राजस्थान में ट्रेनों के नहीं होंगे एक्सीडेंट, रेलवे ने किया सफल ट्रायल

Ashish Bhardwaj | Sept 23, 2026, 16:47 IST
कवच सिस्टम
राजस्थान में जयपुर मंडल के कानोता-बांदीकुई रेलखंड पर स्वदेशी कवच सिस्टम का अंतिम सुरक्षा ट्रायल सफल रहा। यह उत्तर पश्चिम रेलवे का पहला कवच-सुरक्षित रेलखंड बनने जा रहा है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • जयपुर-कानोता-बांदीकुई रेलखंड पर कवच सिस्टम का ट्रायल सफल।
  • 67 किमी रूट पर रेलवे ने लगाई हाईटेक सुरक्षा व्यवस्था।
  • रेड सिग्नल और ओवरस्पीड में खुद रोक देगा ट्रेन।
  • उत्तर पश्चिम रेलवे का पहला कवच-सुरक्षित रेलखंड बनने की तैयारी।
  • दिल्ली-जयपुर-अहमदाबाद रूट पर बढ़ेगी यात्रियों की सुरक्षा।

Jaipur: राजस्थान में रेल यात्रियों के सुरक्षित और आधुनिक सफर की दिशा में उत्तर पश्चिम रेलवे यानी एनडब्ल्यूआर ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जयपुर रेल मंडल के अंतर्गत आने वाले 67 किलोमीटर लंबे कानोता-बांदीकुई रेलमार्ग पर भारतीय रेलवे के स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन यानी एटीपी सिस्टम कवच का अंतिम सेफ्टी एक्सेप्टेंस ट्रायल यानी एसएटी सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है।



67 किलोमीटर रूट, 7 स्टेशन हुए हाईटेक

इस 67 किमी लंबे रेलखंड के कुल 7 प्रमुख ब्लॉक स्टेशनों पर अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रेडियो टावर और आरएफआईडी तकनीक स्थापित कर अंतिम परीक्षण पूरा किया गया है। इसके बाद यह ट्रैक उत्तर पश्चिम रेलवे का सबसे पहला कवच-सुरक्षित रेलखंड बनने की दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। जयपुर और दौसा जिले के बीच पड़ने वाले इस अहम रेलखंड पर ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए रेलवे ने व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचा तैयार किया है। पटरियों के बीच खास आरएफआईडी टैग लगाए गए हैं, जो ट्रेन के इंजन के नीचे लगे सेंसर के संपर्क में आते ही ट्रेन की सटीक लोकेशन, स्पीड और सामने वाले सिग्नल की जानकारी रीयल टाइम में लोको पायलट के केबिन डिस्प्ले पर भेजते हैं।



ट्रायल में खुद रुक गई ट्रेन

अंतिम फील्ड ट्रायल के दौरान रेलवे इंजीनियरों और सेफ्टी एक्सपर्ट्स की मौजूदगी में कई काल्पनिक और संवेदनशील आपातकालीन स्थितियां तैयार की गईं। इनमें ट्रेन का अचानक रेड सिग्नल पार करना, एक ही ट्रैक पर आमने-सामने दो ट्रेनों का आ जाना और तय गति सीमा से ज्यादा गाड़ी चलाना जैसी स्थितियां शामिल थीं। इन सभी स्थितियों में जब लोको पायलट की तरफ से समय पर मैनुअल ब्रेक नहीं लगाए गए, तो इंजन में लगे कवच सिस्टम ने खुद ही नियंत्रण संभालते हुए आपातकालीन ऑटोमैटिक ब्रेक लगा दिए और ट्रेन को दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही पूरी तरह सुरक्षित रोक दिया। मुख्य संरक्षा आयुक्त से औपचारिक अंतिम सुरक्षा मंजूरी मिलते ही इस रेलखंड पर स्वचालित ट्रेन संचालन शुरू कर दिया जाएगा। अगर सामने का सिग्नल लाल है और लोको पायलट किसी वजह से ट्रेन की गति धीमी नहीं कर पाता, तो 800 से 1000 मीटर पहले ही कवच प्रणाली सक्रिय हो जाती है।



2600 करोड़ की लागत से सुरक्षित होगा पूरा नेटवर्क

उत्तर पश्चिम रेलवे के पूरे नेटवर्क को हादसों से मुक्त बनाने के लिए भारतीय रेलवे 2,600 करोड़ रुपए का बड़ा मेगा प्रोजेक्ट चला रहा है। इस दूरगामी योजना के तहत राजस्थान और आसपास के राज्यों में फैले उत्तर पश्चिम रेलवे के करीब 5,561 किलोमीटर लंबे पूरे रेल नेटवर्क को कवच तकनीक से लैस करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा क्षेत्र में निर्माणाधीन 281 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइनों के प्रोजेक्ट में शुरुआती चरण से ही कवच प्रणाली को अनिवार्य रूप से शामिल किया जा रहा है।



रेल हादसों पर लगेगा डिजिटल ब्रेक

भारतीय रेलवे के इतिहास में होने वाले ज्यादातर बड़े रेल हादसे अक्सर लोको पायलट द्वारा सिग्नल नजरअंदाज करने यानी एसपीएडी या घने कोहरे के चलते सिग्नल न दिखने की वजह से होते हैं। कवच प्रणाली इस मानवीय भूल की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर देती है। सर्दियों में जब राजस्थान के जयपुर, अलवर और बांदीकुई इलाकों में घना कोहरा छा जाता है, तब लोको पायलटों को ट्रैक का सिग्नल देखने में भारी दिक्कत होती है। कवच सिस्टम के लोको-केबिन डिस्प्ले यूनिट यानी डीएमआई की मदद से ट्रेन चालक को अपने केबिन के अंदर ही अगले सिग्नल का रंग और दूरी साफ नजर आएगी। साथ ही अगर दो ट्रेनें गलती से एक ही लाइन पर आमने-सामने आ जाएं, तो यह ऑटोमैटिक तकनीक दोनों ट्रेनों में एक साथ ब्रेक लगाकर उन्हें उचित दूरी पर रोक देगी।



दिल्ली-जयपुर-अहमदाबाद रूट को मिलेगा फायदा

कानोता-बांदीकुई रेलखंड का कवच-सुरक्षित होना सिर्फ जयपुर मंडल ही नहीं, बल्कि दिल्ली-जयपुर-अहमदाबाद जैसे देश के सबसे व्यस्त रेल कॉरिडोर के लिए भी एक मील का पत्थर साबित होगा। बांदीकुई एक मुख्य रेलवे जंक्शन है, जहां से दिल्ली, आगरा और जयपुर की दिशा में रोजाना दर्जनों प्रीमियम ट्रेनें जैसे वंदे भारत एक्सप्रेस, शताब्दी एक्सप्रेस और सुपरफास्ट मेल ट्रेनें गुजरती हैं। इस 67 किमी लंबे रूट पर कवच सिस्टम पूरी तरह सक्रिय होने से ट्रेनों की सुरक्षा और मजबूत होगी, साथ ही खराब मौसम में भी ट्रेनें अपनी तय अधिकतम गति सीमा यानी 130 से 160 किलोमीटर प्रति घंटे पर बिना किसी डर के सुरक्षित दौड़ सकेंगी। इससे ट्रेनों की देरी में कमी आएगी और यात्री समय पर अपनी मंजिल तक पहुंच सकेंगे।



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