बाल विवाह रोकने की जिम्मेदारी प्रिंसिपल-पटवारी पर, शिक्षक बोले- पढ़ाई प्रभावित होगी
बाल विवाह रोकने की जिम्मेदारी प्रिंसिपल-पटवारी पर, शिक्षक बोले- पढ़ाई प्रभावित होगी
बाल विवाह रोकने के लिए अब राजस्थान में स्कूलों के प्रधानाचार्यों, ग्राम विकास अधिकारियों और पटवारियों की भूमिका बढ़ा दी गई है। प्रदेश में इन अधिकारियों को उनके तय क्षेत्र में बाल विवाह की रोकथाम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। शिक्षा विभाग ने इस व्यवस्था को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। लेकिन फैसले पर शिक्षक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई के अलावा प्रशासनिक जिम्मेदारियां बढ़ने से स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
माध्यमिक शिक्षा निदेशक ललित कुमार की ओर से जारी निर्देशों में अधिकारियों के कार्यक्षेत्र तय करने और व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों के प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक अपनी ग्राम पंचायत में, जबकि शहरी क्षेत्रों में संबंधित नगरपालिका वार्ड में बाल विवाह की निगरानी करेंगे। ग्राम विकास अधिकारी पूरी ग्राम पंचायत और पटवारी अपने पटवार मंडल में जिम्मेदारी निभाएंगे।
गांव से शहर तक तय की गई जिम्मेदारी
सरकार का मकसद बाल विवाह की सूचना मिलने पर समय रहते कार्रवाई करना है। कई बार प्रशासन को शादी की जानकारी तब मिलती है, जब तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी होती हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर मौजूद अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
स्कूलों के प्रधानाचार्य और प्रधानाध्यापक विद्यार्थियों की उम्र, पढ़ाई छूटने की आशंका और कम उम्र में शादी की जानकारी मिलने पर संबंधित अधिकारियों को सूचना दे सकते हैं। ग्राम विकास अधिकारी पंचायत स्तर पर समन्वय करेंगे। पटवारी अपने क्षेत्र से जुड़ी जानकारी जुटाने और कार्रवाई में मदद करेंगे।
राजस्थान सरकार की 24 अप्रैल 2026 की अधिसूचना में इन पदों पर कार्यरत अधिकारियों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त करने का उल्लेख है। अधिसूचना में उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के कुछ प्रावधानों के तहत संज्ञेय अपराधों की जांच की शक्तियां देने की बात भी कही गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2024 को *सोसायटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया* मामले में बाल विवाह रोकने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने रोकथाम, जागरूकता, प्रशासनिक समन्वय और प्रभावी कानूनी कार्रवाई पर जोर दिया था।
हालांकि, इस फैसले का एक अहम पहलू भी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी के रूप में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जिनके पास इस काम के अलावा दूसरी जिम्मेदारियां न हों। अदालत ने राज्यों को प्रत्येक जिले में समर्पित अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया था।
ऐसे में राजस्थान में पहले से दूसरी जिम्मेदारियां निभा रहे प्रधानाचार्यों, ग्राम विकास अधिकारियों और पटवारियों को यह काम सौंपने की व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। इस संबंध में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और मौजूदा व्यवस्था के बीच तालमेल को लेकर कोई अलग स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं है।
शिक्षक संगठनों ने जताई नाराजगी
नई जिम्मेदारी का शिक्षक संगठनों ने विरोध किया है। प्राथमिक अध्यापक संघ के प्रदेश सभाध्यक्ष खेमराज मीणा का कहना है कि शिक्षक विद्यार्थियों के हितों के लिए समर्पित हैं, लेकिन लगातार बढ़ते प्रशासनिक काम से पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा है।
उनका कहना है कि बाल विवाह रोकना सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी है। लेकिन प्रधानाचार्यों और शिक्षकों पर निगरानी, जांच और कार्रवाई से जुड़े अतिरिक्त काम डालने से उनका मूल शिक्षण कार्य प्रभावित हो सकता है। उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
शिक्षक संगठनों के मुताबिक, स्कूलों में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों की उपस्थिति, परीक्षाओं, रिकॉर्ड संधारण और विभागीय योजनाओं से जुड़े काम पहले से ही होते हैं। ऐसे में नई जिम्मेदारी निभाने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण, साफ दिशा-निर्देश और प्रशासनिक सहयोग जरूरी है। उनके अनुसार, इन व्यवस्थाओं के बिना शिक्षकों के सामने व्यावहारिक समस्याएं बढ़ सकती हैं।
जिम्मेदारी के साथ संसाधन भी जरूरी
बाल विवाह रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी और समय पर सूचना मिलना जरूरी है। लेकिन इस काम को प्रभावी बनाने के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट होना भी उतना ही अहम है। स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित किए बिना बाल विवाह की सूचना मिलने पर कार्रवाई कैसे होगी, यह व्यवस्था का महत्वपूर्ण सवाल है।
अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ बाल विवाह के मामलों को समय रहते रोकना है, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप जिम्मेदार अधिकारियों की नियुक्ति और व्यवस्था को स्पष्ट करना है। शिक्षक संगठनों की आपत्तियों और अतिरिक्त काम के बोझ पर भी ध्यान देना होगा। व्यवस्था तभी असरदार होगी, जब जिम्मेदारी तय करने के साथ पर्याप्त संसाधन और व्यावहारिक सहयोग भी मिले।