अफसरों से मिलकर तैयार की फर्जी सैटलमेंट डीड, फिर लोक अदालत से करा लिया अवार्ड

Mukesh Sharma | Jul 20, 2026, 12:21 IST
जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला
जयपुर के जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन को हड़पने के लिए जेडीए अफसरों और भू-माफियाओं ने बड़ा खेल रचा। उन्होंने 23 हजार वर्गगज इस बेशकीमती जमीन का चुपके से नेशनल लोक अदालत से अवार्ड हासिल कर लिया।

जयपुर के सबसे पॉश इलाके जेएलएन मार्ग पर डब्ल्यूटीपी के सामने स्थित सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने का मामला खुल चुका है। इस खेल में जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के आला अफसरों ने भरपूर सहयोग किया। उन्होंने निजी पक्षकारों का साथ देकर नेशनल लोक अदालत तक का गलत इस्तेमाल कर उससे अवार्ड पारित करवा लिया।



अब इस मामले में राजस्थान सरकार व जेडीए ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर धोखाधड़ी बताकर समझौते और अवार्ड को रद्ध करने की गुहार लगाई है।



हाई कोर्ट इस मामले से जुड़ी दो जनहित याचिकाओं, अवमानना याचिका और सरकार की रिट पर आज दोपहर एक साथ सुनवाई करेगा।



कैसे यह बेशकीमती जमीन बनी सरकारी?

1968 से 1981 (अवाप्ति और वापसी):

राजस्थान सरकार ने शुरुआत में बजाज नगर से सांगानेर एयरपोर्ट तक की जमीन अधिग्रहण की थी। लेकिन गृह निर्माण सहकारी समितियों द्वारा कॉलोनियां बसाने के बाद 1981 में इसे अधिग्रहण से वापस ले लिया गया।



1986 (200 फुट चौड़ी संस्थागत पट्टी पर सहमति):

जेडीए ने जब आवासीय योजनाओं की दोबारा प्लानिंग शुरू की, तो 7 मार्च 1986 की बैठक में तय हुआ कि जेएलएन मार्ग के किनारे संस्थागत उपयोग के लिए 200 फुट चौड़ी जमीन की पट्टी छोड़ी जाएगी। जय जवान गृह निर्माण सहकारी समिति ने भी इस पर सहमति दी।



2001-2002 (समिति का धोखा और जेडीए का कब्जा):

जय जवान समिति ने स्कीम नंबर-3 को नियमित कराने के लिए 200 फुट की पट्टी छोड़कर बाकी जमीन सरेंडर कर दी। जेडीए ने जब इस 200 फुट की पट्टी को पूरी तरह सरेंडर करने का नोटिस दिया तो समिति ने सरेंडर डीड पेश नहीं की और इसे व्यावसायिक उपयोग में लेने की जिद पर अड़ी रही। आखिरकार, 17 अप्रैल 2002 को जेडीए ने आदेश जारी कर इस पूरी जमीन को वापस लेकर (Resumption) सरकारी (जेडीए के नाम) घोषित कर दिया।



जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला


आवंटन से लेकर निरस्तीकरण और मुकदमों का खेल

अक्टूबर 2003 (रियायती दर पर आवंटन):

जेडीए के नाम दर्ज हो चुकी इस 23,633 वर्गगज जमीन को सीएम की अध्यक्षता वाली बीडी (ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टमेंट प्रमोशन ) ने ग्रीन फायर हॉस्पिटल को आवंटित कर दी। इस कंपनी को अपोलो हॉस्पिटल्स के साथ मिलकर 200 बेड का मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल बनाना था। जमीन आरक्षित दर की 60 फीसदी कीमत पर आवंटित की। इसकी लीज डीड 1 अक्टूबर 2003 को हुई।



आवंटन की कड़ी शर्तें:

शर्त थी कि अस्पताल के लिए लोन लेने के अलावा जमीन को न तो गिरवी रखा जाएगा, न बेचा जाएगा और न ट्रांसफर किया जाएगा। यदि संस्था बंद होती है, तो जमीन स्वतः जेडीए की हो जाएगी। बोर्ड में सरकारी प्रतिनिधि होना अनिवार्य था।



दिसंबर 2015 (आवंटन रद्द और पैसा वापस):

