किशनगढ़ का फेमस डंपिंग यार्ड सेहत के लिए हानिकारक, शोध से हुआ खुलासा

Ashish Bhardwaj | Jul 16, 2026, 11:43 IST
फेमस डंपिंग यार्ड
केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध में खुलासा, राजस्थान के किशनगढ़ में मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड से हवा, मिट्टी, भूजल और मानवीय सेहत पर गंभीर असर, पीएम 2.5 राष्ट्रीय मानक से आठ गुना अधिक।

समझें क्या है पूरा मामला

  • किशनगढ़ मार्बल मंडी में मार्बल स्लरी डंपिंग से हवा, मिट्टी और भूजल प्रदूषण का खतरा बढ़ा है।
  • राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध में स्लरी में भारी धातु और जहरीले तत्व मिलने का खुलासा हुआ है।
  • डंपिंग यार्ड के पास पीएम 2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानक से करीब आठ गुना ज्यादा पाया गया।
  • मार्बल उद्योग से जुड़े 70% श्रमिकों में सांस संबंधी परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं मिलीं।
  • शोध ने चेतावनी दी है कि स्लरी डंपिंग जारी रही तो पर्यावरण और लोगों की सेहत पर गंभीर असर पड़ेगा।

किशनगढ़ मार्बल मंडी में पर्यावरण को लेकर गंभीर खतरा सामने आया है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध में यह खुलासा हुआ है। मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड हवा, मिट्टी और भूजल तीनों को प्रभावित कर रहा है। यह शोध एल्सेवियर की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। सबसे ज्यादा असर मार्बल उद्योग से जुड़े श्रमिकों पर पड़ रहा है।



एशिया की सबसे बड़ी मार्बल मंडी किशनगढ़ अब बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रही है। यहां सालों से खुले में मार्बल स्लरी डाली जा रही है। अब यही स्लरी हवा, मिट्टी, भूजल और लोगों की सेहत के लिए खतरा बन चुकी है।



नया और अलग शोध क्यों

अब तक हुए अध्ययन ज्यादातर हवा या पानी पर अलग-अलग केंद्रित रहे। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध में पहली बार पूरे पर्यावरणीय तंत्र को एक साथ देखा गया। पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया। टीम ने 15 दिनों तक डंपिंग यार्ड में गहन अध्ययन किया।



अध्ययन में एक्स-रे डिफ्रेक्शन, एटॉमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोस्कोपी, जीआईएस (GIS – Geographic Information System) और रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल हुआ। यह शोध सोमवार, 13 जुलाई 2026 को जर्नल ऑफ हैज़र्डस मैटेरियल्स एडवांसेज में प्रकाशित हुआ। यह पत्रिका एल्सेवियर द्वारा प्रकाशित की जाती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मानी जाती है।



कैसे हुई जांच

शोधकर्ताओं ने डंपिंग यार्ड और आसपास के इलाकों से 26 मिट्टी के नमूने लिए। इसके साथ ही 19 भूजल नमूनों की भी जांच की गई। मार्बल स्लरी के नमूने अलग से एकत्र किए गए। हवा की गुणवत्ता लगातार 45 दिनों तक परखी गई। टीम ने 2017 से 2022 तक के सैटेलाइट डेटा से भूमि उपयोग का विश्लेषण भी किया। साथ ही 95 स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य सर्वे भी किया गया।



मिट्टी और भूजल में जहर

जांच में मार्बल स्लरी के भीतर लेड सिलिकेट और कॉपर सल्फेट जैसे भारी धातु यौगिक पाए गए। डंपिंग यार्ड के आसपास मिट्टी में तांबा और जिंक की मात्रा अधिक मिली। यार्ड से दूरी बढ़ने पर इन धातुओं की सांद्रता घटती गई।



