42 साल बाद केवलादेव में फिर 'छल्ला अभियान', रिकॉर्ड होगी प्रवासी पक्षियों की उड़ान
News In Short
- केवलादेव नेशनल पार्क में प्रवासी पक्षियों को 42 साल बाद फिर लगेंगे छल्ले।
- नेशनल पार्क घोषित होने के बाद केवलादेव में यह काम रोक दिया था।
- छल्ला लगाने से प्रवासी पक्षियों की उड़ान का मिल सकेगा रिकॉर्ड।
- इस बार इंडियन स्किमर पक्षियों पर भी रिंग लगाने की तैयारी।
- इस अभियान यूपी के प्रयागराज, नरोरा और बिजनौर में भी चलेगा।
News In Detail
Bharatpur: राजस्थान के विश्व प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में 42 साल के लंबे इंतजार के बाद फिर 'बर्ड रिंगिंग' यानी 'छल्ला अभियान' का आगाज हो गया है। अब चंबल क्षेत्र में प्रजनन करने वाले इंडियन स्किमर पक्षियों पर भी रिंग लगाने की तैयारी है। यह अभियान न केवल पक्षियों के मार्ग की जानकारी देगा, बल्कि बदलते पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का इन बेजुबान प्रवासियों पर क्या असर पड़ रहा है, इसे समझने में भी मील का पत्थर साबित होगा
रिंगिंग प्रोजेक्ट से पक्षियों की उड़ान
वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) ने हाथ मिलाकर इस प्रोजेक्ट की कमान संभाली है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रवासी पक्षियों के प्रवास मार्ग, उनकी उड़ान की दूरी और उनके पसंदीदा ठिकानों की सटीक मॉनिटरिंग करना है।
1960-1970 के दशक में केवलादेव में यह अभियान नियमित रूप से चलता था। वर्ष 1984 में यह अभयारण्य नेशनल पार्क घोषित हुआ था। तब वन विभाग की आपत्तियों के बाद इस वैज्ञानिक अध्ययन को रोक दिया गया था। ऐसे में बीएनएचएस के विशेषज्ञों को अन्यत्र काम करना पड़ा। अब 42 साल बाद पुरानी कड़ियों को जोड़ने की कवायद फिर से शुरू हुई है।
राजस्थान से उत्तर प्रदेश तक का सफर
केवलादेव में सफलता के बाद इस अभियान को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, नरोरा और बिजनौर में भी आगे बढ़ाया जाएगा। पहले इसे सांभर झील में शुरू किया गया था, लेकिन वहां के खारे पानी के कारण तकनीक में बदलाव की जरूरत महसूस हुई। अब चंबल क्षेत्र में प्रजनन करने वाले 'इंडियन स्किमर' पक्षियों पर भी रिंग लगाने की तैयारी है।
वह जादूगर, जिसने अमेरिकी वैज्ञानिकों को चौंकाया
इस अभियान का जिक्र 83 साल के अली हुसैन के जिक्र के बिना अधूरी है। बिहार के बेगूसराय के रहने वाले अली हुसैन ने महज 17 साल की उम्र में महान पक्षी विज्ञानी सलीम अली के सानिध्य में पक्षियों को बिना नुकसान पहुँचाए पकड़ने की कला सीखी थी।
वे पक्षियों को पकड़ने के लिए केवल धागे के फंदे और नीम की गोंद जैसे पारंपरिक संसाधनों का उपयोग करते थे। उनकी इसी विलक्षण कला को सीखने के लिए अमेरिका के वन्यजीव विशेषज्ञों ने उन्हें विशेष तौर पर बुलाया था। हुसैन के इस हुनर को आज की पीढ़ी के गाइड और विशेषज्ञ भी गुरु-मंत्र की तरह सीख रहे हैं।
कैसे होती है पक्षियों की पहचान
यह प्रक्रिया सुनने में जितनी सरल लगती है, उतनी ही संवेदनशील है। पक्षियों को बेहद सावधानी से पकड़कर उनका वजन लिया जाता है, उनके पंखों की लंबाई मापी जाती है और उनके लिंग की पहचान की जाती है। इसके बाद उनके पंजों में एल्यूमीनियम या प्लास्टिक की हल्की अंगूठी (रिंग) पहनाई जाती है।
इन छल्लों पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विशिष्ट अंक दर्ज होते हैं। जब ये पक्षी सात समंदर पार किसी दूसरे देश में पाए जाते हैं, तो वहां के वैज्ञानिक इन नंबरों के जरिए यह जान पाते हैं कि यह पक्षी कहां से और कितने समय में यहां पहुंचा है।
बीते दौर के कुछ हैरतअंगेज आंकड़े
अतीत में हुए अध्ययनों ने साबित किया है कि ये छोटे-छोटे परिंदे कितनी अदम्य शक्ति के मालिक हैं।
पिनटेल (1966-67): मात्र 102 दिन में 2,380 किलोमीटर की दूरी तय कर करालकल्पासकाया पहुँचा।
विजन (1967-68): इसने 125 दिन में 3,875 किलोमीटर का सफर तय कर इरकुत्स्क की दूरी नापी।
गार्गनी (1962): 136 दिन के भीतर यह नन्हा पक्षी रूस के चेर्नोबिल क्षेत्र तक जा पहुंचा था।
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