मेवाड़ राजपरिवार संपत्ति विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने दी वसीयत के निरीक्षण की अनुमति
News In Short
- दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद सिंह मेवाड़ की वसीयत के निरीक्षण की दी अनुमति।
- अगली सुनवाई 19 मई को, पद्मजा परमार ने वसीयत को चुनौती दी है।
- निरीक्षण के दौरान वसीयत के कोई भी फोटो लेने पर लगाई रोक।
- वकील फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ 15 मई को करेंगे वसीयत का निरीक्षण।
- इससे पूर्व कोर्ट ने लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन की याचिका खारिज की थी।
News In Detail
Udaipur: मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार की अरबों रुपये की संपत्ति को लेकर चल रहे कानूनी संघर्ष में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश दिया है। अदालत ने मेवाड़ राजघराना केदिवंगत अरविंद सिंह मेवाड़ की वसीयत के निरीक्षण की अनुमति दे दी है, हालांकि निरीक्षण के दौरान वसीयत की कोई भी तस्वीर लेने पर सख्त रोक लगा दी गई है।
यह आदेश उस याचिका पर आया है जिसमें अरविंद सिंह मेवाड़ की बेटी पद्मजा कुमारी परमार ने वसीयत को चुनौती दी थी। उन्होंने वसीयत पर किए गए हस्ताक्षरों पर सवाल उठाते हुए विशेषज्ञ फोरेंसिक जांच की मांग की थी। कोर्ट ने अब वकीलों को फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ मिलकर मूल वसीयत का निरीक्षण करने की अनुमति दी है।
15 मई को होगा निरीक्षण
अदालत के निर्देशों के अनुसार, वसीयत का निरीक्षण आगामी 15 मई 2026 को किया जाएगा। निरीक्षण के दौरान किसी भी प्रकार की तस्वीर या प्रति नहीं ली जाएगी, जिससे वसीयत की गोपनीयता और मौलिकता बनी रहे। मामले में अगली सुनवाई 19 मई को निर्धारित की गई है। इस बीच, दोनों पक्षों के वकील निरीक्षण प्रक्रिया को लेकर अपनी तैयारी में जुट गए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
इस विवाद की नींव 16 मार्च 2025 को रखी गई, जब मेवाड़ राजघराने के मुखिया अरविंद सिंह मेवाड़ का निधन हो गया। उनके निधन के बाद संपत्ति को लेकर परिवार के सदस्यों के बीच कानूनी जंग शुरू हो गई। विवाद का मुख्य केंद्र फरवरी 2025 में बनाई गई वह वसीयत बनी, जिसमें अरविंद सिंह ने अपनी सभी स्व-अर्जित संपत्तियां अपने बेटे लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के नाम कर दी थीं।
इन संपत्तियों में उदयपुर का विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक सिटी पैलेस और प्रतिष्ठित एचआरएच (HRH) ग्रुप ऑफ होटल्स शामिल हैं, जिनकी कीमत अरबों रुपये आंकी जाती है। जबकि पद्मजा परमार को इस वसीयत में कुछ भी नहीं दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने इसे कानूनी चुनौती दी।
पद्मजा परमार का दावा और लक्ष्यराज का पक्ष
पद्मजा परमार का आरोप है कि वसीयत बनाते समय उनके पिता अरविंद सिंह मेवाड़ स्वस्थ मानसिक स्थिति में नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि वसीयत पर किए गए हस्ताक्षर संदिग्ध हैं और इसलिए फोरेंसिक जांच की जानी चाहिए। उनका तर्क है कि चूंकि वसीयत संदिग्ध है, इसलिए संपत्ति का बंटवारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत होना चाहिए, जिसमें बेटी को भी अधिकार मिलता है।
वहीं दूसरी ओर, लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के वकीलों ने पद्मजा परमार के सभी आरोपों को आधारहीन बताया है। उनका कहना है कि वसीयत पूरी तरह से वैध है और यह अरविंद सिंह की अंतिम इच्छा थी कि उनकी सारी संपत्ति उनके पुत्र लक्ष्यराज को मिले।
पिछला फैसला लक्ष्यराज के पक्ष में
गौरतलब है कि इससे पूर्व 17 मार्च 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने एक अहम फैसला सुनाया था। अदालत ने पद्मजा परमार द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने अपने पिता की संपत्ति के लिए लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (प्रशासन पत्र) जारी करने की मांग की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि चूंकि वसीयत की वैधता से जुड़ा मूल विवाद पहले से ही विचाराधीन है, ऐसे में बिना वसीयत (इंटेस्टेसी) के आधार पर प्रशासन पत्र जारी करना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा। उस समय इस फैसले को लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के लिए एक बड़ी कानूनी और नैतिक जीत माना गया था।
आगे क्या?
अब 15 मई को होने वाला वसीयत का निरीक्षण इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यदि फोरेंसिक जांच में वसीयत को प्रामाणिक पाया जाता है, तो यह लक्ष्यराज सिंह के पक्ष में मजबूत साक्ष्य बन सकता है। वहीं यदि संदेह की पुष्टि होती है, तो पद्मजा परमार को अपनी दावेदारी मजबूत करने का अवसर मिलेगा। सबकी निगाहें अब 19 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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