ग्रीन फायर हॉस्पिटल ने आवंटन की शर्तों का घोर उल्लंघन किया। अस्पताल का निर्माण नहीं हुआ। इसके चलते 24 दिसंबर 2015 को जेडीए ने आवंटन और लीज डीड को स्वतः रद्द कर दिया। कंपनी द्वारा जमा कराई गई राशि में से 25% कटौती करके बाकी पैसा वापस लौटा दिया।



अफसरों और संभागीय आयुक्त की संदिग्ध भूमिका:

इस बीच, जय जवान समिति ने भूमि अवाप्ति को चुनौती दी। दिसंबर 2015 में तत्कालीन संभागीय आयुक्त ने आदेश से जेडीए के 2002 के जमीन वापसी (Resumption) के आदेश को पलट दिया। हालांकि, 22 अप्रैल, 2016 को राजस्व बोर्ड ने संभागीय आयुक्त के इस आदेश पर रोक लगा दी और जमीन पर यथास्थिति बहाल रखी।



जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला


मध्यस्थता की आड़ में साजिश और लोक अदालत का 'फर्जी खेल'

असली खेल 2022 से शुरू हुआ, जब कोर्ट ने इस मामले को सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए मध्यस्थता केंद्र भेजा। यहां जेडीए अफसरों और निजी पक्षकारों की मिलीभगत ने रफ्तार पकड़ी:



25 अगस्त 2023 (बिना मंजूरी सैटलमेंट डीड):

राज्य सरकार या यूडीएच विभाग से कोई कानूनी अनुमति लिए बिना जेडीए के तत्कालीन कमिश्नर और जोन-4 के उपायुक्त ने ग्रीन फायर हॉस्पिटल और रतन प्रभा जैन के साथ मिलकर गुपचुप तरीके से एक सेटलमेंट डीड पर दस्तखत कर दिए।



9 सितंबर 2023 (नेशनल लोक अदालत का विवादित अवार्ड):

समझौते को कोर्ट के सामने पेश होने से पहले ही, निजी पक्षकारों ने इसे 9 सितंबर, 2023 को नेशनल लोक अदालत (बेंच नंबर-4) में रख दिया। जबकि मध्यस्थता केंद्र ने समझौते को संबंधित कोर्ट में पेश करने के लिए रजिस्ट्रार (न्यायिक) को भेज दिया था।



साजिशकर्ताओं को पता था कि कोर्ट में सुनवाई होने पर समझौते में सरकार की मंजूरी नहीं होने पोल खुल जाएगी। इसलिए उन्होंने मामले को लोक अदालत में ले जाने की साजिश रची।



जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला


लोक अदालत में सूचीबद्ध होने का रिकार्ड नहीं

इतने बड़े मामले में जिसमें राज्य सरकार व जेडीए पक्षकार हों, लोक अदालत में भी कोर्ट की मंजूरी से ही राजीनामे से निपटाने के लिए भेजा जाता है।



इसके लिए सभी पक्षकारों की सहमति जरुरी होती है। लोक अदालत में भी अलग-अलग बैंच होती हैं। इन बैंच में रिटायर जज के साथ सीनियर एडवोकेट सुनवाई करते हैं। हर बैंच में पेश होने वाले मुकदमों की एक लिस्ट बनती है।



इस मामले को राजीनामे से निपटाने के लिए ना तो कोर्ट में पक्षकारों के बीच सहमति बनी थी और ना ही कोर्ट ने मामले को लोक अदालत में भेजने की अनुमति दी थी।



इसके बावजूद साजिशकर्ताओं ने मिलीभगत करके 9 सितंबर,2023 को लोक अदालत में सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज सी.के.सोनगरा व सीनियर एडवोकेट जे.के.सिंघी की बैंच में मामले को समझौते के आधार पर अवार्ड करवा लिया।



जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला


लोक अदालत में लिस्टेड था या नहीं !

