सरकार नहीं बचा पा रही देवी-देवताओं की जमीनें, बड़े संकट में है ओरण भूमि, जानिए पूरा मामला

The Sootr | Apr 24, 2026, 14:53 IST
Photograph: (the sootr)
पश्चिम राजस्थान में ओरण भूमि पर संकट मंडरा रहा है। देवी—देवताओं के नाम संरक्षित इस सामुदायिक भूमि को बचाने के लिए लोग सड़कों पर है। सवाल यही है कि क्या सरकार पुरखों की विरासत को बचा पाएगी।

योगेंद्र योगी@जयपुर



राजस्थान की तपती रेतीली धरती पर जहां दूर-दूर तक जीवन का संघर्ष नजर आता है, वहां गांव-गांव में ओरण भूमि किसी हरियाली के द्वीप जैसे हैं। इस ओरण भूमि पर आज संकट मंडरा रहा है। पश्चिम राजस्थान से लेकर जयपुर के सत्ता गलियारों तक आज एक ही गूंज है-ओरण बचाओ।



यह गूंज उन लाखों लोगों की है, जो अपनी पहचान और अपने देवताओं की भूमि को बचाने के लिए सड़कों पर हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि ओरण भूमि को सरकार बचा नहीं पा रही है। ओरण भूमि का एक बड़ा हिस्सा अभी भी राजस्व रिकॉर्ड में सही ढंग से दर्ज नहीं है। ओरण भूमि पर कब्जा बड़ा मुद्दा बन गया है। सरकारी फाइलों में इन जमीनों को बंजर बता कर सोलर कंपनियों को आवंटित किया जा रहा है।



​क्या है ओरण भूमि?

ओरण वह भूमि है, जिसे सदियों पहले स्थानीय समुदायों ने अपने लोक देवताओं और देवियों के नाम पर छोड़ दिया था। यह एक अलिखित कानून था। इस भूमि पर उगे पेड़ों पर न कभी कुल्हाड़ी चली और न ही यहां कभी वन्यजीवों का शिकार हुआ। लोग यहां से सूखी लकड़ी तक नहीं ले जाते थे। यह परंपरा धार्मिक संयम का सबसे बड़ा उदाहरण है।



रेगिस्तान के कठिन मौसम में ओरण ही वह जगह है, जो पशुओं को चारा और पक्षियों को आसरा देती है। लेकिन आज आस्था की इसी भूमि को बचाना मुश्किल हो रहा है। विडंबना देखिए, जो सरकार संस्कृति बचाने की बात करती है, वही आज अदालतों में कठघरे में खड़ी है।



​संकट का मुख्य कारण: राजस्व रिकॉर्ड की बाजीगरी

ओरण भूमि पर मंडरा रहे संकट की जड़ें सरकारी कागजों में छिपी हैं। ओरण भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी राजस्व रिकॉर्ड में सही ढंग से दर्ज नहीं है। सरकारी फाइलों में बहुत सारी जमीनों को बंजर लिख दिया गया है। चूंकि ये जमीनें रिकॉर्ड में बंजर हैं, इसलिए सरकार इन्हें आसानी से सोलर कंपनियों को आवंटित कर पा रही है।



ओरण को अलग-अलग इलाकों में देवरा, मालवन, देवराई, रखत बणी, देव घाट, मंदिर वन और बाग जैसे नामों से जाना जाता है। रिकॉर्ड में इन नामों की स्पष्टता न होने से अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं।



कानूनी कवच बनाम सरकारी उदासीनता

​राजस्थान काश्तकारी अधिनियम (1955) और राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम (1956) बहुत स्पष्ट हैं। इनके तहत चरागाहों और जल स्रोतों के जलग्रहण क्षेत्रों का उपयोग औद्योगिक कामों के लिए नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने भी समय-समय पर इस नियम को पुख्ता किया है। इसके बावजूद ओरण को बंजर बताकर आवंटित करने का खेल जारी है।



​राजस्थान सौर ऊर्जा के मामले में देश में पहले पायदान पर है। इसकी स्थापित क्षमता 22,860 मेगावाट से अधिक है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक 90 गीगावाट सौर ऊर्जा पैदा करना है। यह लक्ष्य सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसकी कीमत ओरण भूमि चुका रही है।


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अकेले जैसलमेर जिले में लगभग 5.8 लाख हेक्टेयर ओरण भूमि को सरकारी रिकॉर्ड में बंजर दर्ज किया गया है। साल 2023 से 2025 के बीच करीब 44,247 हेक्टेयर जमीन सोलर पार्कों के लिए दी गई। इसमें ओरण का बड़ा हिस्सा शामिल है।



