सिनेमा के लिए मिला भूखंड, जेडीए ने रद्ध किया आवंटन, 30 साल बाद आया कोर्ट में
समझें क्या है पूरा मामला
- कोर्ट ने 30 साल पहले जेडीए की नीलामी व भूखंड आवंटन रद्ध करने का फैसला सही माना।
- जेडीए ने तय समय पर निर्माण न करने पर 1988 में निरस्त किया था सिनेमा भूखंड का आवंटन।
- जयपुर की कोर्ट ने कहा, 30 साल बाद देर से पता चलने का आधार कानूनी रूप से सही नहीं।
- निरस्तीकरण के खिलाफ चुनौती केवल जानकारी मिलने के 3 साल के भीतर ही दी जा सकती है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि JDA के मामलों की सुनवाई केवल JDA ट्रिब्यूनल ही कर सकता है।
जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के तीन दशक (30 साल) पहले निरस्त किए गए सिनेमा भूखण्ड आवंटन को रद्ध करने के फैसले को कोर्ट ने सही माना है।
जयपुर की एडीजे क्रम-04 नीतू भारद्वाज ने कहा है कि इतने दशकों बाद पुराने फैसलों को दूरी से सूचना मिलने के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने याचिका को समय सीमा और क्षेत्राधिकार से बाहर मानते हुए खारिज कर दिया है।
क्या है 30 साल पुराना मामला?
1983 में नीलामी: जेडीए ने 30 सितंबर 1983 को जयपुर के सुभाष नगर शॉपिंग सेंटर में सिनेमा बनाने के लिए भूखण्ड की नीलामी की थी। उच्चतम बोली लगाने वाले यादव हरवानी एंड कंपनी को यह भूखंड मिला था।
1988 में रद्द: बकाया शहरी जमाबंदी व किराया जमा नहीं कराने और निर्धारित दो साल में निर्माण नहीं करने पर जेडीए ने 30 अगस्त 1988 को नीलामी व आवंटन निरस्त कर दिया। साथ ही जमा राशि जब्त कर ली गई।
30 साल बाद चुनौती: मूल आवंटी की मृत्यु के बाद उनके वारिस अहमदाबाद निवासी पत्नी तारा बैन व पुत्रों ने सिविल कोर्ट में शरण ली। इसमें 1988 के निरस्तीकरण आदेश और 1987 के मांग पत्र को चुनौती दी गई। साथ ही भूखण्ड का कब्जा दिलाने और जेडीए द्वारा पुनः नीलामी की कार्यवाही रोकने की मांग की।
2017 में हुई जानकारी
मूल आवंटी की पत्नी व बेटों का कहना था कि 1988 में नीलामी रद्द करने के आदेश की जानकारी उन्हें पहली बार 21 जनवरी 2017 को मिली थी। इसलिए उनका मुकदमा समय सीमा के भीतर है।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा है कि आवंटी के पिता ने 1988 में ही एक मुकदमा किया था। इसमें जेडीए की कार्यवाही का जिक्र था। ऐसे में यह कहना कि 30 साल बाद वर्ष 2017 में उन्हें जानकारी मिली सही नहीं है।
कानूनन किसी आदेश के निरस्तीकरण का दावा जानकारी मिलने की तिथि से 3 वर्ष के भीतर ही लाया जा सकता है। मुकदमा करने से पहले जेडीए केा नोटिस नहीं दिया, जबकि पहले नोटिस देना अनिवार्य है।
जेडीए के आदेश व नोटिस के खिलाफ सिर्फ जेडीए ट्रिब्यूनल ही सुनवाई कर सकता है। सिविल कोर्ट को जेडीए मामले सुनने का अधिकार नहीं है।
ये भी पढ़ें:-
द्रव्यवती नदी की जमीन पर भू-माफिया का कब्जा, जेडीए सचिव ने मंगवाया रिकार्ड
जेडीए की गैरहाजरी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, बताए अवैध निर्माण पर कार्रवाई
भजनलाल सरकार का यू-टर्न, हाईकोर्ट की जेडीए को लताड़- सरकार बदलने से नहीं बदलते वादे और कांट्रेक्ट
चंदन के पेड़ चोरी में ऊपर से नीचे तक मिलीभगत, जेडीए करेगा 90 लाख के नुकसान की भरपाई