कोर्ट ने खोली खातेदार की पोल, जमीन के पैसे भी लिए और पजेशन से भी रोका
News In Short
- कोर्ट ने उजागर की जमीन बेचकर मासूम बनने वाले खातेदारों की लूट की मॉडस-ऑपरेंडी।
- करोड़ों लेकर भी नहीं दिया कब्जा, सिविल विवाद की आड़ में जनता को लूट रहे जमीन मालिक।
- एक ही जमीन को कई बार बेचकर विवाद खड़ा करने का खतरनाक तरीका।
- 350 प्लॉटों के मामले में भी निष्पक्ष जांच न करने वाले अधिकारियों पर कोर्ट ने उठाए सवाल।
- जेडीए को जमीन सरेंडर करने के बाद भी धोखाधड़ी करने वाले आरोपी की जमानत खारिज।
News In Detail
राजस्थान में एक ही जमीन का बार-बार सौदा कर खरीददारों से धोखाधड़ी करने वाले एक मामले में हाई कोर्ट ने आईना दिखाया है। कोर्ट ने कहा है कि यह एक आम चलन हो चुका है, जहां जमीन मालिक मासूम बनकर भूमि किसी कॉलोनाईजर या हाउसिंग सोसायटी को बेच देते हैं। इस जमीन पर कॉलोनी बनाकर प्लाट बेच देते हैं और पूरा भुगतान ले लेते हैं।
इसके बाद उसी जमीन को दूसरे और तीसरे को बेचकर उनसे भी पैसा ले लेते हैं। बाद में खातेदार जमीन मालिक पूरे मामले को सिविल विवाद बताने की कोशिश करते हैं, जिससे उन्हें आपराधिक कार्यवाही का सामना ना करना पड़े। इस मॉडस-ऑपरेंडी के जरिए खातेदार गाढ़ी कमाई से प्लॉट खरीदने वालों के साथ धोखाधड़ी करता है।
यह है मामला
दरअसल, जस्टिस रवि चिरानिया ऐसे ही एक मामले में श्यामलाल मीणा की दूसरी जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। श्यामलाल पर मारपीट, धोखाधड़ी, जबरन वसूली, अमानत में खयानत और षड़यंत्र करने के आरोप हैं। वह जेल में बंद है। मीणा पर आरोप है कि उसने एक भूखंड मालिक को उसके भूखंड में प्रवेश नहीं करने दिया और ना ही मकान बनाने दिया।
इस मामले में शिकायतकर्ता का कहना है कि उसने 30 जुलाई, 2014 को नरसिंह डवलपर से नरसिंह आरकेड योजना में प्लॉट नंबर सी-87 रजिस्टर्ड सेल डीड से खरीदा था। लेकिन, आरोपी श्यामलाल मीणा उन्हें अपने ही प्लॉट में घुसने नहीं देता। उनसे प्लॉट खरीदने के दस्तावेज देने की धमकी देता है।
पुलिस ने याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया था और 31 दिसंबर,2025 से जेल में है। उसका कहना था कि जमीन की कुछ डीलिंग उसके पिता ने की थी। उसका कोई लेना-देना नहीं है। बाकी आरोपियों की जमानत हो चुकी है, इसलिए उसे भी जमानत पर रिहा किया जाए।
यह है मॉडस-ऑपरेंडी
इस केस के आईओ ने कोर्ट को बताया कि आरोपी याचिकाकर्ता जमीन के एक खाातेदार गुलाब मीणा का बेटा है। गुलाब मीणा व अन्य खातेदरों ने 8,62,000 रुपए प्रति बीघा की दर से जमीन एक निजी हाउसिंग सोसायटी को बेच दी थी और भुगतान भी ले चुके हैं।
खातेदारों के साथ एग्रीमेंट के अनुसार हाउसिंग सोसायटी ने जमीन की 90-बी करवाने के लिए जेडीए को सरेंडर भी कर दी थी। इस आधार पर हाउसिंग सोसायटी ने पट्टे भी जारी कर दिए थे। हाउसिंग सोसायटी ने खातेदारों की सहमति से प्लॉट बेचे, पट्टे व कब्जा पत्र तथा साइट प्लान जारी किए थे।
लेकिन जमीन का पूरा पैसा लेने के बावजूद खातेदार अब प्लॉट मालिकों को ना तो कब्जा लेने दे रहे हैं और ना ही मकान बनाने दे रहे हैं। यह खातेदारों और हाउसिंग सोसायटी की मिलीभगत का स्पष्ट नमूना है।
बेची नहीं तो भारी-भरकम पैसा कहां से आया
कोर्ट ने किसी को जमीन नहीं बेचने की दलील पर कहा कि खातेदारों और हाउसिंग सोसायटी के बीच मिलीभगत इस बात से स्पष्ट है कि नरसिंह हाउसिंग सोसायटी ने जमीन पर 350 पट्टे जारी किए और इनके बदले पूरा पैसा लिया। खातेदारों को उनके हिस्से का पैसा नगद और बैंक के जरिए दिया। डील में भारी-भरकम पैसे का लेन-देन हुआ है। यदि खातेदरों ने जमीन बेची ही नहीं तो फिर खातेदारों और हाउसिंग सोसायटी के बीच भारी-भरकम पैसे का लेन-देन कैसे हुआ ?