​ग्रामीणों का संघर्ष

विकास और विरासत की यह लड़ाई अब अदालतों तक पहुंच चुकी है। नेदान गांव में 2018 में अडानी समूह की 600 मेगावाट की परियोजना के कारण ग्रामीणों का ओरण तक पहुंचना मुश्किल हो गया था। राजस्थान हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए जमीन का आवंटन ही रद्द कर दिया। पिछले साल स्थानीय लोगों ने इतना जबरदस्त विरोध किया कि अडानी समूह को 205.3 हेक्टेयर ओरण भूमि वापस लौटानी पड़ी।



​ग्रामीणों का तर्क सीधा और सच्चा है। वे कहते हैं कि सोलर पार्क केवल कुछ कारोबारियों की जेब भरते हैं। स्थानीय लोगों को वहां केवल गार्ड या पैनल साफ करने की मामूली नौकरियां मिलती हैं। जबकि पशुपालन उन्हें पीढ़ियों से आत्मनिर्भर बनाए हुए है।



सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर ओरण

ओरण के संरक्षण का मुद्दा अब देश की सबसे बड़ी अदालत में है। विधि सेतु फाउंडेशन ने इस मामले में याचिका दायर की है। इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ करेगी। याचिका में मांग की गई है कि ओरण को केवल 'डीम्ड फॉरेस्ट' न माना जाए। इसे भूमि-आधारित धर्म का हिस्सा माना जाए।



फाउंडेशन की मांग है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत इसे धार्मिक संरक्षण मिले। ग्रामीण समुदायों की आस्था पेड़ों और शिकार पर प्रतिबंध से जुड़ी है, जिसे धार्मिक संयम का दर्जा मिलना चाहिए।



सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

साल 2005 में ही सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने ओरण की मैपिंग करने की सिफारिश की थी। लेकिन सरकारी फाइलें धूल फांकती रहीं। दिसंबर 2024 में कोर्ट ने राजस्थान सरकार को विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया। इस समिति का काम घासभूमि, चट्टानी इलाकों और ओरणों की पहचान करना था।



केंद्र और राज्य सरकार की ढिलाई देख सुप्रीम कोर्ट ने 16 अप्रैल को वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव को अवमानना का नोटिस तक जारी किया था। इसके बाद प्रशासन में हलचल तेज हुई।



​राजस्थान वन नीति 2023 और नई उम्मीद

​पर्यावरणविदों का कहना है कि राजस्थान वन नीति 2023 में ओरण को सामान्य सामुदायिक भूमि माना गया था। इससे इन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पा रही थी।



अब न्यायालय ने साफ कर दिया है कि इन्हें सामान्य भूमि के बजाय आधिकारिक वन के रूप में संरक्षित किया जाए।



राजस्थान में लगभग 25,000 से अधिक ओरण हैं। ये करीब 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं। यह निर्णय खेजड़ी के पेड़ों और वन्यजीवों को बचाने के लिए मील का पत्थर साबित होगा।



आंदोलन और अतिक्रमण

पश्चिम राजस्थान में ​ओरण को बचाने के लिए लोग अपना घर-बार छोड़कर सड़कों पर हैं। हाल ही में सरहदी जिले जैसलमेर के तनोट माता मंदिर से जयपुर तक 700 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली गई। इसमें विश्नोई समाज सहित कई वर्गों ने हिस्सा लिया। आंदोलनकारियों की स्पष्ट मांग थी कि ओरण का संरक्षण किया जाए।



जालौर का ओडवाड़ा मामला: यहां अतिक्रमण हटाने का मामला इतना उलझा कि 440 घरों को तोड़ने के आदेश हुए। हालांकि, जोधपुर हाई कोर्ट ने फिलहाल इस पर स्टे (रोक) लगा दिया है।



जैसलमेर में एक्शन: प्रशासन ने हाल ही में रामगढ़ तहसील के कुछड़ी गांव के पास 1000 बीघा ओरण भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया है।



​सरकार के कदम क्या काफी हैं?

​सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बीच राजस्थान सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। 29 मई 2025 को सरकार ने ओरण भूमि संरक्षण को वनों के रूप में वर्गीकृत करने की प्रक्रिया शुरू की। अब इन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत सामुदायिक रिजर्व घोषित किया जाएगा।


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सरकार ने जनवरी और अप्रैल 2026 में कई आदेश जारी किए। जैसलमेर जिले के भीमसर, बिंजोता, पूनमनगर और कुछड़ी जैसे गांवों में हजारों हेक्टेयर जमीन ओरण के लिए आरक्षित की गई है।



​कहां कितनी है ओरण भूमि? (हैक्टेयर में)

पश्चिमी राजस्थान के जिलों में ओरण का सबसे ज्यादा विस्तार है:



​जैसलमेर: 2,02,130



​बाड़मेर: 82,997



​फलौदी: 31,669



​बालोतरा: 18,301



​जोधपुर: 9,588



​बीकानेर: 13,135



​नागौर: 2,582



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