यजीव अशोक सिंह के मुताबिक टनल में आने के समय तीनों चूजे पूरी तरह इंसानी देखरेख और तैयार भोजन पर निर्भर थे। अब वे खुद अपना भोजन तलाश रहे हैं। एक महीने की ट्रेनिंग में उन्होंने प्राकृतिक हवा, तापमान में बदलाव और सीधी धूप का सामना करना भी सीख लिया है। फिलहाल तीनों चूजे स्वस्थ हैं और उनका शारीरिक विकास तेजी से हो रहा है।
गोडावण को खुले जंगल के लिए तैयार करने के मकसद से इस टनल में प्राकृतिक झाड़ियां, घास और छोटे पेड़-पौधे लगाए गए हैं। तेज धूप और गर्मी से बचाव के लिए छायादार हिस्से और प्राकृतिक शेड भी बनाए गए हैं। टनल में दो अलग-अलग जगहों पर पानी की व्यवस्था की गई है, जहां चूजे अपनी जरूरत के हिसाब से खुद जाकर पानी पीते हैं।
इंसानी चेहरा नहीं देख पाते चूजे
ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे गोडावण के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंसानों के प्रति लगाव बढ़ना है। अगर पक्षी इंसानों को अपना साथी समझने लगें, तो जंगल में लौटने के बाद प्राकृतिक परिस्थितियों में उनका जीवित रहना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से टनल में जाने वाली टीम के सदस्य मिट्टी के रंग के कपड़े पहनते हैं। खाना और बाकी सामग्री छोटी खिड़कियों के जरिए अंदर रखी जाती है, ताकि चूजों को इंसानी चेहरा दिखाई न दे।
झाड़ियों में छिपना सीख गए हैं चूजे
रामदेवरा के प्रोजेक्ट एसोसिएट महेश गुर्जर के मुताबिक तीनों चूजों के व्यवहार में अब प्राकृतिक बदलाव साफ दिखने लगा है। टनल के ऊपर से कोई बड़ा पक्षी उड़ता है या कोई अनजान आवाज सुनाई देती है, तो गोडावण झाड़ियों के पीछे छिप जाते हैं। यह व्यवहार बताता है कि चूजे अब प्राकृतिक जीवन के लिए धीरे-धीरे तैयार हो रहे हैं।
24 घंटे कैमरों से हो रही निगरानी
टनल में कुल 10 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। कंट्रोल रूम से इन कैमरों के जरिए चूजों की लगातार निगरानी की जाती है। वाइल्ड लाइफ बायोलॉजिस्ट, डॉक्टर और वनकर्मियों सहित कुल 25 सदस्यों की टीम इनकी देखरेख और मॉनिटरिंग में जुटी है।
जल्द जंगल में मिलेगी आजादी
फिलहाल तीनों चूजे दो महीने के हैं। वन विभाग के मुताबिक जब वे 4 से 6 महीने के हो जाएंगे और मरुस्थलीय परिस्थितियों में पूरी तरह ढल जाएंगे, तब उन्हें टनल से बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद उन्हें जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क के खुले क्षेत्र में छोड़ा जाएगा।
जंगल में भी होगी जीपीएस से निगरानी
एसीएफ वन्यजीव अशोक सिंह के मुताबिक जंगल में छोड़े जाने के बाद भी गोडावण की जीपीएस से निगरानी की जाएगी। इस टनल परियोजना का मुख्य मकसद ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे गोडावण को प्राकृतिक जीवन के लिए तैयार करना और उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस जंगल में बसाना है। अगर रामदेवरा में चल रहा यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में ब्रीडिंग सेंटर में जन्मे बाकी गोडावण के बच्चों को भी इसी प्रक्रिया के जरिए खुले जंगल में छोड़े जाने का रास्ता साफ हो सकता है।
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