सरकार के अनुसार यह मामला 9 सितंबर,2023 को हुई लोक अदालत की मुख्य वादसूची में लिस्टेड नहीं है। राजस्थान विधिक सेवा प्राधिकरण ने अभी तक मामले के लिस्टेड होने का कोई रिकार्ड नहीं दिया है। उनके जवाब का इंतजार है।



इस तथाकथित अवार्ड के तहत ग्रीन फायर हॉस्पिटल का रद्द हो चुका आवंटन दोबारा जिंदा हो गया। 23,600 वर्गगज से ज्यादा सरकारी जमीन में से 17,433 वर्गगज जमीन ग्रीन फायर हॉस्पिटल को और 6,200 वर्गगज जमीन जय जवान सहकारी समिति व रतन प्रभा जैन को बांट दी गई।



सरकार की दलील, क्यों अवैध है अवार्ड?

राजस्थान सरकार ने याचिका में इस पूरे घटनाक्रम को सोची-समझी धोखाधड़ी बताते हुए इसे रद्ध करने की मांग की है।



यह जमीन राज्य सरकार की है । समझौते के लिए राज्य सरकार से पूर्व अनुमति लेनी जरुरी है जो कि नहीं ली गई ना ही सूचना दी गई। समझौते के समय न तो सरकार का कोई अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद था और न ही किसी के हस्ताक्षर हैं।



जेडीए अफसरों का क्षेत्राधिकार नहीं:

जेडीए के तत्कालीन कमिश्नर या डिप्टी कमिश्नर के पास इतनी कीमती सरकारी जमीन का सौदा करने या निजी कंपनियों को खैरात में बांटने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था। उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया।



लोक अदालत का क्षेत्राधिकार से बाहर जाना:

लोक अदालत ने बिना यह जांचे कि क्या इस मुकदमे के सभी पक्षकार (विशेषकर मुख्य मालिक राजस्थान सरकार) इस समझौते में शामिल हैं या नहीं, आंखें मूंदकर अवार्ड पास कर दिया। इसलिए यह प्रक्रिया शुरुआत से ही शून्य (Void ab-initio) है।



ग्रीन फायर हॉस्पिटल को जमीन सिर्फ इसलिए मिली थी क्योंकि उसका अपोलो हॉस्पिटल्स के साथ एमओयू (MOU) था। वह एमओयू केवल 18 महीने के लिए वैध था, जो सालों पहले खत्म हो चुका है। अपोलो की भागीदारी के बिना ग्रीन फायर हॉस्पिटल का जमीन पर कोई हक ही नहीं बचता।



जेएलएन मार्ग पर सरकारी जमीन हड़पने का घोटाला


तथ्यों को छुपाया और जालसाजी की

दोनों निजी पक्षकारों ने लोक अदालत में लिखकर दिया कि इस मामले के अलावा कोई अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित नहीं है। जबकि जेडीए और तहसीलदार ने संभागीय आयुक्त के आदेश के खिलाफ पहले से ही राजस्व बोर्ड में अपील कर रखी थी।



रेवेन्यू बोर्ड का स्टे आर्डर प्रभावी था। लोक अदालत के आदेश के तुरंत बाद, न्यायिक जांच से बचने के लिए निजी पक्षों ने जेडीए ट्रिब्यूनल से अपने पुराने मामले जल्दबाजी में वापस ले लिए।



सरकार को कैसे लगी भनक और अब आगे क्या?

इस घोटाले को अंजाम देने के बाद किसी भी पक्षकार ने सरकार से संपर्क नहीं किया। सरकार पूरी तरह बेखबर थी। खेल तब उजागर हुआ जब ग्रीन फायर हॉस्पिटल ने इस लोक अदालत अवार्ड की पालना करवाने के लिए हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी।



जब 7 मई, 2026 को सरकार को कोर्ट का नोटिस मिला तब जाकर शासन की नींद खुली और इस अरबों रुपये की जमीन को हड़पने की साजिश का पर्दाफाश हुआ।



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कोर्ट पर टिकी हैं निगाहें

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने 7 जुलाई को महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद और जेडीसी सिद्वार्थ महाजन को सुनने के बाद सख्त रुख अपनाया।



कोर्ट ने जमीन के आवंटन और समझौते से जुड़ी सभी मूल फाइलों और दस्तावेजों को रजिस्ट्री की सुरक्षित कस्टडी में रखने के निर्देश दिए हैं। सोमवार दोपहर 2:00 बजे होने वाली इस सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं जहां इस बेशकीमती सरकारी जमीन का भविष्य तय होगा।



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