पुलिस ने भी ईमानदारी से नहीं किया काम
कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता व अन्य खातेदारों के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हैं। यह लोग हाउसिंग सोसायटी से जमीन का पूरा पैसा लेने के बावजूद प्लॉट खरीदने वालों को जमीन में घुसने तक नहीं दे रहे हैं। यह 350 प्लॉट का गंभीर मामला है। इसके बावजूद पूर्व में अनुसंधान अधिकारियों ने ईमानदारी से अनुसंधान नहीं किया।
यह आश्चर्यजनक व चौंकाने वाला
कोर्ट ने कहा है कि यह आश्चर्यजनक व चौंकाने वाला मामला है। खातेदारों ने अपनी जमीन निजी हाउसिंग सोसायटी को बेच दी। 350 प्लॉट के पट्टे जारी कर दिए। इनका पूरा पैसा ले लिया। जमीन को 90-बी की कार्यवाही के लिए जेडीए को सरेंडर कर दिया।
इस आधार पर हाउसिंग सोसायटी ने प्लॉट बेच दिए। लेकिन अब सभी खातेदार हाउसिंग सोसायटी के साथ मिलीभगत करके साजिशन प्लॉट खरीदने वालों को उनके ही प्लॉट में घुसने तक नहीं दे रहे हैं। यह मेहनत की कमाई से प्लॉट खरीदने वालों के साथ धोखाधड़ी है।
दस्तावेजों से साफ है जमीन बेची थी
कोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता के पिता गुलाब मीणा व अन्य खातेदारों ने 24 अप्रेल,2003 को जमीन बेचने का एग्रीमेंट किया था। 5 अगस्त,2004 को सभी खातेदारों ने सोसायटी के डायरेक्टर के पक्ष में पॉवर ऑफ एटार्नी रजिस्टर्ड करवाई थी।
इस पर सब खातेदारों की फोटो,बायोमेट्रिक्स और अंगूठे के निशान हैं। पॉवर ऑफ अटार्नी के जरिए सोसायटी के निदेशक को अस्थाई पट्टे जारी करने,इनके बदले भुगतान लेने व अन्य कानूनी औपचारिकताएं करने को अधिकृत किया था।
इसके आधार पर सोसायटी के डायरेक्टर ने सभी काम किए व जमीन को 90-बी के लिए जेडीए केा सरेंडर किया। इसके बाद प्लॉट बनाकर बेचे और भुगतान लिया। खातेदारों को भी उनके हिस्से का पूरा पैसा नगद और बैंक के जरिए दिया। खातेदारों के बैंक स्टेटमेंट से साबित है कि वे 2003 के बाद से ही जमीन का पूरा पैसा ले चुके हैं।
दूसरे व्यक्ति को बेची जमीन
सुनवाई के दौरान पता चला कि याचिकाकर्ता के पिता व अन्य खातेदारों ने वही जमीन किसी प्रेम सुराणा नाम के व्यक्ति को बेच दी है। इसके लिए उन्होंने प्रेम सुराणा के साथ 14 अगस्त, 2020 का एक प्रतिज्ञा पत्र पेश किया। इस दस्तावेज के पेश होने और पूरे मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने जमानत देने से इंकार करते हुए जमानत याचिका खारिज कर दी।
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