भूजल की स्थिति और भी चिंताजनक पाई गई। टीडीएस (TDS – Total Dissolved Solids) 3573 पीपीएम दर्ज हुआ, जो स्वीकृत सीमा से काफी अधिक है। कुल कठोरता 1010 मिलीग्राम प्रति लीटर मिली। लवणता, क्लोराइड, फ्लोराइड और आयरन भी तय मानकों से ज्यादा पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से किडनी, हड्डियों और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।



हवा में धूल का कहर

रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष हवा की गुणवत्ता को लेकर सामने आया। डंपिंग यार्ड के सबसे नजदीकी इलाके में पीएम 2.5 (PM2.5 – Particulate Matter 2.5) का औसत स्तर 465 से 487 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज हुआ। यह राष्ट्रीय मानक से करीब आठ गुना अधिक है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सीमा से 20 से 50 गुना ज्यादा भी है।



शोधार्थी बसंत बिजारणियां ने बताया, "डंपिंग यार्ड के सबसे निकट वाले क्षेत्र में पीएम 2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानक से लगभग आठ गुना अधिक दर्ज किया गया।" (स्रोत: शोध टीम, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय)



श्रमिकों की सेहत खतरे में

स्वास्थ्य सर्वे में साफ दिखा कि मार्बल उद्योग से जुड़े मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हैं। सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत श्रमिकों को सांस संबंधी परेशानी बताई गई। 84 प्रतिशत श्रमिकों ने गले की गंभीर बीमारी की शिकायत की। 46 प्रतिशत को फेफड़ों की समस्या और 50 प्रतिशत को त्वचा रोग सामने आए। स्थानीय निवासियों में भी आधे से अधिक लोगों ने सांस लेने में तकलीफ बताई।



खेती घटी, उद्योग बढ़ा

सैटेलाइट आधारित विश्लेषण में एक और चिंताजनक रुझान सामने आया। वर्ष 2017 से 2022 के बीच डंपिंग यार्ड के आसपास कृषि भूमि लगातार घटती गई। इसी दौरान औद्योगिक और निर्मित क्षेत्र तेजी से बढ़ा। निर्मित क्षेत्र 54.58 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 74.72 वर्ग किलोमीटर हो गया। कृषि भूमि में करीब 2.58 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। वनस्पति लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई है।



शोधकर्ताओं का कहना है कि नक्शे में डंपिंग क्षेत्र भले छोटा दिखे, लेकिन प्रदूषण कम नहीं हुआ है। स्लरी अब आसपास के बड़े इलाकों में फैलकर नुकसान पहुंचा रही है।



आगे क्या खतरा है

शोध में साफ चेतावनी दी गई है। अगर वर्तमान तरीके से खुले में स्लरी डंपिंग जारी रहा, तो हालात और बिगड़ेंगे। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र कृषि उत्पादकता, पेयजल उपलब्धता, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। रिपोर्ट ने इसे व्यावसायिक स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट बताया है।



FAQ

  1. किशनगढ़ में मार्बल स्लरी से सबसे ज्यादा खतरा किसे है?
    सबसे ज्यादा खतरा मार्बल उद्योग से जुड़े श्रमिकों को है। सर्वे में 70 प्रतिशत श्रमिकों को सांस की और 84 प्रतिशत को गले की बीमारी मिली। स्थानीय निवासी भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।
  2. किशनगढ़ की हवा कितनी प्रदूषित है?
    डंपिंग यार्ड के पास पीएम 2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानक से करीब आठ गुना अधिक मिला। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सीमा से 20 से 50 गुना ज्यादा है। यह स्तर स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।
  3. भूजल पर मार्बल स्लरी का क्या असर पड़ा है?
    भूजल में टीडीएस, कठोरता, फ्लोराइड और आयरन तय सीमा से काफी ज्यादा पाए गए। लंबे समय तक इस्तेमाल से किडनी और हड्डियों की बीमारी का खतरा है। इससे पेयजल की गुणवत्ता सीधे प्रभावित हो रही है।

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